गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 222, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ४ । क० ६ ॥ फिर अध्वर्यु [हिंसा रहित यज्ञ करने वाले] के लिये प्रतिप्रस्थाता [सामने खड़े रहने वाले] को नेष्टा [नायक याजक] दीक्षा देता है। (सः ह एनम् अनु+दीक्षते) वह भी इसके पीछे [दीक्षा लेता है]। (इतरेषां वै नवानां कॢप्तिः अन्यतरे कल्पन्ते) दूसरे नौ [ऋत्विजों] की व्यवस्था दूसरे कोई [इस प्रकार] करते हैं। (नव वै प्राणाः, प्राणैः यज्ञः तायते) नौ [दो कान, दो नथने, दो आँखें एक मुख, एक पायु और एक उपस्थ इन्द्रिय] ही प्राण हैं, प्राणों के साथ यज्ञ फैलता है। (अथ ब्रह्मणे पोतारं दीक्षयति) फिर ब्रह्मा के लिये पोता [शोधने वाले] को दीक्षा देता है १। (अथ उद्गात्रे प्रतिहर्त्तारं दीक्षयति) फिर उद्गाता के लिये प्रतिहर्त्ता [द्रव्य लाने वाले] को दीक्षा देता है। २। (अथ होत्रे अच्छावाकं दीक्षयति) फिर होता के लिये अच्छा- वाक् [शुद्ध बोलने वाले] को दीक्षा देता है। ३। (अथ अध्वर्य्यवे नेष्टारम् उन्नेता दीक्षयति) फिर अध्वर्यु के लिये नेष्टा को उन्नेता [ऊपर उठाने वाला] दीक्षा देता है। ४। (सः ह एनम् अनु+दीक्षते) वह [उन्नेता] भी इस [नेष्टा] के पीछे [दीक्षा पाता है]। ५। (अथ ब्रह्मणे आग्नीध्रं दीक्षयति) फिर ब्रह्मा के लिये आग्नीध्र [अग्नि प्रदीप्त करने वाले] को दीक्षा देता है। ६। (अथ उद्गात्रे सुब्रह्मण्यं दीक्षयति) फिर उद्गाता के लिये सुब्रह्मण्य [अच्छे वेद में निपुण] को दीक्षा देता है। ७। (अथ होत्रे ग्रावस्तुतं दीक्षयति) फिर होता के लिये ग्रावस्तुत् [सूक्ष्म विचारों की स्तुति करने वाले] को दीक्षा देता है। ८। (अथ तम्+अनु, अन्यः स्नातकः वा ब्रह्मचारी वा दीक्षयति) फिर उसके [पीछे] स्नातक [वेद विद्या समाप्त कर चुकने वाला] अथवा ब्रह्मचारी [वेद विद्या पढ़ने वाला] दीक्षा पाता है। ६। (इतः न पावयेत् इति आहुः) अशुद्ध न शुद्ध करे [न संस्कार करावे]-ऐसा कहते हैं। (सा एषा अनुपूर्वा दीक्षा) यही क्रमानुसार दीक्षा है। (तत् ये दीक्षिष्य- माणाः एवं दीक्षन्ते, ते एवं सत्रिणां प्रायश्चित्तं न विन्दन्ते) जो दीक्षा चाहने वाले पुरुष इस प्रकार दीक्षा पाते हैं, वे ही याजकों के प्रायश्चित्त को नहीं पाते [अर्थात् ठीक ठीक यज्ञ करते हैं]। (सत्रिणां प्रायश्चित्तम् अनु तस्य अर्द्धस्य योगक्षेमः कल्पते यस्मिन् अर्द्धे दीक्षन्ते इति ब्राह्मणम्) याजकों के प्रायश्चित्त के साथ उस ऋद्धि [सम्पत्ति] का योगक्षेम [पाने योग्य का पाना और पाये हुये का बचाना] सिद्ध होता है, जिस सम्पत्ति में वे दीक्षा पाते हैं-यह ब्राह्मण [ब्रह्मज्ञान] है॥ ६॥ भावार्थः-विद्वानों के हाथ से काम होने पर प्रायश्चित्त की आवश्यकता नहीं होती, और जो कुछ त्रुटि हो जाय, तो प्रायश्चित्त करके कार्य सिद्ध कर लेना चाहिये ॥ ६ ॥ व्यवस्थां कुर्वन्ति (नव प्राणाः) सप्तशीर्षण्यानीन्द्रियाणि द्वे पायूपस्थे (पोतारम्) शोधयितारम् (प्रतिहर्त्तारम्) द्रव्याणामानेतारम् (आग्नीध्रम्) अग्निदीपयि- तारम् (सुब्रह्मण्यम्) सुब्रह्मन्-यत् साध्वर्थे। सुब्रह्मणि वेदज्ञाने साधुः (वा) विरूरपे (पूतः) पूयी दुर्गन्धे विशरणे च-क्तः। अशुद्धः (पावयेत्) शोधयेत्। संस्कारयेत् (अर्द्धस्य) गो० पू० १। १३। ऋद्धेः। संपत्तेः (योगक्षेमः) गो० पू० १। १३। प्राप्यस्य प्रापणं प्राप्तस्य रक्षणं च (अर्द्धे) सम्पत्तौ ॥