गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें३३६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० १३ ॥ कण्डिका १३ ॥ आख्यायिका--वसिष्ठ ने इन्द्र को देखा और इन्द्र ने उसे स्तोम भागों द्वारा ब्रह्मज्ञान बताया ॥ ( ऋषयः वै इन्द्रं प्रत्यक्षं न अपश्यन् ) ऋषियों [ इन्द्रियों ] ने निश्चय करके इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले परमात्मा ] को साक्षात् न देखा । ( तं वसिष्ठः एव प्रत्यक्षम् अपश्यत् ) उसको वसिष्ठ [ अत्यन्त बसने वाले जीवात्मा ] ने ही साक्षात् देखा । ( सः अबिभेत्, इतरेभ्यः ऋषिभ्यः मा प्रवोचत् इति ) वह [ इन्द्र ] डरा—यह [ वसिष्ठ ] नीच ऋषियों [ इन्द्रियों ] से न कह देवे । ( सः अब्रवीत् ब्राह्मणं ते वक्ष्यामि, यथा त्वत् पुरोहिताः प्रजाः प्रजनिष्यन्ते ) वह [ इन्द्र ] बोला—[ हे वसिष्ठ ] मैं तुझे ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञान ] बताऊंगा, जिससे तुझे पुरोहित [ मुखिया ] रखती हुई प्रजायें उत्पन्न होंगी । ( अथ इतरेभ्यः ऋषिभ्यः मा प्रवोचत् ) इसलिये नीच ऋषियों [ इन्द्रियों ] से आप न कहें । ( तस्मै एतान् स्तोमभागान् उवाच ) उस [ वसिष्ठ ] को यह [ आगे वाले ] स्तोमभाग [ स्तुतियों के भाग ] उसने बताये । ( ततः वसिष्ठपुरोहिताः प्रजाः प्राजायन्त ) फिर वसिष्ठ [ जीवात्मा ] को पुरोहित रखती हुई प्रजायें [ इन्द्रिय आदि ] उत्पन्न हुये । ( स्तोमः वै एतेषां भागः, तत् स्तोमभागानां स्तोमभागयज्ञं प्राह ) स्तोम [ स्तुतियोग्य व्यवहार ] ही इन [ मनुष्यों ] का भाग [ सेवनीय है इसलिये स्तुति योग्य व्यवहार के सेवन करने वाले पुरुषों के स्तुति योग्य व्यवहार से सेवनीय यज्ञ [ पूजनीय कर्म ] को वह [ इन्द्र परमात्मा वेद द्वारा ] बताता है१ । ( प्रेतिः असि धर्मणे त्वा इति १, घर्मः मनुष्याः, मनुष्येभ्यः एव यज्ञं प्राह ) [ हे परमात्मन् ! ] तू उत्तमता से व्यापक है, धर्म [ वेदविहित व्यवहार ] के लिए तुझे [ ग्रहण करता हूं ], धर्म वाले ही मनुष्य हैं, मनुष्यों को १३-( ऋषयः ) ऋषी गतौ दर्शने च-इन् कित् । सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे—यजु० ३४ । ५५ । सप्त ऋषयः षडिन्द्रियाणि विद्या सप्तमी—निरु० १२ । ३७ । इन्द्रियाणि ( इन्द्रम् ) परमैश्वर्यवन्तं परमात्मानम् ( वसिष्ठः ) वस निवासे- तृच् । तुश्छन्दसि ( पा० ५ । ३ । ५६ ) वसितु-इष्ठन् । तुरिष्टेमेयस्सु ( पा० ६ । ४ । १५४ ) तृशब्दलोपः । अतिशयेन वसिता निवासकः । जीवात्मा ( इतरेभ्यः ) पामरेभ्यः ( त्वत्पुरोहिताः ) प्रत्ययोत्तरपदयोश्च ( पा० ७ । २ । ९८ ) युष्म् इत्यस्य त्व इत्यादेशः । त्वं पुरोहितः प्रधानो यासां ताः ( रश्मिः ) अश्नोतेरश्च ( उ० ४ । ४६ ) अशूङ् व्याप्तौ-मिः, धातोः रशादेशः । व्यापकः । किरणः । प्रकाशः ( क्षयाय ) निवासाय ( प्रेतिः ) क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम् ( पा० ३ । ३ । १७४ ) प्र + इण् गतौ-क्तिच् । प्रकर्षेण गन्ता । व्यापकः ( धर्मणे ) शास्त्रविहितव्यवहाराय १. यहाँ पाठच्युति होने से भाष्यकार का यह अर्थ असम्बद्ध है। कण्डिका में हमारे द्वारा परिवर्धित पाठ का निम्न तात्पर्यार्थ है—यह स्तोमों का स्तोमभागत्त्व है। [ हे यज्ञ ] तुम क्षयों के लिए प्रकाशस्वरूप हो । देवताओं को क्षय कहते हैं। इस प्रकार देवताओं के लिए यज्ञ का सम्बन्ध इन्द्र ने बताया ॥ सम्पा० ॥