गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 144, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० १५ किया । [ गर्भ वः पिण्ड के रूप में पदार्थ बनाये ], ( ततः आदित्याः अजायन्त ) उस [ कर्म ] से आदित्य [ अखण्ड परमात्मा से उत्पन्न पदार्थ ] उत्पन्न हुये । ( यः एषः ओदनः पच्यते एतत् आरम्भणम् एव, आक्रमणम् एव क्रियते ) [ इसी प्रकार यज्ञ में ] जो यह भात पकाया जाता है वह आरम्भ कर्म ही और आगे बढ़ने का कर्म ही किया जाता है, ( प्रादेशमात्रीः समिधः भवन्ति, एतावान् हि आत्मा प्रजापतिना सम्मितः ) प्रादेशमात्री [ अँगूठे से तर्जनी तक परिमाण वाली ] समिधायें होती हैं, इतना ही आत्मा प्रजापति [ परमेश्वर ] करके नापा गया है । ( अश्वत्थे अग्नेः वै या यज्ञिया तनूः तया समगच्छत ) पीपल [ आदि काष्ठ ] में अग्नि का जो निश्चय करके पूजनीय शरीर है, उसके साथ वह [ अग्नि ] मिला है, ( एषा स्वधृत्या तनूः यत् घृतम् ) यह अपने आप [ अग्नि को ] पुष्ट करने वाला शरीर है जो घृत है, ( यत् घृतेन समिधः अनक्ति ताभ्यां तनूभ्याम् एव एनं तं समर्धयति ) वह जो घी से समिधाओं को सींचता है, उन दोनों शरीरों [ घी और समिधा ] से ही इस प्रसिद्ध [ अग्नि ] को बढ़ाता है । ( यत् निमार्गस्य अवकृत्या आदधाति वीर्यं वै क्रियते ) जो निश्चित मार्ग के संकल्प से अग्न्याधान करता है, [ उससे ] वीर्यं [ सामर्थ्य ] ही किया जाता है, ( यत् निमार्गस्य अवकृत्या एव आदधाति संवत्सरः वै प्रजननम्, अग्निः प्रजननम्, एतत् प्रजननम् यत् संवत्सरः ) जो निश्चित मार्ग के संकल्प से ही अग्न्याधान करता है वह संवत्सर ही उत्पादन सामर्थ्य है, अग्नि उत्पादन सामर्थ्य है, यह उत्पादन सामर्थ्य है जो संवत्सर है, ( ऋचा अग्नौ समिधम् आदधाति ) मन्त्र के साथ अग्नि में समिधा को रखता है। ( प्रजननात् एव एनं तत् प्रजनयिता प्रजनयति ) उत्पादन सामर्थ्य से ही इस अग्नि को वह उत्पन्न करने वाला [ यजमान ] उत्पन्न करता है ( अभक्तुर्वे पुरुषः नहि तत् वेद यत् ऋतुम् अभिजायते ) इस सृष्टि विज्ञान को न समझने वाला पुरुष यह नहीं जानता है कि ऋतुयें कैसे बनती हैं । ( यत् नक्षत्रं तत् आप्नोति ) जो नक्षत्र [ नक्षत्र का वृष्टि आकर्षणादि प्रभाव ] है उसको वह पाता है । ( यः एषः ओदनः पच्यते एषा एव योनिः क्रियते ) जो यह भात [ यज्ञ में ] पकाया जाता है यही गर्भाशय किया जाता है, ( यत् समिधः आधीयन्ते तत् रेतः ध्रियते ) जो समिधायें यथावत् रक्खी जाती हैं उससे वीर्यं धरा जाता है, ( संवत्सरः वै हितं रेतः प्रजायते ) संवत्सर [ समय ] ही हितकारी वीर्य हो जाता है । ( ये एते संवत्सरे, परि अग्निम् आधत्ते प्रजापतिः एव एनम् आधत्ते ) यह जो [ नियम हैं उनसे ] संवत्सर तक अग्न्याधान करता है, प्रजापति [ यजमान ] ही ( आश्नात् ) अश भोजने-लङ् । अभक्षयत् । अगृह्णात् ( आदित्याः ) दित्यदित्या- दित्य० ( पा० । ४ । १ । ८५ ) अदिति—ण्यप्रत्ययः, अपत्यार्थे । अदितिपुत्राः । सर्वे परमेश्वरजनितपदार्थाः ( प्रादेशमात्रीः ) हलश्च ( पा० ३ । ३ । १२१ ) प्र + दिश अतिसर्जने—घञ् । उपसर्गस्य घञ्यमनुष्ये बहुलम् ( पा० ६ । ३ । १२२ ) इति दीर्घः । मात्रच् प्रत्ययः । अंगुष्ठतर्जनीपरिमिताः । ( सम्मितः ) परिमितः । ( स्वधृत्या ) स्व + धृञ् धारणे—क्यप् । स्वपोषिका ( अनक्ति ) संयोजयति ( निमार्गस्य ) निश्चितमार्गस्य ( अवकृत्या ) अव + कॄञ् शब्दे—क्तिन् । आकृत्या ।