भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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पृष्ठ 477

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १५ ४३१ ही केवलपर्यांस [ एक देवता के स्तोत्र वाला अन्तिम उक्थ ] करे । (केवलसूक्तं केवल- सूक्तम् एव उत्तरयोः भवति ) केवलसूक्त, केवलसूक्त [ एक देवता की स्तुति वाला सूक्त ] ही पिछले दो [ देवताओं ] का होता है । ( इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य......इति यजति ) इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य ·····८—इस मन्त्र से वह याज्या आहुति देता है । ( एते एव देवते तत् यथाभागं प्रीणाति. वषट्कृत्य अनुवषट्करोति । इन ही दो देवताओं को उससे अपने अपने भाग के अनुसार वह प्रसन्न करता है और वषट्कार करके अनुवषट्कार [ अन्तिम आहुति दान ] करता है । ( प्रति एव अभिमृशन्ते, अनाराशंसाः न आप्याय- यन्ति न हि सीदन्ति ) वे [ ऋषि लोग ] प्रत्यक्ष ही विचारते हैं--नरों [ नेताओं ] की स्तुति बिना यज्ञ [ यजमान को ] न बढ़ाते हैं और नहीं चलते हैं [ नहीं आप बढ़ते हैं । देखो कं० ३ ] ॥ १५ ॥ भावार्थः-योग्य पुरुष योग्य. देवता की स्तुति योग्य विचारों से करे ॥ १५ ॥ विशेषः-नीचे शुद्धि पत्र देखो ॥ अशुद्ध शुद्ध प्रमाण एत्यू एह्यू वेदमन्त्र ता अग्नि त अग्नि " मघवानमुक्थम् मघवानमुक्थ्यम् " अस्तम्भाद्याम् अस्तम्भाद् द्याम् " नित्युकूथम् नित्यमुक्थ्यम् कण्डिका १६, १७ राजानामध्वरे राजानावध्वरे वेदमन्त्र ऽववृत्याम् ववृत्याम् " विशेषः-२-प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं । १-इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोमं पिवतं मद्यं धृतव्रतो......॥ यह मन्त्र आ चुका है, गो० ब्रा० उ० २ । २२, विशेषः ३ ॥ २-एह्यू षु ब्रवाणि ते......॥ आ चुका है—गो० ब्रा० उ० ४ । ११, विशेषः ॥ ३-अग्निरगामि भारतो वृत्रहा पुरुचेतनः । दिवोदासस्य सत्पतिः-ऋ० ६ । १६ । १६ ॥ (दिवोदासस्य) प्रकाश के देने वाले का (भारतः) पोषण करने वाला, (वृत्रहा) शत्रुओं को मारने वाला, (पुरुचेतनः) बहुत चेतना वाला, (सत्पतिः) सत्पुरुषों का पालने वाला (अग्निः) अग्नि [ के समान तेजस्वी पुरुष ] (आ अगामि) सब ओर से प्राप्त किया जाता है । ४-चर्षणीधृतं मघवानमुक्थ्य १ मिन्द्रं गिरो बृहतीरभ्यनूषत । वावृधानं पुरुहूतं सुवृक्तिभिरमर्त्यं जरमाणं दिवेदिवे—ऋ० ३ । ५१ । १, सा० पू० ४ । ६ । ५ ॥ (बृहतोः) बड़े विषय वाली (गिरः) [ विद्वानों की ] वाणियां (चर्षणीधृतम्) मनुष्यों के धारण युवाम् (राजानौ) ऐश्वर्यवन्तौ (अध्वरे) हिंसारहितयागे (आ ववृत्याम्) आवर्तयामि । आह्वयामि ॥