गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 497, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५। क० ४ ४५९ विशेषः ४-बारह स्तोत्र वाले अपिशर्वरे छह मन्त्र प्रातः सन्धि में रथन्तर साम की ध्वनि से गाये जाते हैं। छह मन्त्रों के अर्धर्च अर्धर्च करके पाठ करने से बारह हो जाते है [ देखो—गो० उ० ६ । ८ ], तीन देवता इस प्रकार हैं—पहिले और दूसरे मन्त्र अग्नि, तीसरे और चौथे उषा तथा पांचवें और छठे अश्विनौ देवता वाले हैं। सामवेद में यह छह मन्त्र एक स्थान पर हैं ॥ १, २ अग्निदेवता ॥ १--एना वो अग्निं नमसोजों नपातमा हुवे । प्रियं चेतिष्ठमरतिं स्वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम्--ऋग्० ७ । १६ । १ यजु० १५ ० ३२, साम० १ । २ । १३ ।। ( एना नमसा ) इस अन्न वा सत्कार से ( वः ) तुम्हारे लिये ( ऊर्जः नपातम् ) पराक्रम के न गिराने वाले, ( प्रियम् ) प्रिय, ( चेतिष्ठम् ) अत्यन्त चेताने वाले, ( अरतिम् ) गति वाले [ पुरुषार्थी ], ( स्वध्वरम् ) अच्छे प्रकार हिंसा रहित व्यवहार वाले, ( विश्वस्य दूतम् ) सबके कार्य साधने वाले, ( अमृतम् ) न मरने वाले ( अग्निम् ) अग्नि [ अग्नि के समान तेजस्वी विद्वान् ] को ( आ हुवे ) मैं बुलाता हूं ॥ २- स योजते अरुषा विश्वभोजसा स दुद्रवत् स्वाहुतः । सुब्रह्मा यज्ञः सुशमी वसूनां देवं राधो जनानाम्-ऋ० ७ । १६ । २, यजु० १५ । ३३, ३४ भेद से, साम० उ० १ । २ । १३ ।। ( सः ) वह [ अग्नि समान तेजस्वी विद्वान् ] ( विश्व- भोजसा ) संसार के रक्षा करने वाले ( अरुषा ) तेज से ( योजते ) युक्त होता है, ( स्वाहुतः ) अच्छे प्रकार बुलाया गया ( सः ) वह ( दुद्रवत् ) शीघ्र पहुँचता है, वह ( सुब्रह्मा ) सुन्दर अन्न वा धनों वाला वा अच्छे प्रकार चारों वेद जानने वाला, ( यज्ञः ) संगति योग्य ( सुशमी ) सुन्दर कर्मों वाला, ( जनानाम् ) मनुष्यों के लिये ( वसूनाम् ) धनों के बीच ( देवम् ) प्रकाशमान ( राधः ) धन [ के समान ] है ॥ ३ ४ उषा देवता ॥ ३-प्रत्यु अदर्श्यायत्यु१ च्छन्ती दुहिता दिवः । अपो महि व्ययति चक्षसे तमो ज्योतिष्कृणोति सूनरी- ऋ० ७ । ८१ । १, साम० उ० १ । २ । १४ भेद से ।। ( आयती ) आती हुई ( उच्छन्ती ) अन्धकार निकालती हुई ( दिवः ) सूर्य की ( दुहिता ) पुत्री [ उषा, प्रभात वेला ] ( उ ) निश्चय करके ( प्रति अदर्शि ) प्रत्यक्ष देखी जाती है, वह ( महि तमः ) बड़े अन्धकार को ( अपो व्ययति ) हटा देती है, ( सूनरी ) सुन्दर नेत्री [ अच्छे प्रकार ले चलने वाली वह ] ( चक्षसे ) देखने के लिये ( ज्योतिः ) ज्योति [ उजाला ] ( कृणोति ) करती है ॥ ४-उदुस्रियाः सृजते सूर्यः सचाँ उद्यन् नक्षत्रमर्चिवत् । तवेदुषो व्युषि सूर्यस्य च सं भक्तेन गमेमहि-ऋग्० ७ । ८१ । २, साम० उ० १ । २ । १४ ।। ( अर्चिवत् ) किरणों वाला ( नक्षत्रम् ) नक्षत्र, [ अर्थात् ] ( उद्यन् ) उदय होता हुआ ( सूर्यः ) सूर्य ( उस्रियाः ) किरणों को ( सचा ) एक साथ ही ( उद् सृजते ) ऊपर को छोड़ता है। ( उषः ) हे उषा ! [ प्रभात वेला ] ( तव ) तेरे ( च ) और