गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 336, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें२६८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० २४ ॥ यज्ञ में [ ऋषियों के लिये सत्कार में एक सामिधेनी ऋचा को तीन बार ] पढ़ता है । ( यजमानं नेत् प्रमृणजानीति ) [ उत्तर ] वह यजमान को नहीं मारता है [ अमर करता है ] । ( अथ यत् पितृमन्तं सोमं, सोमवतः पितॄन्, बर्हिषदः पितॄन्, अग्निष्वात्तान् पितॄन् आवाहयन्ति ) फिर जब श्रेष्ठ माता पिता वाले सोम [ प्रेरक पुरुष ] को, सोम [ बड़े ऐश्वर्य ] वाले पितरों [ माता पिता आदि ज्ञानियों ] को, वृद्धिकारक व्यवहार में बैठने वाले पितरों को और अग्निष्वात्ता[ अग्नि अर्थात् बिजुली सूर्य और अग्नि विद्या तथा शारीरिक और आत्मिक तेज ग्रहण करने वाले ] पितरों को वे बुलाते हैं [ अथर्व० १८ । ४ । ७१-७४ भी देखो ] । ( एके ह स्वं महिमानं न आवाहयन्ति यजमानस्य एव एषः महिमा इति वदतः आवाहयेत् इति, तु अग्नेः एव हि एषः महिमा स्थितं भवति ) कोई कोई अपनी महिमा को नहीं बुलवाते हैं—यह यजमान की ही महिमा है—ऐसा कहते हुए पुरुषों को वह बुलवावे, किन्तु अग्नि [ विद्वान् पुरुष ] की ही यह महिमा स्थित होती है । ( ओं स्वधा इति आश्रावयति, स्वधा अस्तु इति प्रत्याश्रावयति, स्वधाकारः हि पितृणाम् ) ओम् स्वधा [ यह अन्न वा जल ] है—ऐसा वह बोलता है, स्वधा होवे—ऐसा वह उत्तर में बोलता है, स्वधाकार [ अन्न वा जल का व्यवहार ] ही पितरों के लिये है । ( अथ यत् प्रयाजानुयाजेभ्यः बर्हिष्मन्तौ उद्धरति, प्रजा वै बर्हिः प्रजां पितृषु नेत् दधाति इति ) फिर जब प्रयाज अनुयाज यज्ञों के लिये दो बर्हि [ वृद्धिकारक व्यवहार वा कुश ] वाले मन्त्रों को वह बोलता है, प्रजा ही बर्हि [ कुश घास के समान वृद्धिकारक ] है, प्रजा को पितरों में वह नहीं धारण करता है [ अर्थात् प्रजा से पितरों का अधिक आदर करता है ] । ( ते वै षट् सम्पद्यन्ते, षट् वै ऋतवः, ऋतवः पितरः, पितॄणाम् आप्त्यै ) सः+करोतेः—क्विप् । तुगागमः विभक्तिलोपः । साधुकर्माणः । उचितकर्मकर्तारः ( आर्षे ) ऋषिनिमित्ते ( नेत् ) निषेधे ( प्रमृणजा¹नीति ) पार्यतेरजिः ( उ० १ । १३६ ) प्र+मृ हिंसायाम्—अजिः । प्रमृणज्-क्विप् । नामधातोः—शप् श्ना इति द्वौ विकरणौ । प्रकर्षेण मृणति हिनस्ति ( सोमम् ) प्रेरकपुरुषम् ( पितृमन्तम् ) प्रशस्तमातापितृभ्यां युक्तम् ( पितॄन् ) मातापित्रादिपालकज्ञानिनः ( सोमवतः ) परमैश्वर्ययुक्तान् ( बर्हिषदः ) बर्हिषि वृद्धिकरे व्यवहारे सदनशीलान् ( अग्निष्व. तान् ) अग्नि+सु+आङ्+ददातेः—क्तः । अग्निः सूर्यविद्युदग्निविद्या शारीरिक आत्मिकतेजो वा आत्तं गृहीतं यैस्तान् ( एके ) केचित् ( वदतः ) कथयतः ( स्थितम् ) स्थितः ( स्वधा ) अन्नम्—निघ० २ । ७ । उदकम्—निघ० १ । १२ । ( आश्रावयति ) उच्चारयति ( प्रत्याश्रावयति ) अङ्गीकरोति ( बर्हिष्मन्तौ ) वृद्धिकरव्यवहारयुक्तौ मन्त्रौ ( ते ) पितरः ॥ १ शब्दों की इस प्रकार असाधारण सिद्धि का उदाहरण मिलना अत्यन्त दुर्लभ है । बार २ व्याकरण के नियमों की उपेक्षा करने के बाद भी यह शब्द भली प्रकार सिद्ध नहीं हो सका है । वास्तव में तो बाहुलक से श्नम् विकरणयुक्त मृज् धातु के लोट् लकार उत्तम पुरुष एकवचन का "प्रमृणजानि" प्रयोग समीचीन जान पड़ता है ॥ सम्पा० ॥