भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 51

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ६ ॥ १३ कंडिका ६ ॥ तीन लोक, तीन देवता, तीन वेद और तीन महाव्याहृति ( सः भूयः आत्मानम् अश्राम्यत् ) उस [ परमात्मा ] ने फिर अपने को दबाया, ( भूयः अतप्यत् ) फिर तपाया, ( भूयः सम् अतपत् ) फिर भली भांति तपाया । ( सः आत्मनः एव त्रीन् लोकान् निर् अमिमत ) उसने अपने में से ही तीन लोक बनाये [ अपने तीन रूप प्रकट किये ] ( पृथिवीम्, अन्तरिक्षम्, दिवम् इति ) पृथिवी [ सब का फैलाने वाला ] अन्तरिक्ष [ सब के भीतर देखने वाला ] और प्रकाश लोक [ सर्व प्रकाशक रूप ] । ( स खलु पादाभ्याम् एव पृथिवीं निर् अमिमत ) उसने निश्चय करके दोनों पावों से ही पृथिवी [ सर्व प्रसारक रूप ] को बनाया. (उदरात् अन्तरिक्षम्) पेट से अन्तरिक्ष [ सब के भीतर दीखने वाला रूप ] और ( मूर्द्ध्नः दिवम् ) मस्तक से प्रकाश लोक [ सर्व प्रकाशक रूप ] को (सा तान् त्रीन् लोकान्) उसने तीनों लोकों [ अपने तीनों रूपो] को ( अभि अश्राम्यत् अभि अतपत् सम् अतपत् ) सब ओर से दबाया. सब ओर से तपाया और भली भांति तपाया । ( तेभ्यः श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यः ) उन दबाये हुए तपाये हुए, भली भांति तपाये हुओं से ( त्रीन् देवान् निर् अमिमत ) तीन देवता [ अपने दिव्यरूप ] बनाये, ( अग्निम् ) अग्नि [ सर्वज्ञ ] ( वायुम् ) वायु [ सर्वव्यापक ] और ( आदित्यम् इति ) आदित्य [ सब प्रकाशस्वरूप ] । ( सः खलु ) उसने निश्चय करके ( पृथिव्याः एव ) पृथिवी [ अपने सर्व विस्तारक स्वरूप ] से ही ( अग्निम् ) अग्नि [ अपना सर्वज्ञ स्वरूप ] ( निर् अमिमत ) बनाया, ( अन्तरिक्षात् ) अन्तरिक्ष [ सब में दीखने वाले स्वरूप ] से ( वायुम् ) वायु [ सर्वव्यापक स्वरूप ] और ( दिवः ) प्रकाश लोक [ प्रकाशक स्वरूप ] से ( आदित्यम् ) आदित्य [ सर्व प्रकाशक स्वरूप ] ( सः तान् त्रीन् देवान् ) उसने उन तीन देवताओं [ दिव्य स्वरूपों ] को ( अभि अश्राम्यत् अभि अतपत् सम् अतपत् ) सब ओर से दबाया, सब ओर से तपाया और भली भांति तपाया । ( तेभ्यः श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यः ) उन दबाए हुए, तपाये हुए, भली भांति तपाये हुओं से ( त्रीन् वेदान् ) तीनों वेदों को ( निर् अमिमत ) बनाया-( ऋग्वेदम् ) ऋग्वेद [ पदार्थों की गुण प्रकाशक विद्या ], ( यजुर्वेदम् ) यजुर्वेद [ सत्कर्मों की विद्या ] और ( सामवेदम् इति ) सामवेद [ मोक्ष विद्या-अर्थात् अथर्ववेद सहित चारों वेदोक्त परमेश्वर के कर्म, उपासना, ज्ञान रूप त्रयी विद्या को बनाया ] ( अग्नेः ) अग्नि [ अपने सर्वज्ञ स्वरूप ] से ( ऋग्वेदम् ) ऋग्वेद [ पदार्थों की गुण प्रकाशक विद्या ] ( वायोः ) वायु [ सर्वव्यापक स्वरूप ] से ( यजुर्वे-

रूपम् । भूमिम् । ( अन्तरिक्षम् ) अन्तर् + ईक्ष दर्शने-घञ् । सर्वमध्ये दृश्यमानं रूपम् । आकाशम् ( दिवम् ) दिवु क्रीडाविजिगीषाकान्तिगत्यादिषु- क्विप् । सर्वप्रकाशकं रूपम् । सूर्यम्-( अग्निम् ) अङ्गेर्नलोपश्च ( उ० ४ । ५० ) अगि गतौ-निः, नलोपः । सर्वज्ञरूपम् । वह्निम् ( वायुम् ) क० ३ । सर्वा- धारकं रूपम् ( आदित्यम् ) अण्तेरादबश्च ( उ० ४ । ११२ ) आङ् + दुदा. दाने वा दीपि दीप्तौ-यक्, निपातनात् सिद्धिः । आदीप्यमानम् । सर्वप्रकाशकं,