गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 201, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० १४ १६३ अन्तरिक्ष में जो एक दूसरे के आधीन प्राणी आदि हैं वे तृप्त होते हैं ४ । यः ह वै एवं विद्वान् अश्नाति च पिवति च चक्षुः तेन तृप्यति ) जो ही ऐसा विद्वान् खाता और पीता है आंख उससे तृप्त होती है १, ( चक्षुषि तृप्ते आदित्यः तृप्यति ) आंख तृप्त होने पर सूर्य तृप्त होता है २, ( आदित्ये तृप्ते द्यौः तृप्यति ) सूर्य के तृप्त होने पर प्रकाशलोक [ जहां पर सूर्य का प्रकाश है ] तृप्त होता है ३, ( दिवि तृप्तायां दिवि यानि अन्वायत्तानि भूतानि तानि तृप्यन्ति ) प्रकाशलोक तृप्त होने पर प्रकाशलोक में जो एक दूसरे के आधीन प्राणी आदि हैं वे तृप्त होते हैं ४, ३ । ( यः ह वै एवं विद्वान् अश्नाति च पिवति च मनः तेन तृप्यति ) जो ही ऐसा विद्वान् खाता पीता है, मन उससे तृप्त होता है १, ( मनसि तृप्ते चन्द्रमाः तृप्यति ) मन तृप्त होने पर चन्द्रमा तृप्त होता है २, ( चन्द्रमसि तृप्ते आपः तृप्यन्ति ) चन्द्रमा तृप्त होने पर जल तृप्त होता है ३, ( अप्सु तृप्तासु अप्सु यानि अन्वायत्तानि भूतानि तानि तृप्यन्ति ) जल तृप्त होने पर जल में जो एक दूसरे के आधीन प्राणी आदि हैं, वे तृप्त होते हैं ४, ४ । ( यः ह वै एवं विद्वान् अश्नाति च पिवति च श्रोत्रं तेन तृप्यति ) जो ही ऐसा विद्वान् खाता और पीता है, कान उससे तृप्त होता है १, ( श्रोत्रे तृप्ते दिशः च अन्तर्देशाः च तृप्यन्ति ) कान तृप्त होने पर दिशायें और बीच वाले देश तृप्त होते हैं २, ( दिक्षु च अन्तर्देशेषु च तृप्तेषु च दिक्षु च अन्तर्देशेषु च यानि अन्वायत्तानि भूतानि तानि तृप्यन्ति ) दिशाओं और बीच वाले देशों के तृप्त होने पर दिशाओं और बीच वाले देशों में जो एक दूसरे के आधीन प्राणी आदि हैं, वे तृप्त होते हैं ३, ५ । ( यः ह वै एवं विद्वान् अश्नाति च पिबति च, तस्य अयम् एव दक्षिणः पाणिः जुहूः, सव्यः उपभृत्, कण्ठः ध्रुवा, अन्नं हविः, प्राणाः ज्योतींषि, सदेष्टं सदाहुतं सदाशितं पायितम् अग्निहोत्रं भवति, यः एवं वेद यः च एवं विद्वान् अग्निहोत्रं जुहोति इति ब्राह्मणम् ) जो ही ऐसा विद्वान् खाता और पीता है, उसका यही दाहिना हाथ जुहू [ पलाश की लकड़ी का बना हुआ चन्द्राकार यज्ञपात्र ], बायां हाथ उपभृत् [ चक्राकार यज्ञपात्र ], कण्ठ ध्रुवा [ वट के पत्राकार का यज्ञपात्र ] है, अन्न हवि है, प्राण ज्योति हैं, सदा अभीष्ट, सदा हवन और सदा खाया पिया अग्निहोत्र है, जो ऐसा जानता है और जो ऐसा विद्वान् अग्निहोत्र करता है, यह ब्राह्मण है ॥ १४ ॥ भावार्थः—मनुष्य खान पान के उपयोग से स्वस्थ रहकर संसार का उपकार करे ॥ १४ ॥ परस्परवशीभूतानि ( अन्तरिक्षम् ) मध्यलोकः ( चक्षुषि ) नेत्रे ( द्यौः ) सूर्य- प्रकाशस्थानम् ( जुहूः ) हु दानादानादनेषु—क्विप् । पलाशकाष्ठनिर्मितार्ध- चन्द्राकृतियज्ञपात्रभेदः ( उपभृत् ) उप + भृञ् भरणे—क्विप् । चक्राकारयज्ञपात्रम् ( ध्रुवा ) ध्रु स्थैर्ये—कः, टाप् । वटपत्राकृतियज्ञपात्रम् । ( ज्योतींषि ) सूर्यादीनि ( सदा—अशितम् ) नित्यभक्षितम् ( पायितम् ) पा पाने स्वार्थे—णिच्, क्तः । पीतम् ॥