भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 496, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 496

४५८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ३ [ यजमान के ] स्नेह और तेज [ रस और प्रताप ] की प्राप्ति के लिये है । ( गायत्रीं स्तोत्रियानुरूपं शंसन्ति ) गायत्री ' छन्द वा मन्त्र ] में स्तोत्रिय अनुरूप को वे बोलते हैं । ( तेजः वै गायत्री, तमः पाप्मा ) तेज ही गायत्री है, अन्धकार पाप है । ( तेन तेजसां रात्रिः तमः पाप्मानं तरन्ति, पुनः [ तेजः ] आदाय शंसन्ति ) उस [ गायत्री रूप ] तेज से रात्रि के अन्धकार [ समान ] पाप को वे पार करते हैं, और फिर [ तेज ] ग्रहण करके वे बोलते हैं [ शस्त्र पढ़ते हैं ] । ( एवं हि सामगाः स्तुवते यथा स्तुतम् अनुशस्तं भवति ) ऐसे ही सामगायक [ उद्गाता लोग ] स्तोत्र बोलते हैं कि स्तुति के योग्य अनुशस्त्र होवे । (तत् स्तुतं न हि, यत् अनुशस्तं न ) वह स्तोत्र नहीं है जिस में अनुशस्त्र न हो । ( तत् आहुः, अथ कस्मात् उत्तमात् प्रतीहारात् आहूय साम्ना शस्त्रम् उपसन्तन्वन्ति इति ) वे कहते हैं—फिर किसलिये सबसे पिछले प्रतीहार [ प्रतिहर्ता के गाने योग्य स्तोत्र ] से बोलकर सामगान के साथ शस्त्र को समीप में वे बढ़ाते हैं [ इसका उत्तर ऊपर आ चुका है ] ॥ ३ ॥ भावार्थः अवसर को विचार कर स्तुति करनी योग्य है ॥ ३ ॥ विशेषः १—इस कण्डिका को मिलाओ—ऐ० ब्रा० ४ । ६ ॥ विशेषः २—( उभ ) के स्थान में ( उभे ) ऐ० ब्रा० से शुद्ध किया गया है ॥ विशेषः ३—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १--इन्द्राय मद्वने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिरः अर्कमर्चन्तु कारवः—ऋग्० ८ । ६२ । १९, [ सायण भाष्य ८१ ] । साम० २ । ७ । ४ ॥ ( नः गिरः ) हमारी वाणियां ( मद्वने ) हर्षशील ( इन्द्राय ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले वीर पुरुष ] के लिये ( सुतम् ) सुत [ निचोड़े हुये तत्त्व रस ] को ( परि स्तोभन्तु ) सब ओर से सराहें, और ( कारवः ) स्तुति करने वाले लोग ( अर्कम् ) पूजनीय [ वीर ] को (अर्चन्तु ) पूजें ॥ २--इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन् ररिमा ते—ऋग्० ८ । २ । १, साम० पू० ३ । २ । १० ॥ ( वसो ) हे वसु ! [ वसाने वाले इन्द्र राजन् ] ( इदम् ) इस ( सुतम् ) सुत [ निचोड़े हुये ] ( अन्धः ) अन्न [ तत्त्वरस ] को ( सुपूर्णम् उदरम् ) भले प्रकार भर पेट ( पिब ) पी, ( अनाभयिन् ) हे निर्भय ! ( ते ) तुझे ( ररिम ) [ वह ] हम देते हैं ॥ ३—इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधांनां पते । पिबा त्व१स्य गिर्वणः—ऋ० ३ । ५१ । १०, साम० पू० २ । ८ । १ ॥ ( राधांनां पते ) हे धनों के स्वामी ! [ इन्द्र राजन् ] ( इदं हि ) यह ही ( ओजसा ) बल के साथ ( अनु ) निरन्तर ( सुतम् ) सुत [ निचोड़ा गया तत्त्व रस ] है, ( गिर्वणः ) हे स्तुतियों से सेवनीय ! ( अस्य ) इस [ तत्त्वरस ] का ( तु ) ( पिब ) पान कर ॥ व्यम् ( आदाय ) गृहीत्वा ( सामगाः ) उद्गातारः ( प्रतीहारात् ) प्रति + हृञ् हरणे-घञ् वा दीर्घः । प्रतिहर्त्रा गातव्यात् स्तोमात् ॥