गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 440, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें४०२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० २० उन दोनों का प्रत्युत्तर उस [ साम ] ने स्वीकार न किया । ( ताः तिस्रः भूत्वा उपावदन् ) [ वह ऋक् तीन हो गई ] वे [ सत्त्व रज तम रूप ] तीनों होकर [ साम से उसी प्रकार ] बोलीं । ( यत् तिस्रः भूत्वा उपावदन्, तत् तिसृभिः समभवत् ) जो तीन होकर बोलीं, उससे उसने तीनों के साथ संयोग किया [ सृष्टि करने का सामर्थ्य उनमें दिया ] । ( यत् तिसृभिः समभवत्, तस्मात् तिसृभिः स्तुवन्ति, तिसृभिः उद्गायन्ति, तिसृभिः हि साम सम्मितं भवति ) जो उसने तीनों के साथ संयोग किया, इसलिये तीन [ ऋचाओं ] से वह स्तुति करते हैं और तीन से ही उद्गीथ [ ऊंचा गान ] करते हैं, और तीन से ही साम सम्मानित होता है । ( तस्मात् एकस्य बह्व्यः जायाः भवन्ति, एकस्याः बहवः पतयः सह न ह ) इसलिये एक पुरुष के बहुत पत्नियां होती हैं, और एक पत्नी के बहुत पति एक साथ नहीं होते [ यह वेद विरुद्ध है, आगे विशेषः २ देखो ] । ( यत् उ एतत् सा च अमः च समवदताम्, तत् साम अभवत् ) जो ही इस प्रकार सा [ ऋक् वा प्रकृति ] और अमः [ ज्ञान ] दोनों संयुक्त हुये, वह साम [ मोक्ष दाता ब्रह्म ] हुआ । ( तत् साम्नः सामत्वम् ) वह ही साम [ मोक्ष दाता ब्रह्म ] का सामत्व [ मोक्ष दातापन ] है । ( सामन् भवति श्रेष्ठतां गच्छति ) जो [ मनुष्य ] साम [ साम के समान सुखदायक ] होता है, वह श्रेष्ठता पाता है । ( यः वै भवति सः सामन् भवति ) जो ही पदार्थ सत्ता वाला है वह साम [ ब्रह्म के सामर्थ्य ] में है । ( असामन्यः इति हु निन्दन्ते ) [ जो ऐसा न माने ] वह असामन्यं = श्रेष्ठ नहीं है— इस प्रकार लोग निन्दा करते हैं । ( ते वै पञ्च अन्यत् भूत्वा पञ्च अन्यत् भूत्वा कल्पेताम् ) वे दोनों [ कारण और कार्यरूप ऋक् ] ही पांच एक प्रकार से [ कारण रूप पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश ] होकर और पांच दूसरे प्रकार से [ कार्यरूप पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश ] होकर समर्थ होते हैं । ( आहावः च हिङ्कारः च प्रस्तावः च प्रथमा च उद्गीथः च मध्यमा च प्रतिहारः च उत्तमा च निधनं च वषट्कारः च ) [ सो ही यज्ञ के दश अङ्ग हैं ] आहाव [ आवाहन मन्त्र ] १, और हिङ्कार [ हिं शब्द ] २, ( समभवत् ) समभवनं संयोगं कृतवान् ( सम्मितम् ) सम्मानितम् ( सामन् ) सामवेदेन मोक्षज्ञानेन ( भवति ) सत्तावान् अस्ति ( असामन्यः ) असाधारणः । असमदर्शी । पक्षपाती ( अन्यत् ) एकप्रकारेण । द्वितीयप्रकारेण ( कल्पेताम् ) समर्थे भवताम् ( आहावः ) आह्वानमन्त्रः ( प्रस्तावः ) प्रस्तोत्रा गातव्यः ( उद्- गीथः ) उद्गात्रा गातव्यः ( प्रतिहारः ) प्रतिहर्त्रा गातव्यः ( निधनम् ) अन्ते १. यहाँ पति साम है ऋक् पत्नी है। तीन ऋचाओं को संयुक्त कर साम-गान की प्रक्रिया होती है, अतः एक साम = पति की तीन ऋक् = पत्नियां हुईं । यह पति पत्नी का साम एवं ऋक् को आधार मान कर आलङ्कारिक वर्णन है । अतः "तस्मात् एकस्य बह्व्यः जायाः भवन्ति" वाक्य का अर्थ है-इसलिये एकस्य साम्नः पत्युः = एक साम पति के बहुत सी जायाः = ऋक् पत्नियां होती हैं परन्तु एक ऋक् से अनेक सामगान सम्पन्न नहीं होते अतः "बहवः पतयः सह न" कहा । इसमें कोई अवैदिकता नहीं, क्योंकि यहाँ साम, ऋक् की आलङ्कारिक चर्चा है न कि लौकिक पति पत्नी की ॥सम्पा०॥