भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 369, कुल 600 में से

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पृष्ठ 369

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० ११ ३३१ यज्ञ को असुरों से छिपाकर चलाओ, हम उनके ऊपर होकर [ उनको ] गिरावें । ( तम् आच्छाद्य एताभिः उदक्रामन्, यजूंषि यज्ञे समिधः स्वाहा इति ) उस [ यज्ञ ] को छिपाकर इन [ ऋचाओं ] से उन्होंने चढ़ाई की---( यजूंषि ) पूजनीय कर्मों और ( समिधः ) विद्या आदि प्रकाश क्रियाओं को ( यज्ञे ) संगति व्यवहार में ( स्वाहा ) उत्तम वाणी से......[ अथर्व० ५ । २६ के १२ मन्त्रों की यह प्रतीक है ] । ( तं यज्ञं तिरः असुरेभ्यः उपरि अतन्वत, एषाम् असुराणां तं यज्ञं नु अवायन् ततः देवाः न परा अभवन्, असुराः ) उस [ अपने ] यज्ञ को छिपाकर असुरों से ऊपर होकर उन्होंने विस्तृत किया, और इन असुरों के उस यज्ञ को निःसन्देह सुखा दिया, उससे देवता न हारे और असुर [ हार गये ] । ( सः यः एवं विद्वान् असुरेभ्यः उपरि यज्ञं तिरः तनुते, अस्य अप्रियः भ्रातृव्यः आत्मना पराभवति भवति ) जो कोई ऐसा विद्वान् असुरों से ऊपर होकर यज्ञ को छिपाकर [ गुप्त रीति से विचार कर ] विस्तृत करता है, उसका कुप्रिय बैरी आत्मबल से हार जाता है, हार जाता है । ( सः एतैः एव जुहुयात् वृतयज्ञे चतुर्भिः चतुर्भिः अन्वाख्याय प्रातरनुवाकस्य पुरस्तात् जुहुयात् ) वह इन [ बारह मन्त्रों ] से ही यज्ञ करे और स्वीकार किये हुये यज्ञ में चार चार [ मन्त्रों ] से व्याख्यान करके प्रातरनुवाक यज्ञ के पहिले यज्ञ करे । ( एतावान् वै यज्ञः, यावान् एषः यज्ञः तं वृङ्क्ते सः यज्ञः भवति इतरः अयज्ञः ) इतना ही यज्ञ है जितना यह यज्ञ उस [ शत्रु ] को रोकता है, वह यज्ञ होता है और दूसरा [ असुरों का ] कुयज्ञ । ( एतैः एव द्वादशाहस्य पुरस्तात् जुहुयात् ) इन ही [ बारह ] से द्वादशाह [ बारह दिन वाले यज्ञ ] के पहिले यज्ञ करे । ( एषः ह वै प्रत्यक्षं द्वादशाहः तम् एव आलभ्य एतैः एव दीक्षायाः पुरस्तात् जुहुयात् ) यह ही प्रत्यक्ष द्वादशाह [ बारह दिन वाला यज्ञ ] है, उसको ही प्राप्त होकर इन [ बारह मन्त्रों ] से ही दीक्षा [ नियम व्रत धारण ] के पहिले यज्ञ करे । ( एषा ह वै प्रत्यक्षं दीक्षा, ताम् एव आलभ्य एतैः एव आतिथ्यम् अभिमृशेत्, यज्ञेन यज्ञम् अयजन्त देवाः इति ) यह ही प्रत्यक्ष दीक्षा है, उस [ दीक्षा ] को ही प्राप्त होकर इन [ आगे के पांच मन्त्रों ] से आतिथ्य [ अतिथि सत्कार ] को विचारे - ( देवाः ) विद्वानों ने ( यज्ञेन ) अपने पूजनीय कर्म से ( यज्ञम् ) पूजनीय परमात्मा को ( अयजन्त ) पूजा है......[ अथर्व० ७ । ५ के पांच मन्त्रों की यह प्रतीक है ] ॥ ११ ॥ भावार्थः-जो नीतिकुशल मनुष्य अपने कर्त्तव्यों को शत्रुओं से गुप्त रखकर करते रहते हैं, वे युद्ध में जीत पाते हैं ॥ ११ ॥ विशेषः-प्रतीक वाले मन्त्रों में से एक एक मन्त्र अर्थ सहित दिया जाता है, शेष वेद में देखो । लेट् । अस्याम, क्षिपाम ( एताभिः ) वक्ष्यमाणाभिः ऋग्भिः ( नु ) अवधारणे ( अवायन् ) ओवै शोषणे-लङ् । शोषितवन्तः । नाशितवन्तः ( अन्वाख्याय ) आख्यानं व्याख्यानमनुसृत्य ( वृङ्क्ते ) वृजी वर्जने । वर्जयति ( आलभ्य ) प्राप्य । ( आतिथ्यम् ) अतिथिसत्कारम् ( अभिमृशेत् ) विचारयेत् ॥