भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 600 में से

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पृष्ठ 455

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ३ ।। ४१७ रूपौ ) तरोभिर्वो विदद्वसुम्... और, तरणिरित् सिषासति..., १, २ यह दो मन्त्र अच्छावाक ऋत्विज् के स्तोत्रिय और अनुरूप हैं। ( उदिन्वस्य रिच्यते...इति बार्हतः प्रगाथः ) उदिन्वस्य रिच्यते...३ यह मन्त्र बृहती छन्द वाला प्रगाथ [ अच्छे प्रकार गाने योग्य स्तोत्र ] है। ( तस्य उक्तं ब्राह्मणम् ) उसका ही कहा गया ब्राह्मण है। ( भूय इद् वावृधे वीर्याय इति उक्थमुखम् ) भूय इद् वावृधे वीर्याय ४ यह मन्त्र उक्थ [ स्तोत्र ] का आरम्भ है। ( इमामू षु प्रभृतिं सातये धाः-इति पर्यासः ) इमामू षु प्रभृतिं सातये धाः,...५ यह मन्त्र [ उक्थ का ] पर्यास [ विराम ] है। ( तस्य दशमीम् उद्धरति ) उस [ सूक्त ] की दसवीं ऋचा [ अस्मे प्र यन्धि-६ ] को उठाकर पढ़ता है। ( घोरस्य आङ्गिरसस्य वै एतत् आर्षं शस्यमानं नेत् यज्ञं निर्दहेत् ) घोर आङ्गिरस का [ ऋषि विशेष का व्याख्या किया हुआ ] यह वेद मन्त्र [ दसवीं ऋचा ] बोलना चाहिये, नहीं तो वह यज्ञ को भस्म कर देवे। ( पिबा वर्धस्व तव घा सुतासः, इति यजति ) पिबा वर्धस्व तव घा सुतासः ७, इस मन्त्र से वह यज्ञ करता है [ याज्या आहुति देता है ] । ( एताम् एव देवतां तत् यथाभागं प्रीणाति, वषट्कृत्य अनुवषट्करोति ) इस ही [ इन्द्र ] देवता को उससे अपने अपने भाग के अनुसार वह प्रसन्न करता है और वषट्कार करके अनुवषट्कार [ अन्तिम आहुति दान ] करता है। ( प्रति एव अभिभृंशन्ते, अनाराशंसाः न आप्याययन्ति न हि सीदन्ति ) वे [ ऋषि लोग] प्रत्यक्ष ही विचारते हैं—नरों की स्तुति के बिना [ यज्ञ यजमान को ] न बढ़ाते हैं और नहीं चलते हैं [ नहीं आप बढ़ते हैं। देखो क० १, २ ] ॥ ३ ॥ भावार्थः—कण्डिका १ के समान है ॥ ३ ॥ विशेषः—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १—तरोभिर्वो विदद्वसुमिन्द्रं सबाध ऊतये । बृहद् गायन्तः सुतसोमे अध्वरे हुवे भरं न कारिणम्-ऋ० ८ । ६६ । १ [ सायण भाष्य ५५ ] ॥ [ हे मनुष्यो ! ] ( भरम् ) पोषण करने वाले ( कारिणं न ) कर्म कुशल के समान ( वः ) तुम्हारे लिये ( तरोभिः ) शीघ्रता से ( विदद्वसुम् ) धन पाने वाले ( इन्द्रम् ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले वीर ] को ( बृहत् ) वृद्धिकारक स्तोत्र ( गायन्तः ) गाते हुये, ( सबाधः ) बाधा में पड़े हुये हम ( ऊतये ) रक्षा के लिये ( सुतसोमे ) सिद्ध किये हुये सोम [ तत्त्व रस ] रखने वाले ( अध्वरे ) हिंसा रहित यज्ञ में ( हुवे = आह्वयामः ) बुलाते हैं ॥ ३—( तरोभिः ) वेगैः । बलैः—निघ० २ । ६ ( वः ) युष्मदर्थम् (विदद्वसुम्) वेदयद्वसुम् । धनप्रापकम् ( तरणिः ) तारकः ( इत् ) एव (सिषासति) संभक्तुमिच्छति ( उत् ) आधिक्ये ( नु ) क्षिप्रम् ( अस्य ) राज्ञः ( रिच्यते ) अधिको भवति ( भूयः ) बहु—ईयसुन् । बहुतरम् । पुनः ( वावृधे ) वर्धते ( वीर्याय ) पराक्रमाय ( उ ) वितर्के ( सु ) शोभने ( प्रभृतिम् ) प्रकृष्टां धारणाम् ( सातये ) संविभागाय ( धाः ) दध्याः ( उद्धरति ) उद्धृत्य पठति ( आर्षम् ) ऋषिणा परमेश्वरेण प्रोक्तः । वेदमन्त्रः ( नेत् ) नैव ( शस्यमानम् ) कथ्यमानम् ( वर्धस्व ) वृद्धिं कुरु ( घ ) एव ( सुतासः ) निष्पन्नाः ॥