भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 600 में से

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पृष्ठ 139

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० १२ १०१ वाक् एव होता वाक् ब्रह्म वाक् देवः इति ) तुझसे हम कहते हैं—वाणी ही होता -[ होकर ] होतृ कर्म करती है, वाणियों को ही स्तोम [ स्तुति के मन्त्र और वषट्कार आहुतियां ] प्राप्त होती हैं, तुझसे हम कहते हैं—वाणी ही होता, वाणी ब्रह्म [ वेदज्ञान ], और वाणी देवता है। ( प्राणापानाभ्याम् एव अध्वर्युः आध्वर्यवं करोति, प्राणः प्रणीतानि ह भूतानि, प्राणः प्रणीताः प्रणीताः-ते ब्रूमः प्राणापानौ एव अध्वर्यू, प्राणापानौ ब्रह्म, प्राणापानौ देवः इति ) दोनों प्राण और अपान [ श्वास और प्रश्वास ] से ही अध्वर्यु अध्वर्यु का काम करता है, प्राण ही अच्छे प्रकार लाये गये जीव हैं, प्राण ही अच्छे प्रकार लाये गये प्रणीता [ यज्ञपात्रविशेष ] हैं—तुझसे हम कहते हैं--दोनों प्राण और अपान ही दो अध्वर्यु हैं, प्राण और अपान ब्रह्म [ वेदज्ञान ], प्राण और अपान देवता हैं। ( चक्षुषा एव उद्गाता औद्गात्रं करोति, चक्षुषा हि इमानि भूतानि पश्यन्ति, अथो चक्षुः एव उद्गाता, चक्षुः ब्रह्म, चक्षुः देवः इति ) आंख से ही उद्गाता उद्गाता का काम करता है, आंख से ही यह सब जीव देखते हैं, इसलिये आंख ही उद्गाता, आंख ही ब्रह्म [ वेदज्ञान ] और आंख ही देवता है। ( मनसा एव ब्रह्मा ब्रह्मत्वं करोति, मनसा हि दिशः तिर्यञ्च् च ऊर्ध्वं च यत् च किं च मनसा एव करोति तद् ब्रह्म, ते ब्रूमः मनः एव ब्रह्मा मनः ब्रह्म मनः देवः इति ) मन से ही ब्रह्मा ब्रह्मा का काम करता है, मन से ही दिशा के तिरछे काम और ऊंचे काम को और भी जो कुछ है [ उसको भी ] मन से ही करता है, वह ब्रह्म [ वेदज्ञान ] है, तुझ- से हम कहते हैं—मन ही ब्रह्मा, मन ब्रह्म [ वेदज्ञान ] और मन देवता है ॥ ११ ॥ भावार्थः—इस कण्डिका में भौतिक क्रिया के साथ आत्मिक यज्ञ का वर्णन है। और इसका सम्बन्ध अगली कण्डिका से है ॥ ११ ॥ कण्डिका १२ ॥ तद्यथा ह वा इदं यजमानश्च याजयितारश्च दिवं ब्रूयुः पृथिवीति, पृथिवीं वाक् द्यौरिति ब्रूयुस्तदन्यो नानुजानात्येतामेवं नानुजानाति यदेतद् ब्रूयादथ तु कथमिति होतेत्येव होतारं ब्रूयाद्वागिति वाचं, ब्रह्मेति ब्रह्म, देव इति देवमध्वर्यु- रित्येवाध्वर्युं ब्रूयात्, प्राणापानाविति प्राणापानौ, ब्रह्मेति ब्रह्म, देव इति प्राप्नुमः (एमहि) आ + इण् गतौ—विधिलिङ् । वयं प्राप्नुयाम ( होत्रम् ) होतृ— अण् । होतुः कर्म ( वषट्काराः १ ) वह प्रापणे डषटि । आहुतयः देवयज्ञाः । ( वाचः ) वाण्यः ( समृद्ध्यन्ते ) प्राप्नुवन्ति ( ते ) तुभ्यम् ( प्रणीतानि ) प्र + णीञ् प्रापणे—क्तः । प्रकर्षेण प्रापितानि ( प्रणीताः ) यज्ञपात्रविशेषाः ॥ १—वस्तुतः यह अव्युत्पन्न शब्द है। 'कार' प्रत्यय से सूचित होता है कि यह निरर्थक शब्द है। क्योंकि कार प्रत्यय का प्रयोग सदा केवल वर्णमात्र की सूचना देने के लिये ही आता है ॥ सम्पा० ॥