गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 444, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें४०६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० २२ वा योग्य स्तोत्र ] वे करते हैं । ( सः उच्चैस्तराम् इव शंस्तव्यः ) वह [ अनुरूप ] ऊंची ध्वनि से ही बोलना चाहिये । ( अस्य प्रजाम् एव तत् श्रेयसीं करोति ) इस [ यजमान ] की प्रजा को ही उसके द्वारा [ यजमान से ] अधिक श्रेष्ठ वह करता है । ( धाय्यां शंसति ) धाय्या [ धारण योग्य स्तुति ] को वह बोलता है । ( पत्नी वै धाय्या ) पत्नी [ के समान ] ही धाय्या है । ( सा नोच्चैस्तराम् इव शंस्तव्या, गृहेषु अस्य पत्नी अप्रतिवादिनी ह एव भवति, यत्र एवं विद्वान् नीचैस्तरां धाय्यां शंसति ) वह नीची ध्वनि से बोलनी चाहिये, घरों में इसकी पत्नी अकटुभाषिणी [ प्रियवादिनी ] ही होती है, जहां ऐसा विद्वान् नीची ध्वनि से धाय्या बोलता है । ( प्रगाथं शंसति ) वह प्रगाथ [ गाने योग्य स्तोत्र ] को बोलता है । ( पशवः वै प्रगाथः ) पशुओं [ के तुल्य ] ही प्रगाथ है । ( सः स्वरवत्या'वाचा शंस्तव्यः ) वह [ प्रगाथ ] अच्छे स्वर वाली वाणी से बोलना चाहिये । ( पशवः वै प्रगाथः पशवः स्वरः, पशूनाम् आप्त्यै ) पशुओं [ के तुल्य ] ही प्रगाथ है, पशुओं [ के तुल्य ] ही स्वर है [ पशु चार पांव वाले होते हैं और अनुदात्त, अनुदात्ततर, उदात्त और स्वरित, चार स्वर हैं ], पशुओं की प्राप्ति के लिये [ वह बोला जाता है ] । ( सूक्तं शंसति ) वह सूक्त [ अच्छा कहा हुआ स्तोत्र ] बोलता है । ( गृहाः वै प्रतिवीतं सूक्तं, तत् प्रतिवीततमया वाचा शंस्तव्यम् ) घरों के समान ही अभीष्ट सूक्त है, वह अत्यन्त अभीष्ट वाणी से बोलना चाहिये । ( सः यद्यपि ह दूरात् पशून् लभते, गृहान् एव एनान् आजिगमिषति ) वह [ कोई पुरुष ] जब ही दूर से पशुओं को [ चरते हुये ] पाता है, घरों को ही उन्हें लाना चाहता है । ( गृहाः हि पशूनां प्रतिष्ठा ) क्योंकि घर ही पशुओं की प्रतिष्ठा [ ठहरने का स्थान ] हैं । ( निविदं शंसति ) निवित् [ निश्चित विद्या वाली स्तुति ] वह बोलता है । ( यत् अन्तरात्मन्, तत् निवित्, तत् एव अस्य तत् कल्पयति ) जो अन्तरात्मा [ अन्तःकरण में वर्तमान पराक्रम ] है, वह निवित् है, उससे ही इस [ यजमान ] के उस [ अन्तरात्मा ] को समर्थ करता है । ( परिधानीयां शंसति ) वह परिधानीया [ स्तुति ] बोलता है । ( प्रतिष्ठा वै परिधानीया, प्रतिष्ठायै एव एनम् अन्ततः प्रतिष्ठापयति ) प्रतिष्ठा [ ठहरने के स्थान के समान अथवा गौरव के समान ] परिधानीया है, प्रतिष्ठा के लिये ही इस [ यजमान ] को अन्त में वह स्थापित करता है । ( याज्यया यजति ) याज्या [ यज्ञ योग्य स्तुति ] से वह यज्ञ करता है । ( अन्नं वै याज्या अस्य अन्नाद्यम् एव तत् कल्पयति ) अन्न ही याज्या [ स्तुति ] है, इस [ यजमान ] के खाने योग्य अन्न को ही उससे वह समर्थ करता है । ( यज्ञस्य एतत् वै मूलम्, यत् धाय्याः च याज्याः च ) यज्ञ का यह ही मूल है, जो धाय्यायैं और याज्यायैं हैं । ( तत् यत् अन्नाः, अन्नात् धाय्याः च याज्याः च कुर्युः ) जो वे अन्न वाली हैं, अन्न के लिये धाय्याओं और याज्याओं को वे [ याजक ] ङीप् । उत्तमतराम् ( शंस्तव्या ) पठितव्या ( अप्रतिवादिनी ) पत्युः प्रतिकूलं वदतीति प्रतिवादिनी तद्विपर्ययेण । अकटुभाषिणी । प्रियभाषिणी ( प्रतिवी- तम् ) प्रति + वी गतिव्याप्तिकान्त्यादिषु-क्तः । अभीष्टम् । अतिप्रियम् ( प्रतिवीत- तमया ) अभीष्टतमया ( लभते ) प्राप्नोति ( आजिगमिषति ) आ + गमेः-सनि रूपम् । आनेतुमिच्छति ( यद्यपि ) यदा हि ( प्रतिष्ठा ) स्थितिस्थानम् ( अन्नाः )