भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 600 में से

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पृष्ठ 446

४०८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० २३ ॥ कण्डिका २३ ॥ माध्यन्दिन सवन के देवता इन्द्र की महिमा ॥ ( तद् आहुः, किंदेवत्यः यज्ञः इति ) फिर वे [ ऋषि ] कहते हैं—कौन देवता वाला यज्ञ है। ( ऐन्द्रः, इति ब्रूयात्, ऐन्द्रे वाव यज्ञे सति यथाभागम् अन्याः देवताः नुअवयन् ) इन्द्र देवता वाला है - ऐसा वह कहे, इन्द्र देवता वाले ही यज्ञ होने पर अपने अपने भाग के अनुसार दूसरे देवता अवश्य आते हैं। (ताः प्रातःसवने मरुत्वतीये तृतीयसवने च ) वे [ देवता ] प्रातःसवन, मरुत्वतीय [ माध्यन्दिन सवन ] और तृतीय सवन में [ आते हैं ]। ( अथ ह इन्द्रस्य एव एतत् केवलं यत् मरुत्वतीयात् ऊर्ध्वम् ) फिर यह इन्द्र का ही केवल [ सेवनीय स्वरूप ] है, जो मरुत्वतीय [ यज्ञ ] से ऊपर है। ( तस्मात् सर्वे निष्केवल्य़ानि शंसन्ति ) इसलिये सब [ याजक ] निष्केवल्य [ केवल इन्द्र के स्तोत्रों ] को बोलते हैं। (यत् एव निष्केवल्य़ानि, तत् स्वर्गस्य लोकस्य रूपम्, यत् उ एव निष्केवल्य़ानि ) जो ही निष्केवल्य [ स्तोत्र ] हैं, वह स्वर्गलोक का रूप है, क्योंकि यही निष्केवल्य [ केवल इन्द्र के स्तोत्र ] हैं। ( अग्रे ह वै एकं सवनं प्रातःसवनम् एव आसीत् ) पहिले निश्चय करके एक सवन प्रातःसवन ही था। ( अथ ह प्रजापतिः एतं [ = एतस्मै ] ज्येष्ठाय पुत्राय इन्द्राय एतत् सवनं निरमिमत, यत् माध्यंदिनं सवनम् ) फिर प्रजापति परमेश्वर ने सबसे बड़े पुत्र इस इन्द्र [ परम ऐश्वर्य्यवान् पुरुष ] के लिये यह सवन बनाया, जो माध्यन्दिन सवन है। ( तस्मात् माध्यन्दिने सवने सर्वे निष्केवल्य़ानि शंसन्ति ) इसलिये माध्यन्दिन सवन में सब [ याजक ] निष्केवल्य [ स्तोत्रों ] को बोलते हैं [ अर्थात् इन्द्र के ही स्तोत्र बोलते हैं ]। (यत् एव निष्केवल्य़ानि तत् स्वर्गस्य लोकस्य रूपम्, यत् उ एव निष्केवल्य़ानि ) जो ही निष्केवल्य [ स्तोत्र ] हैं, वह स्वर्ग लोक का रूप है, क्योंकि यही निष्केवल्य [ केवल इन्द्र के स्तोत्र ] हैं। ( याः ह वै देवताः प्रातःसवने होता शंसति, ताः शस्त्वा होत्राशंसिनः अनुशसंन्ति ) जिन ही देवताओं को प्रातःसवन में होता बुलाता है, उनको स्तुति करके होत्राशंसी [ वेदवाणी से स्तुति करने वाले ऋत्विज् ] पीछे से बुलाते हैं। ( मैत्रावरुणं तृचं प्रउगे होता शंसति, मैत्रावरुणं मैत्रावरुणः अनुशंसाति, तत् उभयं मैत्रावरुणम् ) मैत्रावरुण [ मित्र और वरुण देवता वाले ] तृच [ तीन मंत्रों के समूह ] को प्रउग यज्ञ में होता बोलता है, मैत्रावरुण स्तोत्र को मैत्रावरुण [ ऋत्विज् ] पीछे से बोलता है, वह दोनों [ होता और मैत्रावरुण ऋत्विज् का स्तोत्र ] मित्र और वरुण देवता वाला है। ( ऐन्द्रं तृचं प्रउगे होता शंसति, ऐन्द्रं ब्राह्मणाच्छंसी अनुशंसाति, तत् उभयम् ऐन्द्रम् ) इन्द्र देवता वाले तृच को प्रउग यज्ञ में होता बोलता है, इन्द्र देवता वाले [तृच] को २३—( निष्केवल्य़ानि ) वृषादिभ्यश्चित् ( उ० १ । १०६ ) निः+केवृ सेवने —कलच्, ततो यत् । निरन्तरस्वरूपयुक्तानि । इन्द्रस्तोत्राणि (होत्राशंसिनः ) होत्रा वाङ्नाम-निघ० १ । ११ । वेदवाणीभाषिणः ( अनु ) पश्चात् ( अदेवीः ) विदुषां विरुद्धाः । आसुरीः (असहिएंष्ट) अभ्यभूत् (मायाः ) छलकापटक्रियाः ( अथ ) अनन्तरमेव ( केवलः ) सेवनीयः ( सोमः ) अमृतरसः । मोक्षानन्दः ( अजिघांसन् ) हन्तुमैच्छन् (वामदेवम् ) उत्तमविद्वांसम् (वसिष्ठम्) . अति-