भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 600 में से

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पृष्ठ 154

११६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० १९ ॥ वे देवता इन्द्र से बोले—इस हमारे यज्ञ की तब तक रक्षा कर, जब तक हम असुरों से लड़ें । ( सः वै नः तेन रूपेण गोपाय येन रूपेण नः भूयिष्ठं छादयसि येन गोप्तुं शक्ष्यसि इति ) सो तू हमें उस रूप से बचा जिस रूप से तू हमें बहुत बहुत छिपाता है और जिससे तू रक्षा कर सकता है । ( सः ऋग्वेदो भूत्वा पुरस्तात् परीत्य उपातिष्ठत् ) वह [ इन्द्र ] ऋग्वेद होकर पूर्व ओर से घूम कर पास बैठ गया [ देखो कण्डिका १८ ] । ( तं देवाः अब्रुवन् अन्यत् तत् रूपं कुरुष्व एतेन रूपेण नः भूयिष्ठं न छादयसि न एतेन गोप्तुं शक्ष्यसि इति ) उससे देवता बोले—दूसरा वह रूप कर, इस रूप से तू हमें बहुत बहुत नहीं छिपाता है और न इससे तू बचा सकता है । ( सः यजुर्वेदः भूत्वा पश्चात् परीत्य उपातिष्ठत् ) वह यजुर्वेद हो कर पश्चिम ओर से घूम कर पास बैठ गया । ( तं देवाः अब्रुवन् अन्यत् तत् रूपं कुरुष्व एतेन रूपेण नः भूयिष्ठं न छादयसि न एतेन गोप्तुं शक्ष्यसि इति ) उससे देवता बोले—दूसरा वह रूप कर, इस रूप से तू हमें बहुत बहुत नहीं छिपाता है और न इससे तू बचा सकता है । ( स सामवेदः भूत्वा उत्तरतः परीत्य उपातिष्ठत् ) वह सामवेद होकर उत्तर की ओर से घूमकर पास बैठ गया । ( तं देवा अब्रुवन् अन्यत् एव तत् रूपं कुरुष्व एतेन रूपेण नः भूयिष्ठं न छादयसि न एतेन गोप्तुं शक्ष्यसि इति ) उससे देवता बोले—दूसरा ही वह रूप कर, इस रूप से तू हमें बहुत बहुत नहीं छिपाता है और न इससे तू बचा सकता है । ( सः उष्णीषी इन्द्रः ब्रह्मवेदः भूत्वा दक्षिणतः परीत्य उपातिष्ठत् ) वह पगड़ी वाला इन्द्र ब्रह्मवेद [ चारों वेदों का समूह ] होकर दक्षिण की ओर से घूम कर पास बैठ गया । ( तं देवाः अब्रुवन् एतत् तत् रूपं कुरुष्व एतेन रूपेण नः भूयिष्ठं छादयसि एतेन गोप्तुं शक्ष्यसि इति ) उससे देवता बोले -इससे वह रूप कर, इस रूप से तू हमें बहुत बहुत छिपाता है और इससे बचा सकता है । ( तत् यत् उष्णीषी इन्द्रः ब्रह्मवेदः भूत्वा दक्षिणतः परीत्य उपातिष्ठत्, तत् ब्रह्मा अभवत् तत् ब्रह्मणः ब्रह्मत्वम्, तत् वै एतत् अथर्वणः रूपम् यत् उष्णीषी ब्रह्मा ) वह जो पगड़ी वाला इन्द्र ब्रह्मवेद [ चारों वेदों का समूह ] हो कर दक्षिण की ओर से घूम कर पास बैठ गया वह ब्रह्मा हो गया. वह ब्रह्मा का ब्रह्मपन है, वही यह अथर्वा [ निश्चल ब्रह्म ] का रूप है जो पगड़ी वाला ब्रह्मा है [ अर्थात् सब वेद जानने वाला ब्रह्मा होता है—क० १८ ] । ( तं दक्षिणतः विश्वेदेवाः उपासीदन् ) उसके दक्षिण ओर सब देवता बैठ गये । ( तं दक्षिणतः यत् विश्वेदेवाः उपासीदन् तत् सदस्यः अभवत् तत् सदस्यस्य ( छादयसि ) वेष्टयसि ( उष्णीषी ) उष्णीष—इनिः । शिरोवेष्टनवान् ( ब्रह्मवेदः ) चतुर्वेदसमूहः ( ब्रह्मा ) चतुर्वेदवेत्ता ( अथर्वणः ) निश्चलब्रह्मणः ( विश्वेदेवाः ) सर्वे याजकाः ( उपासीदन् ) षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु—लङ् । उपातिष्ठन् ( सदस्यः ) सदस्—यत् । सभायां साधुः ( बलेः ) उपहारात् । पूजनद्रव्यात्