गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 304, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें२६६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० २ ॥ ( इन्द्रस्य जठरं किञ्चन नहि हिनस्ति ) इन्द्र [ परमात्मा ] के [ दिये ] जठर को कोई नहीं नष्ट करता है। (वरुणस्य उदरे इति) वरुण [ सबसे श्रेष्ठ परमात्मा ] के [ दिये हुये ] उदर में [ तुझे मैं रखता हूँ-यह ब्राह्मण वचन उसने कहा ]। ( वरुणस्य उदरं किंचन नहि हिनस्ति इति ) वरुण [ परमात्मा ] के [ दिये ] उदर को कोई नहीं नष्ट करता है ॥ २ ॥ भावार्थः-यहाँ प्रजापति प्रजारूप शरीर के अवयवों का पालने वाला जीवात्मा है, रुद्र सर्वज्ञ सर्वकर्ता परमात्मा और यज्ञ परमाणुओं के संयोग से बना हुआ शरीर है ॥ प्रजापति के रुद्र को यज्ञ से अलग करने पर भग, सविता, पूषा, इध्म और बर्हि, यह पाँचों तत्त्व अपना अपना कर्म करने में असमर्थ होते हैं। ज्ञानी पुरुष ही परमात्मा की सत्ता को सब के भीतर काम करता हुआ देखता है ॥ २ ॥ विशेषः १--इस कण्डिका में उस पौराणिक कथा का मूल सा भान होता हैं जिसमें दक्ष वा प्रजापति ने शिव वा रुद्र को भाग न दिया था। शिव की स्त्री सती उस यज्ञ में भस्म हो गयी, शिव के गणों ने यज्ञ को और दक्ष को विध्वंस कर दिया, उपस्थित देवता घायल हुये। फिर शिव का क्रोध विष्णु के बीच में पड़ने से शान्त हुआ ॥ विशेषः २-प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित दिये जाते हैं- १-देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां प्रसूत आरभे-अथ० १६ । ५१ । २, भेद से यजु० २ । ११ तथा २० । ३ ॥ [ हे शूर ! ] ( देवस्य ) प्रकाशमान, ( सवितुः ) सर्वोत्पादक [ परमेश्वर ] के ( प्रसवे ) बड़े ऐश्वर्य के बीच, ( अश्विनोः ) सब विद्याओं में व्याप्त दोनों [ माता पिता ] के ( बाहुभ्याम् ) दोनों भुजाओं से और ( पूष्णः ) पोषक [ आचार्य ] के ( हस्ताभ्याम् ) दोनों हाथों से ( प्रसूतः ) प्रेरणा किया हुआ मैं ( त्वा ) तुझको ( आरभे ) ग्रहण करता हूं । २- देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् । प्रतिगृह्णा- म्यग्नेष्ट्वास्येन प्राश्नामि--यजु० २ । ११ ॥ [ हे अन्न ! ] ( देवस्य ) हर्ष देने वाले ( सवितुः ) और सबके उत्पन्न करने वाले परमेश्वर के [ उत्पन्न किये हुये ] ( प्रसवे ) संसार में विद्यमान (त्वा ) तुझ [ भक्ष्य पदार्थ ] को ( अश्विनोः ) प्राण और अपान के ( बाहुभ्याम् ) आकर्षण और धारण गुणों से तथा ( पूष्णः ) पुष्टिकारक समान वायु के ( हस्ताभ्याम् ) शोधन और शरीर के अङ्ग अङ्ग में पहुँचाने के गुण से ( प्रतिगृह्णामि ) अच्छे प्रकार ग्रहण करता हूं, ( अग्नेः ) प्रज्वलित अग्नि के बीच में पकाकर ( त्वा ) तुझ [ भक्ष्य पदार्थ ] को ( आस्येन ) अपने मुख से ( प्र अश्नामि ) भोजन करता हूं ॥ पावकस्य परमेश्वरस्य ( आस्येन ) असु क्षेपणे-ण्यत् । मुखेन ( प्राशितम् ) प्रकर्षेण भक्षितम् ( इन्द्रस्य ) ईश्वरस्य दत्ते-इति शेषः ( जठरे ) कुक्षौ ( वरुणस्य ) वरणीयस्य । सर्वोत्कृष्टस्य ( उदरे ) उदि दृणोतेरलचौ पूर्वपदान्त्यलोपश्च (उ० ५ । १६) उद्+दृ विदारणे -अल् अच् वा, उद् इत्यस्य तलोपः । नाभिस्तनयोर्मध्यभागे ॥०