भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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२८२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० १५ ॥ व्रतपालक अग्नि के लिए आठ पात्रों में भरे हुए [ चरु ] को वह होमे, जो पुरुष [ यज्ञ के लिए ] अग्नि स्थापित किये हुये होकर विदेश में बसे । ( एषः वै बहुव्रतम् अतिपातयति, यः आहिताग्निः सन् प्रवसति वा व्रत्ये अहनि स्त्रियम् उपैति वा मांसम् अश्नाति ) वह पुरुष आहिताग्नि होते हुये भी बहुत व्रत को नष्ट कर देता है, जो अग्नि स्थापित किये हुये विदेश में बसे अथवा व्रत योग्य दिन में स्त्री के पास जावे अथवा मांस [ रोचक वा उत्तेजक पदार्थ ] खावे । ( अग्निः वै देवानां व्रतपतिः, अग्निम् एतस्य व्रतम् अगात् ) अग्नि ही देवों [ विद्वानों ] का व्रतपालक है, अग्नि को इस [ यजमान ] का व्रत प्राप्त होता है । ( तस्मात् एतस्य व्रतम् आलम्भयते ) इसलिये वह इस [ अग्नि ] के व्रत को स्पर्श करता है [ स्वीकार करता है ] ॥ १४ ॥ भावार्थ :- विदेश में बसता हुआ भी यज्ञ करता रहे और यज्ञ के दिनों में यजमान वह कर्म न करे जिससे श्रम वा काम वा क्रोध उत्पन्न होवे ॥ १४ ॥ कण्डिका १५ ॥ अग्नये व्रतभृतेऽष्टाकपालं निर्वपेद्य आहिताग्निरार्त्तिजमश्रु कुर्यादानीतो वा एष देवानां य आहिताग्निस्तस्मादेतेनाश्रु न कर्त्तव्यं न हि देवा अश्रु कुर्वन्त्यग्निर्वै देवानां व्रतभृदग्निमेतस्य व्रतमगात्तस्मादेतस्य व्रतमालम्भयते ॥ १५ ॥ कण्डिका १५ ॥ व्रतपोषक अग्नि के लिए अष्टाकपाल चरु ॥ ( व्रतभृते अग्नये अष्टाकपालं निर्वपेत् यः आहिताग्निः आर्तिजम् अश्रु कुर्यात् ) व्रतपोषक अग्नि के लिये आठ कपालों में घरे हुये [ चरु ] को वह पुरुष होमे, जो अग्नि स्थापित किये हुये होकर पीड़ा से उत्पन्न आंसू को बहावे । ( एषः वै देवानाम् आनीतः यः आहिताग्निः ) वह पुरुष ही देवों [ विद्वानों ] का लाया हुआ है जो अग्नि स्थापित किये हुये है । ( तस्मात् एतेन अश्रु न कर्तव्यं हि देवाः अश्रु न कुर्वन्ति ) इसलिये यह [ यजमान ] आंसू न बहावे, क्योंकि देवता लोग आंसू नहीं बहाते हैं। ( अग्निः वै देवानां व्रतभृत्, अग्निम् एतस्य व्रतम् अगात् ) अग्नि ही देवों [ विद्वानों ] का व्रतपोषक है, अग्नि को इस [ यजमान ] का व्रत प्राप्त होता है । ( तस्मात् एतस्य व्रतम् आलम्भयते ) इस लिए वह इस [ अग्नि ] के व्रत को स्पर्श करता है [ स्वीकार करता है ] ॥ १५ ॥ १४-( व्रतपतये ) व्रतपालकाय ( आहिताग्निः ) यज्ञाय स्थापिताग्निः ( प्रवसेत् ) विदेशे वासं कुर्यात् ( अतिपातयति ) विनाशयति ( व्रत्ये ) व्रत- योग्ये ( मांसम् ) मनेर्दीर्घश्च ( उ० ३ । ६४ ) मन ज्ञाने—सप्रत्ययो दीर्घश्च । मांसं माननं वा मानसं वा मनोऽस्मिन्त्सीदतीति वा—निरु० ४ । ३ । रोचकं समुत्तेजकं वा पदार्थम् ( अश्नाति ) भक्षयति ( अगात् ) इण् गतौ—लुङ् । अगमत् । प्राप्तम् ( आलम्भयते ) स्पृशति । स्वीकरोति ॥ १५-( व्रतभृते ) व्रतपोषकाय ( आर्तिजम् ) पीडाजनितम् ( अश्रु ) जश्वादयश्च ( उ० ४ । १०२ ) अशूङ् व्याप्तौ—रुप्रत्ययः । अश्नुते व्याप्नोति नेत्र- मद्दर्शनाय । नेत्रजलम् ॥