भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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४७२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० १३ अवरुन्धे ) उद्गा आजदङ्गिरोभ्यः......[ यह उस तृच का दूसरा मन्त्र है ] इससे लाभ इन [ दीक्षितों ] के लिये इस [ ऋचा ] से वह प्राप्त करता है । ( इन्द्रेण रोचना दिवो दृळ्हानि दृंहितानि च स्थिराणि न पराणुदे इति, स्वर्गम् एव लोकम् एतया अहरहः अवरुन्धे ) इन्द्रेण रोचना दिवः......[ यह तृच का तीसरा मन्त्र है ] स्वर्ग ही लोक को इस [ ऋचा ] से दिन दिन वह [ यजमान ] प्राप्त करता है । ( आहं सरस्वतीवतोः, इति अच्छावाकस्य ) आहं सरस्वतीवतोः .... ऋग्० ८ । ३८ । १० । यह अच्छावाक की [ परिधानीया ऋचा ] है । ( इन्द्राग्न्योरवो वृणे, इति, एतत् ह वै इन्द्राग्न्योः प्रियं धाम यत् वाक् इति ) इन्द्राग्न्योरवो वृणे, [ यह उसी मन्त्र का दूसरा पाद है ], इन्द्र और अग्नि का यह ही प्रिय धाम है [ मन्त्रोक्त-अवः--रक्षा ही धाम वा स्थान है ], जो वाणी [ सरस्वती ] है । ( प्रियेण एव धाम्ना एनौ तत् समर्धयति ) प्रिय धाम से ही इन दोनों [ इन्द्र और अग्नि ] को तब वह [ अच्छावाक ] समृद्ध [ सफल ] करता है । ( प्रियेण एव धाम्ना समृध्यते यः एवं वेद ) प्रिय धाम से ही वह समृद्ध होता है, जो ऐसा विद्वान् है ॥ १३ ॥ भावार्थ :-कण्डिका १२ के समान है ॥ १३ ॥ विशेष: १-इस कण्डिका को मिलाओ-ऐ० ब्रा० ६ । ७ ॥ विशेष: २-शुद्धिपत्र नीचे दिया जाता है ॥ अशुद्ध शुद्ध प्रमाण इषांश्च इषं वेद तथा ऐ० ब्रा० स्वधी० स्वश्च धी० ,, ,, व्यन्ततरिक्ष व्यन्तरिक्ष ,, ,, धामः धाम ऐतरेय ब्राह्मण विशेषः ३-प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १-ते स्याम देव वरुण ते मित्र सूरिभिः सह । इषं स्वश्च धीमहि-ऋ० ७ । ६६ । ६, साम० उ० ४ । १ । ८ ॥ ( देव ) हे देव ! [ विजय चाहने वाले वीर ] ( वरुण ) हे वरुण ! [ श्रेष्ठ ] ( मित्र ) हे मित्र ! [ सर्वोपकारी ] ( सूरिभिः सह ) बुद्धिमानों सहित ( ते ते ) तेरे ही ( स्याम ) हम होवें और ( इषम् ) अन्न ( च ) और ( स्वः ) सुख ( धीमहि । धारण करें ॥ अधोगतम् ( नुतुदे ) प्रेरितवान् ( सनिम् ) लब्धितम् ( इन्द्रेण ) परमेश्वर्यवता परमात्मना ( रोचना ) रोचनानि । प्रकाशाः (दिवः ) व्यवहारस्य (दृळ्हानि ) दृह वृद्धौ-क्तः । दृढीकृतानि ( बृंहितानि ) दृहि वृद्धौ-क्तः । वर्धितानि । विस्ता- रितानि ( स्थिराणि ) स्थितिशीलानि ( न ) निषेधे ( पराणुदे ) परा + णुद प्रेरणे क्विप् । परानोदनाय । दूरे प्रेरणाय ( सरस्वतीवतोः ) वाग्वतोः ( अवः ) रक्षणम् ( आ वृणे ) सर्वतः प्रार्थयामि ( धाम्ना ) स्थानेन ( समर्धयति ) समृद्धौ करोति ॥