भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 634 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 452
४४२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

संदेही होता है और बुद्धि निश्चयात्मिका होती है। इसका स्वरूप सूक्ष्म होता है। आत्माके रूपमें भगवान् हिरण्यगर्भ अन्तःकरणमें विद्यमान रहते हैं, वही जीवात्मा है। इस प्रकार प्रपञ्चसे परे उस महाप्राण परमात्माके द्वारा पञ्चमहाभूतोंसे बने शरीरकी उत्पत्ति होती है। उन्हीं पञ्चीकृत पञ्चमहाभूतोंसे ब्रह्माण्ड अर्थात् इस जगत्की सृष्टि हुई थी।

पैर आदिसे युक्त शरीर स्थूल शरीर है, यह तो संसारमें प्रसिद्ध ही है। उसके बाद उनमें पञ्चभूत तत्त्व और उनके कार्योंकी जो स्थिति है, वह स्थूल शरीरसे पूर्वका शरीर है। किंतु उसके शरीरसे जो कुछ उत्पन्न होता है, उसको स्थूल ही कहा जाता है। विद्वान् इस प्रकार परमात्मासे स्थित शरीरको तीन प्रकार मानते हैं। स्वतत्त्वके भेदको बतानेवाले भेदवाक्य 'अहं ब्रह्मास्मि' के अनुसार उन दोनों पूर्वस्थूल और स्थूल शरीरमें वह ब्रह्म ही प्रविष्ट रहता है। जलमें सूर्यकी छाया और बेरके समान उस समय उसकी आकृति होती है, जीवस्वरूप वह ब्रह्म उसमें प्राणादि इन शारीरिक तत्त्वोंको धारण करता है। जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्तिकी अवस्थामें किये जानेवाले कार्योंका जो साक्षी है, वही जीव माना गया है।

जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्तिकी अवस्थाओंसे परे वह ब्रह्म अपने निर्गुण स्वभावमें ही रहता है। उस क्रियाशील शरीरके साथ रहने एवं न रहनेकी स्थितिमें भी वह नित्य शुद्ध स्वभाववाला ही है। उसमें कोई विकृति नहीं आती। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिकी जो तीन अवस्थाएँ हैं, इन अवस्थाओंके कारण वह परमात्मा ही तीन प्रकारका मान लिया जाता है। वह अन्तःकरणमें स्थित रहता है और जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिकी स्थितिमें इन्द्रियोंकी क्रियाशीलताको देखता हुआ वह विकारयुक्त हो जाता है।

हे अर्जुन! अब मैं फलयुक्त क्रिया और कारककी जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति-अवस्थाका वर्णन करता हूँ, उसको सुनें। इन्द्रियोंके द्वारा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन तन्मात्राओंका जब मनुष्यको सत्य-रूपमें ज्ञान होता है, तब उसको मनुष्यकी जाग्रत्-अवस्था कहते हैं। उसको विषयासक्त प्राणीके अन्तःकरणमें जागते हुए संस्कारोंका विश्वास भी कहा जा सकता है। स्वप्न एवं सुषुप्तिकी स्थिति तब होती है, जब विषयापेक्षित कार्यमें लगाये जानेवाले साधनकी चिन्तामें बुद्धि एकाग्र हो जाती है। कारण-अवस्थामें ब्रह्मकी स्थिति है। अतः कालके वशमें होनेके कारण वह जीवात्मा बनकर स्वरूप शरीर स्थित रहता है।

यम-नियमादि अष्टाङ्ग मार्गको यथाक्रम पार करते हुए जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थामें विद्यमान वह जीव साक्षी-रूपमें सब कुछ देखता है। अतः मनुष्यको समाधि आरम्भ करनेके पूर्व ही उस परम लक्ष्यकी अवधारणा अपने चित्तमें बना लेनी चाहिये।

इसके बाद मुमुक्षुके अन्तःकरणमें कैवल्य अर्थात् उस परमात्माके साक्षात्कारकी अवस्था आ जाती है। अतः मोक्षार्थीको उस स्थितिमें पाञ्चभौतिक शरीरके अंदर फँसे हुए क्षेत्रज्ञ जीवात्माके विषयमें विचारकर उसको शरीरसे पृथक् समझना चाहिये, क्योंकि आत्मतत्त्वको शरीरसे अतिरिक्त न माननेपर ब्रह्मतत्त्वसे साक्षात्कार करनेमें अनेक बाधाएँ होती हैं, अतः उन बाधाओंको दूर करना अपेक्षित है, जो सांसारिक विषय-वासनाओंके क्षेत्रसे उत्पन्न हैं। उस स्थितिमें तो समस्त क्षेत्रको ही शून्य कर देना आवश्यक होता है। यह पाञ्चभौतिक शरीर घट आदिके समान है, जैसे घटके अंदर आकाश है, उस समय वह घटाकाश कहा जाता है। किंतु उस भ्रमको दूर कर दिया जाय तो अपने उस समग्र रूपमें वह दिखायी देता है। वैसी ही स्थिति जीवात्माकी है। अतः पाञ्चभौतिक शरीरसे उस मोक्षकी साधनामें जीवात्माको पृथक् समझना चाहिये। जिसमें वह आबद्ध है, उस क्षेत्रको ही भली प्रकारसे शेष करना अनिवार्य है। जिस प्रकार घट मिट्टीसे पृथक् नहीं है, उसमें समवाय सम्बन्ध होता है। उसी प्रकार कुम्भकारके द्वारा प्रयुक्त चक्र,