गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 199, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० १४ १६१ समानव्यानाभ्यां स्वाहा, उदानरूपाभ्यां स्वाहा इति जुहुयात् अथ प्रातः यथास्थानम् अग्नीन् उपसमाधाय यथापुरं जुहुयात् सा मे विद्या सा प्रायश्चित्तिः इति ४) [उद्दालक बोला] गौ के गोबर से अग्नि के स्थानों को लीप कर, होम योग्य द्रव्य को पास लाकर, अग्नि को मथ कर (प्राणापानाभ्यां स्वाहा, समानव्यानाभ्यां स्वाहा, उदान- रूपाभ्यां स्वाहा) [ऊपर वाले इन तीन मन्त्रों से] होम करे, फिर प्रातःकाल अपने अपने स्थान में अग्नियों को ठीक करके पहिले के समान होम करे, यह मेरी विद्या और यह प्रायश्चित्त है ४ ।, अथ चेत् अग्निं जनयितुं न शक्नुयुः न कुतश्चन वातः वायात् किं वा ततः भयम् आगच्छेत् इति अस्य इष्टं च हुतं च मोघं भवति, यः विद्वान् जुहोति विद्यया तु एव अहम् अभिजुहोमि इति, का ते विद्या का प्रायश्चित्तिः इति ५) [प्राचीनयोग्य बोला] फिर जो अग्नि को लोग न उत्पन्न कर सकें ओर जो कहीं से वायु न चले अथवा उससे कुछ भय आवे [जिससे] उसका अभीष्ट और होम निष्फल होवे, और जो विद्वान्-होम करता है-(विद्यया······) विद्या के साथ फिर भी मैं सब प्रकार होम करूँ [यह कहे, इसमें] तेरी क्या विद्या है और क्या प्रायश्चित्त है ५। (आनडुहेन एव शकृत्पिण्डेन अग्न्यायतनानि परिलिप्य होम्यम् उपसाद्य, वातः आवातु भेषजम् इति सूक्तेन आत्मनि एव जुहुयात् अथ प्रातः अग्निं निर्मन्थ्य यथास्थानम् अग्नीन् उपसमाधाय यथापुरं जुहुयात्, सा मे विद्या सा प्रायश्चित्तिः ५ इति ब्राह्मणम्) [उद्दालक बोला] गौ के ही गोबर से अग्नि के स्थानों को लीप कर, होमयोग्य पदार्थ को पास लाकर (वातः आवातु भेषजम्) वायु औषध लावे-[इस मन्त्र का मिलान करो अथर्व ४।१३।३] इस सूक्त से आत्मा [अपने] में ही [मानसिक] होम करे, फिर प्रातःकाल अग्नि को मथ कर अपने अपने स्थान में अग्नियों को ठीक करके पहिले के समान होम करे, यह मेरी विद्या और यह प्रायश्चित्त है ५। यह ब्राह्मण है ॥ १३ ॥ भावार्थः-अग्नियों के अभाव में मनुष्य मानसिक हवन ही करे ॥ १३ ॥ विशेषः-पूर्वोक्त मन्त्र यहां लिखा जाता है-आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद् रपः । त्वं हि विश्वभेषज देवानां दूत ईयसे ॥ अथ० ४।१३।३ ऋ० ०।१३७।३। (वात) हे वायु (भेषजम्) स्वास्थ्य को (आ वाहि) बहकर ला, और (वात) हे वायु ! (यत् रपः = यत् रपः तत्) जो दोष है उसे (वि वाहि) बह कर निकाल दे, (हि) क्योंकि (विश्वभेषज) हे सर्वरोगनाशक [वायु]! (त्वम्) तू (देवानाम्) इन्द्रियों, विद्वानों और सूर्यादि लोकों के बीच (दूतः) चलने वाला वा दूत [समान सन्देश पहुंचाने वाला] होकर (ईयसे) फिरता रहता है ॥ कण्डिका १४ ॥ एवमेवैतद् भो भगवन् यथा भवानाहोपेयामि त्वेव भवन्तमित्येवं चेन्नावक्ष्यो मूर्द्धा ते व्यपतिष्यदिति· हन्त तु ते तद्वक्ष्यामि यथा ते न व्यपतिष्यतीति, यो ह वा एवं विद्वानश्नाति च पिबति च वाक् तेन तृप्यति, वाचि तृप्तायामग्निस्तृप्य- त्यग्नौ तृप्ते पृथिवी तृप्यति, पृथिव्यां तृप्तायां यानि पृथिव्यां भूतान्यन्वायत्तानि ११