गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 319, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० १३;१४ २८१ सह आरभते, ऋद्ध्या एव ऋध्नोति ) अमावास्या [ इष्टि ] सरस्वती और पौर्णमास [ यज्ञ ] सरस्वन् है, इसलिए इन दोनों को ही साथ साथ वह आरम्भ करता है और समृद्धि से ही वह बढ़ता है ॥ १२ ॥ भावार्थ :-मनुष्य दर्शेट्टि और पूर्णमास यज्ञ यथाविधि करके पदार्थों की शुद्धि से यथावत् लाभ उठावें ॥ १२ ॥ कण्डिका १३ ॥ अग्नये पथिकृतेऽष्टाकपालं निर्वपेद्यस्य प्रज्ञानेष्टिरिति पद्यते बहिष्पथं वा एष एति यस्य प्रज्ञातेष्टिरिति पद्यते अग्निर्वैदेवानां पथिकृत्तमेव भागधेयेनोपासरत्स एनं पन्थानमपिनयत्यनङ्गा दक्षिणा स हि पन्थानमभिव इति ॥ १३ ॥ कण्डिका १३ ॥ मार्गकर्ता अग्नि के लिए अष्टाकपाल चरु ॥ ( पथिकृते अग्नये अष्टाकपाल निर्वपेत्, यस्य प्रज्ञाता इष्टिः पद्यते इति ) मार्ग करने वाले अग्नि के लिए आठ पात्रों में धरे हुए [ चरु ] को वह पुरुष होमे, जिसकी अच्छे प्रकार जानी हुई इष्टि चले [ प्रवृत्त हो ] । ( एषः वै वहिष्पथम् एति यस्य प्रज्ञाता इष्टिः पद्यते इति ) वह ही बाहिर वाले मार्ग को पाता है जिसकी अच्छी प्रकार जानी हुई इष्टि चलती है। (अग्निः वै देवानां पथिकृत्, तम् एव भागधेयेन उपासरत्) अग्नि ही देवों का मार्ग करने वाला है, उसको ही भाग दान से वह [ यजमान ] प्राप्त करे । ( सः एनं पन्थानम् अपनियति : वह [ अग्नि ] इस [ यजमान ] को मार्ग से ही ले चलता है । ( अनङ्गा दक्षिणा ) बिना अङ्गों वाली [ सम्पूर्ण ] दक्षिणा [ प्रतिष्ठा ] दक्षिणा है ? [ दक्षिणा के विषय में क० ५ भी देखो ] । ( सः हि पन्थानम् अभिवः इति) वह ही [ यजमान ] मार्ग को सब ओर से स्वीकार करता है ॥ १३ ॥ भावार्थ :-जैसे यज्ञ में अग्नि की स्थापना मुख्य कर्म है, वैसे ही शरीर में अग्नि वा बल की स्थिति आवश्यक है ॥ १३ ॥ कण्डिका १४ ॥ अग्नये व्रतपतयेऽष्टाकपालं निर्वपेद् य आहिताग्निः १सन् प्रवसेद् बहु वा एष व्रतमतिपातयति य आहिताग्निः सन् प्रवसति व्रत्येऽहनि स्त्रियं वोपैति मांसं वाश्नात्यग्निर्वै देवानां व्रतपतिरग्निमेतस्य व्रत मगात्तस्मादेतस्य व्रतमालम्भयते ॥१४॥ कण्डिका १४ ॥ व्रतपालक अग्नि के लिये अष्टाकपाल चरु, और व्रत में स्त्रीगमन और मांसभक्षण का निषेध ॥ ( व्रतपतये अग्नये अष्टाकपाल निर्वपेत् यः आहिताग्निः सन् प्रवसेत् ) १३-( पथिकृते ) मार्गकर्त्रे । मार्गदर्शकाय ( प्रज्ञाता ) प्रकर्षेण ज्ञाता ( पद्यते ) गच्छति । प्रवर्त्तते ( भागधेयेन ) भागदानेन ( उपासरत् ) उपगच्छति । प्राप्नोति ( अनङ्गा ) अङ्गरहिता । सम्पूर्णा (अभिवः) अभिवृणोति । स्वीकरोति ॥ १. पू. सं. 'सम्पवसेत्' इति पाठः ॥ समा० ॥