गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 360, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें३२२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० ७ हम हरावें--सो उन्होंने यह नगर बनाये, हविर्धान [ अन्न स्थान ] सूर्य से, आग्नीध्र [ यज्ञ में अग्नि जलाने का स्थान ] अन्तरिक्ष से और सद [ बैठने का स्थान ] पृथिवी से । ( ते देवाः अब्रुवन्, उपसदम् उपायाम, उपसदा वै महापुरं जयन्ति इति ) वे देवता बोले--उपसद् [ यज्ञ विशेष वा पास पास पहुंचने की क्रिया ] को हम करें, उपसद् से ही बड़े नगर को लोग जीतते हैं । ( ते एभ्यः लोकेभ्यः निरघ्नन्, एकया अमुष्मात् लोकात् एकया अन्तरिक्षात्, एकया पृथिव्याः ) उन्होंने [ असुरों को ] इन लोकों से मार निकाला, एक [ उपसद् ] द्वारा उस [ सूर्य ] लोक से, एक के द्वारा अन्तरिक्ष से और एक के द्वारा पृथिवी से । ( तस्मात् आहुः, उपसदा वै महापुरं जयन्ति इति ) इसलिये कहते हैं--उपसद् द्वारा ही बड़े नगर को लोग जीतते हैं । ( ते एभ्यः लोकेभ्य निर्हताः ऋतून् प्राविशन् ) वे [ असुर ] इन लोकों से निकाले गये होकर ऋतुओं में प्रविष्ट हुये । ( ते षट् उपायन् तान् उपसद्भिः एव ऋतुभ्यः निरघ्नन्, द्वाभ्याम् अमुष्मात् लोकात् द्वाभ्याम् अन्तरिक्षात् द्वाभ्यां पृथिव्याः) उन [ देवताओं ] ने छह [ उपसदों ] को प्राप्त किया, उन [ असुरों ] को उपसदों द्वारा ऋतुओं से निकाल दिया--दो [ उपसद् ] द्वारा उस लोक से, दो के द्वारा अन्तरिक्ष से और दो के द्वारा पृथिवी से [ अर्थात् दो दो महीने वाले छह ऋतुओं के लिये छह उपसद् किये ] । ( ते ऋतुभ्यः निर्हताः संवत्सर प्राविशन् ) वे [ असुर ] ऋतुओं से निकाले गये होकर संवत्सर में प्रविष्ट हुये । ( ते द्वादश उपायन् तान् उपसद्भिः एव संवत्सरात् निरघ्नन्, चतसृभिः अमुष्मात् लोकात् चतसृभिः अन्तरिक्षात्, चतसृभिः पृथिव्याः ) उन [ देवताओं ] ने बारह [ उपसदों ] को प्राप्त किया, उन [ असुरों ] को उपसदों द्वारा ही संवत्सर से निकाल दिया--चार [ उपसदों ] द्वारा उस लोक से, चार के द्वारा अन्तरिक्ष से और चार के द्वारा पृथिवी से [ चातुर्मास्य यज्ञ के लेने से चार चार का ग्रहण किया है ] । ( ते संवत्सरात् निर्हताः अहोरात्रे प्राविशन् ) वे [ असुर ] संवत्सर से निकाले गये होकर दिन रात्रि में प्रविष्ट हुये । ( ते यत् सायम् उपायन् तेन एनान् रात्र्याः अनुदन्त, यत् प्रातः, तेन अह्नः ) उन [ देवताओं ] ने जो सायंकाल [ के उपसद् ] को प्राप्त किया, उस [ कर्म ] से इन [ असुरों ] को रात्रि से निकाल दिया, जो प्रातःकाल [ उपसद् किया ], उसके द्वारा दिन से [ उन्हें निकाल दिया ] । ( तस्मात् गौः सायम्प्रातः स्तनम् आप्यायते ) इसलिये गौ सायंकाल और प्रातःकाल पिन्हाती है [ अर्थात् यह दोनों काल अधिक स्वास्थ्यकारक हैं ] । ( प्रातः सायन्तनम् तान् उपसद्भिः एव एभ्यः लोकेभ्यः नुदमानाः आयन् ) प्रातःकालं और सायंकाल उन [ असुरों ] को उपसदों [ पास बैठने वा उपासना आदि क्रियाओं ] के द्वारा ही इन लोकों से निकालने वाले वे [ देवता ] हुये हैं । ( ततः देवाः असुराः परा अभवन् ) इसी से देवताओं ने असुरों को हराया । ( सर्वेभ्यः एव एभ्यः ( उपसदम् ) उप + पदॢ विशरणगतिहिंसनेषु-क्विप् । समीपोपवेशनक्रियाम् । यज्ञविशेषम् ( उपायाम ) उप + आङ् + या गतौ--लोट् । अनुतिष्ठाम (निरघ्नन्) निःसारितवन्तः ( उपायन् ) उप + इण् गतौ-लङ् । सम्पादितवन्तः (आप्यायते) वर्धते दुग्धेन ( सायन्तनम् ) सायं चिरंप्राह्णे० ( पा० ४ । ३ । २३ ) स्वार्थे ट्यु तुट् च । सायङ्काले ( नुदमानाः ) प्रेरयन्तः ( उपैति ) अनुतिष्ठति ॥