भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 600 में से

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पृष्ठ 182

१४४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० ७ भवन्ति ४) क्यों यह प्रजायें पहिले शिर पर श्वेत हो जाते हैं ३, क्यों अन्त में सब ही श्वेत हो जाते हैं ४ । (यः तत् दर्शपूर्णमासयोः रूपं विद्यात्) सो जो पुरुष अमावस्या और पूर्णमासी के [यज्ञ के] रूप को जाने [वह उत्तर देवे]—(कस्मात् इमाः प्रजाः अदन्तिकाः जायन्ते ५, कस्मात् आसाम् अपरम् इव जायन्ते ६) क्यों यह प्रजायें बिना दांत वाले उत्पन्न होते हैं ५, क्यों इनके [दांत] पीछे निकलते हैं ६ । (तत् यः दर्शपूर्णमासयोः रूपं विद्यात्) सो जो पुरुष अमावस्या और पूर्णमासी के [यज्ञ के] रूप को जाने [वह उत्तर देवे]—(कस्मात् आसां सप्तवर्षाष्टवर्षाणां प्रभिद्यन्ते ७, कस्मात् आसां पुनः एव जायन्ते ८, कस्मात् अन्ततः सर्वे एव प्रभिद्यन्ते ९) क्यों इन सात वर्ष आठ वर्ष वालों के [दांत] उखड़ जाते हैं ७, क्यों इनके [दांत] फिर भी निकल आते हैं ८, क्यों अन्त में सभी उखड़ जाते हैं ९। (तत् यः दर्शपूर्णमासयोः रूपं विद्यात्) सो जो पुरुष अमावस्या और पूर्णमासी के [यज्ञ के] रूप को जाने [वह उत्तर देवे]—(कस्मात् अधरे दन्ताः पूर्वे जायन्ते १०, परे उत्तरे ११) क्यों नीचे वाले दांत पहिले निकलते हैं १०, और पीछे ऊपर वाले ११ । (तत् यः दर्शपूर्णमासयोः रूपं विद्यात्) सो जो पुरुष अमावस्या और पूर्णमासी के [यज्ञ के] रूप को जाने [वह उत्तर देवे]—(कस्मात् अधरे दन्ताः अणीयांसः, ह्रसीयांसः १२, उत्तरे प्रथीयांसः वर्षीयांसः १३) क्यों नीचे वाले दांत अधिक सूक्ष्म और निर्बल होते हैं १२ और ऊपर वाले अधिक चौड़े और सबल होते हैं १३ । (तत् यः दर्शपूर्णमासयोः रूपं विद्यात्) सो जो पुरुष अमावस्या और पूर्णमासी के [यज्ञ के] रूप को जाने [वह उत्तर देवे]— (कस्मात् इमौ दंष्ट्रौ दीर्घतरौ १४, कस्मात् समे इव जम्भे १५) क्यों वह दोनों [सामने के] बड़े दांत अधिक लम्बे होते हैं १४, क्यों दोनों डाढ़ें चौकोर सी हैं १५। (तत् यः दर्शपूर्णमासयोः रूपं विद्यात्) सो जो पुरुष अमावस्या और पूर्णमासी के [यज्ञ के] रूप को जाने [वह उत्तर देवे]—(कस्मात् इमे श्रोत्रे अन्ततः समे इव दीर्णे १६) क्यों यह दोनों कान अन्त में समान से फटे होते हैं १६। (तत् यः दर्शपूर्णमासयोः रूपं विद्यात्) सो जो पुरुष अमावस्या और पूर्णमासी के [यज्ञ के] रूप को जाने [वह उत्तर देवे]—(कस्मात् पुमांसः श्मश्रुमन्तः १७, स्त्रियः अश्मश्रवः १८) क्यों पुरुष दाढ़ी मूछ वाले होते हैं १७, और स्त्रियां बिना दाढ़ी मूछ वाली १८। (तत् यः दर्शपूर्णमासयोः रूपं विद्यात्) सो जो पुरुष अमावस्या और पूर्णमासी के [यज्ञ के] रूप को जाने [वह उत्तर देवे]—(कस्मात् आसां शरीरं सन्ततम् इव भवति १९, कस्मात् आसाम् अस्थीनि दृढतराणि इव भवन्ति २०) क्यों इन [प्रजाओं] का शरीर फैला हुआ सा होता है १९, क्यों इनकी हड्डियां अधिक ईयसुन् । निर्बलतराः । कोमलतराः (प्रथीयांसः) पृथु-ईयसुन् । स्थूलतराः (वर्षीयांसः) वृद्ध-ईयसुन् । वृद्धतराः । सबलतराः (उत्तरे) उपरिस्थाः (समे) समाने (सन्ततम्) विस्तृतम् (सिक्तम्) सिंचितम् (सम्भवति) उत्पद्यते (शिश्नम्) मेढ्रम् (सकृत्) शके ऋतिन् (उ० ४। ५८) शकॢ शक्तौ- ऋतिन् वा शस्य सः । पुरीषम् । वीर्यम् (अपानम्) अप+अन प्राणने-अच् ।