गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 430, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें५९२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १५ समाहरतामच्छावाकीयाम्। तस्मादच्छावाकः प्रातःसवन ऐन्द्राग्नानि शंसति। तौ हास्यैतद्यज्ञस्याङ्गमनुसमाहरताम्। यद्वैवेन्द्राग्नानि शंसति, प्रातर्यावभिरागतन्देवे- भिर्जेन्यावसू। इन्द्राग्नी सोमपीतय इति, ऋचाभ्यनूक्तम्। इन्द्राग्नी आगतन्तोशा वृत्रहणा हुव इति, अच्छावाकस्य स्तोत्रियानुरूपौ। इन्द्राग्नी अपसस्परीत्युक्थमुखम्। इहेन्द्राग्नी उपह्वय इति पर्यासः। इन्द्राग्नी आगतमिति, यजति। एते एव तद्देवते यथाभागं प्रीणाति वषट्कृत्यानुवषट् करोति। प्रत्येवाभिमृशन्ते नाप्याययन्ति न ह्यनाराश१ꣳ साः सीदन्ति ॥ १५ ॥ कण्डिका १५ ।। प्रातःसवन में अच्छावाक द्वारा इन्द्र और अग्नि की स्तुति ॥ (इन्द्राग्नी अब्रवीत्, युवां नः यज्ञस्य इमम् अङ्गम् अच्छावाकीयाम् अनुसमा- हरतम्) वह [ यजमान ] इन्द्र और अग्नि [ वायु और विजुली के समान अध्यापक और उपदेशक दोनों ] के विषय में [ ब्रह्मा और होता से ] बोला—तुम दोनों हमारे यज्ञ के इस अङ्ग को अच्छावाक वाली [ स्तुति ] से अनुकूलता के साथ समाप्त करो। ( तथा इति अब्रूताम् ) ऐसा ही हो—वे दोनों [ ब्रह्मा और होता ] बोले। ( तौ सयुजौ सबलौ प्रासहा भूत्वा मृत्युम् अति ऐताम् ) [ और ] वे दोनों [ इन्द्र और अग्नि ] समान योग [ मेल ] वाले, समान बल वाले और विजयी होकर मृत्यु को लांघ कर चले हैं, ( तौ हि अस्य यज्ञस्य एतत् अङ्गम् अच्छावाकीयाम् अनुसमाहरताम् ) उन दोनों ने ही इस यज्ञ के इस अङ्ग को अच्छावाक वाली [ स्तुति ] से अनुकूलता के साथ समाप्त किया है। ( तस्मात् अच्छावाकः प्रातःसवने ऐन्द्राग्नानि शंसति ) इसलिये अच्छावाक [ऋत्विज्] प्रातः सवन में इन्द्र और अग्नि वाले [ स्तोत्र ] बोलता है। ( तौ हि अस्य यज्ञस्य एतत् अङ्गम् अनुसमाहरताम् ) वे दोनों [ इन्द्र और अग्नि ] ही इस यज्ञ के इस अङ्ग को अनुकूलता से पूरा करें। ( यत् उ एव ऐन्द्राग्नानि शंसति, प्रातर्यावभिरागतं देवे- भिर्जेन्यावसू। इन्द्राग्नी सोमपीतये--इति ऋचा अभ्यनूक्तम् ) क्योंकि वह ही [ अच्छा- वाक ] इन्द्र और अग्नि वाले स्तोत्र [ इस प्रकार ] पढ़ता है—[ प्रातर्यावभिरा······ऋग्० ८ । ३८ । ७ ]—यह इस ऋचा करके अनुकूल कहा गया है। ( इन्द्राग्नी आगतम्, तोशा वृत्रहणा हुवे इति अच्छावाकस्य स्तोत्रियानुरूपौ) हे इन्द्र और अग्नि ! तुम दोनों आओ— ऋ० ३ । १२ । १, सन्तुष्ट करने वाले शत्रुओं के मारने वाले दोनों को मैं बुलाता हूँ—ऋ० ३ । १२ । ४—यह अच्छावाक के स्तोत्र के अनुकूल दो [ मन्त्र ] हैं। ( इन्द्राग्नी अपस- स्परि—इति उक्थमुखम् ) हे इन्द्र और अग्नि ! [ वायु और बिजुली के समान सभापति और सेनापति दोनों ] तुम्हारे कर्म के सब ओर—ऋ० ३ । १२ । ७—यह उक्थ यज्ञ का आरम्भ है। ( इहेन्द्राग्नी उपह्वये, इति पर्यासः ) यहाँ पर इन्द्र और अग्नि [ वायु और १५—(अच्छावाकीयाम् ) अच्छावाकसम्बन्धिनीं स्तुतिम् (अच्छावाकः) ऋत्विग् विशेषः ( प्रातर्यावभिः ) गो० उ० २ । २० । प्रातर्गामिभिः ( जेन्यावसू ) गो० उ० २ । २० । जयशीलधनवन्तौ ( सोमपीतये ) अमृतरसपानाय ( तोशा ) तुष प्रीतौ तोषे च—घञ्, षस्य शः। विभक्तेराकारः। तोषौ। सन्तोषको ( वृत्रहणा ) शत्रुनाशकौ