भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 568, कुल 600 में से

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पृष्ठ 568

५५० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० १२ यो ऽनाक्ताक्षः अनभ्यक्तः......अथर्व० २० । १२८ । ६, यह मन्त्र है । ( ऋतवः वै दिशः प्रजननः [ प्रजननाः ] ) ऋतुयें ही-दिशा के उत्पन्न करने वाले हैं । ( तत् यत् दिशां क्लृप्तीः, यः सभेयः विदथ्यः इति पूर्वं शस्त्वा जनकल्पाः उत्तराः शंसति, ऋतून् एव तत् कल्पयति, ऋतुषु प्रतिष्ठापयति ) फिर जो दिशां क्लृप्तीः को, यः सभेयः विदथ्यः...... इस मन्त्र को पहिले बोलकर, [ बोलता है ] और जनकल्प ऋचाओं को पीछे बोलता है, ऋतुओं को ही वह उससे समर्थ करता है और ऋचाओं में [ यजमान को ] स्थापित करता है । ( प्रतिष्ठन्तीः अनु इदं सर्वं प्रतितिष्ठति ) प्रतिष्ठा वाली ऋचाओं के साथ यह सब [ जगत् ] प्रतिष्ठा पाता है ! ( प्रजया पशुभिः प्रतितिष्ठति यः एवं वेद ) प्रजा से और पशुओं से वह प्रतिष्ठा पाता है जो ऐसा विद्वान् है । ( ताः अर्धर्चशः प्रतिष्ठित्यै एव शंसति ) उन ऋचाओं को आधी आधी ऋचाओं करके प्रतिष्ठा के लिये ही वह बोलता है ॥ ६—( अथ इन्द्रगाथाः शंसति यदिन्द्रादो दाशराज्ञः इति ) फिर इन्द्रगाथाओं को वह बोलता है, यदिन्द्रादो दाशराज्ञः .....अथर्व० २० । १२८ । १२—१६, यह मन्त्र हैं । ( इन्द्रगाथाभिः ह वै देवाः असुरान् अथ एनान् अन्यान् आज्ञाय ) इन्द्र गाथाओं से ही देवताओं ने असुरों को और इन दूसरों को निन्दित किया । ( तथा एव एतत् यजमानाः इन्द्रगाथाभिः एव अप्रियं भ्रातृव्यम् अथ एनम् आगाय अतियन्ति ) वैसे ही यह है—यजमान लोग इन्द्र गाथाओं से ही अप्रिय बैरी को फिर इस [ शत्रु ] को चढ़ाई करके लांघते हैं । ( ताम् अर्धर्चशः प्रतिष्ठित्यै एव शंसति ) उस ऋचा को आधी आधी ऋचा करके प्रतिष्ठा के लिये ही वह बोलता है ॥ १२ ॥ भावार्थ:—मनुष्य वेदविहित कर्म करने से बाहिरी और भीतरी शत्रुओं को हराकर संसार में उन्नति करें ॥ १२ ॥ विशेषः १—इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० ६ । २६, ६ । ३२, ६ । ३३ से मिलाओ । विशेषः २—प्रतीक वाले सूक्तों के पहिले पहिले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं, शेष मन्त्र वेद में देखो ॥ १--दो स्तोत्रियानुरूप—इमा नु कं भुवना सीषधामेन्द्रश्च विश्वे च देवाः । यज्ञं च नस्तन्वं च प्रजां चादित्यैरिन्द्रः सह चीकॢपाति ॥--अ० २० । ६३ । १—६, तथा देखो ऋ० १० । १५७ । १--५, यजु० २५ । ४६, साम उ० ४ । १ । तृच २३ ॥ ( इमा ) यह ( भुवना ) उत्पन्न पदार्थ, ( च ) और ( इन्द्रः ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्यं वाला सभापति ] ( च ) और ( विश्वे ) सब ( देवाः ) विद्वान् लोग हम ( नु ) शीघ्र ( कम् ) सुख को ( सीषधाम ) सिद्ध करें । ( आदित्यैः सह ) अखण्ड व्रतधारी विद्वानों के साथ ( इन्द्रः ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्यं वाला सभापति ] ( नः ) हमारे ( यज्ञम् ) यज्ञ [ मेल मिलाप आदि ] ( च ) और ( तन्वम् ) शरीर ( च ) और ( प्रजाम् ) प्रजा [ सन्तान आदि ] को ( च ) भी ( चीक्लृपाति ) समर्थ करें ॥ तिरस्कृतवन्तः ( आगाय ) आ + गाङ् गतौ--ल्यप् । आभिमुख्येन प्राप्य ( अतियन्ति ) उल्लंघयन्ति । जयन्ति ॥

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