भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 600 में से

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पृष्ठ 219

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ४ । क० ३ ॥ १८१ कण्डिका २ ॥ ब्रह्मा की दीक्षा ॥ ( अथ ब्रह्माणं दीक्षयति ) फिर ब्रह्मा को वह दीक्षा देता है ( चन्द्रमाः वै ब्रह्मा। अधिदेवं, मनः अध्यात्मम् ) चन्द्रमा [ के समान ] ही ब्रह्मा मुख्य देवता है और मन आत्मा के अधिकार वाला है। ( तत् मनसा एव ओषधीः सन्दधाति ) इसलिये मन से ही ओषधियों [ अन्न सोमलता आदिकों ] को वह [ ब्रह्मा ] ठीक ठीक रखता है। ( तत् याः ओषधीः वेद, सः एव ब्रह्मा ओषधीः तत् अनेन लोकेन सन्दधाति ) सो जिन ओषधियों को जानता है वही ब्रह्मा उन ओषधियों को तब इस लोक के साथ ठीक ठीक धरता है। ( तस्मात् एतौ अन्तरेण अन्यः न दीक्षेत ) इसलिये इन दोनों [ गृहपति और ब्रह्मा ] के बीच में दूसरा न दीक्षा लेवे । ( यत् एतौ अन्तरेण अन्यः दीक्षेत, सः इमम् तं लोकम् ओषधिभिः व्यापादयेत् ) यदि इन दोनों के बीच में दूसरा [ अयोग्य ] दीक्षा लेवे । वह [ कुप्रयोग करके ] इस उस लोक को ओषधियों से नष्ट कर देवे । ( उच्छोषुकाः ह स्युः ) वे [ लोक ] सूखे हो जावें, ( तस्मात् एतौ अन्तरेण अन्यः न दीक्षेत ) इसलिये इन दोनों के बीच में कोई [ अयोग्य पुरुष ] न दीक्षा लेवे ॥ १ ॥ भावार्थः-योग्य ब्रह्मा पदार्थों के सुप्रयोग से यज्ञ को सिद्ध करता और अयोग्य पुरुष उनके कुप्रयोग से यज्ञ को नष्ट कर देता है, इसलिये ब्रह्मा योग्य होना चाहिये ॥ २ ॥ कण्डिका ३ ॥ अथोद्गातारं दीक्षयत्यादित्यो वा उद्गाताऽधिदैवं, चक्षुरध्यात्मं, पर्जन्य आदित्यः, पर्जन्यादधिवृष्टिर्जायते, वृष्टिरेव तदोषधीः सन्दधाति, तस्मादेतावन्त- रेणान्यो न दीक्षेत, स यदेतावन्तरेणान्यो दीक्षेतेमं तं लोकं वर्षेण व्यापादयेदवर्ष- काऽह स्युस्तस्मादेतावन्तरेणान्यो न दीक्षेत ॥ ३ ॥ कण्डिका ३ ॥ उद्गाता की दीक्षा ॥ ( अथ उद्गातारं दीक्षयति ) फिर उद्गाता को दीक्षा देता है । ( आदित्यः वै उद्गाता अधिदेवं, चक्षुः अध्यात्मम् ) सूर्य [ के समान ] ही उद्गाता मुख्य देवता है, आंख आत्मा के अधिकार वाली है, ( पर्जन्यः आदित्यः ) मेघ सूर्य है। ( पर्जन्यात् अधि वृष्टिः जायते, वृष्टिः एव तत् ओषधीः सन्दधाति ) मेघ से वर्षा होती है, वर्षा ही तब ओषधियों को ठीक ठीक रखती है। ( तस्मात् एतौ अन्तरेण अन्यः न दीक्षेत ) इसलिये इन दोनों [ ब्रह्मा और उद्गाता ] के बीच में कोई [ अयोग्य ] न २-( अधिदेवम् ) मुख्यदेवः ( अध्यात्मम् ) आत्मानं शरीरम् अधिकृत्य वर्त्त- मानम् ( ओषधीः ) अन्नसोमलतादिपदार्थान् ( संदधाति ) सम्यक् स्थापयति । (अन्तरेण) मध्ये ( व्यापादयेत् ) नाशयेत् ( उच्छोषुकाः ) लषपतपदस्थाभू० ( पा० ३ । २ । १४४ ) उत् + शुष शोषणे-उकञ् बाहुलकात् । अतिशयेन शुष्काः ॥

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