गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें४० गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २३ ॥ कण्डिका २३ ॥ आख्यायिका-ओम् द्वारा असुरों से देवताओं की रक्षा । (वसोः) श्रेष्ठ गुण के (धाराणाम्) प्रवाहों का (ऐन्द्रनगरम्) इन्द्र का नगर [जीवात्मा का घर अर्थात् मनुष्य शरीर] है। (तत् असुराः) उसको असुरों [कुविचारों] ने (पर्य्यवारयन्त) घेर लिया। (ते देवाः भीताः आसन्) वे देवता [इन्द्रियाँ वा विद्वान्] डरने लगे-(कः इमान् असुरान् अपहनिष्यति इति) कौन इन असुरों को मार डालेगा। (ते ओङ्कारं ब्रह्मणः ज्येष्ठं पुत्रं ददृशुः) उन्होंने ओङ्कार, ब्रह्मा के जेठे पुत्र [पुत् अर्थात् नरक से बचाने वाले सन्तान वा मन्त्र] को देखा। (ते तम् अब्रुवन्) वे उससे बोले-(भवता मुखेन इमान् असुरान् जयेम इति) हम आप मुखिया के द्वारा इन असुरों को जीतें। (स ह उवाच) वह बोला-(किं मे प्रतीवाहः भविष्यति इति) मेरे लिये क्या प्रतिफल होगा। [वे बोले]-(वरं वृणीष्व इति) तू वर [अभीष्ट फल] मांग। [वह बोला]--(वृणै इति) मैं मांगूं ? (सः वरम् अवृणीत) उसने वर मांगा--(माम् अनीरयित्वा ब्राह्मणाः ब्रह्म न वदेयुः) मुझको न बोल कर ब्राह्मण [ब्रह्मज्ञानी] वेद को न बोलें, (यदि वदेयुः तत् अब्रह्म स्यात्) जो वे [मुझे न बोलकर] बोलें, वह वेद विरुद्ध होवे। [वे बोले]--(तथा इति) वैसा ही हो। (ते देवाः देवयजनस्य उत्तरार्द्धे असुरैः संयताः आसन्) वे देवता देवयज्ञ के पिछले आधे भाग में असुरों से घेरे गये। (तान् असुरान् ओङ्कारेण आग्नीध्रीयात् देवाः पराभावयन्त) उन असुरों को ओङ्कार द्वारा अग्नि के प्रकाश करने वाले याजक के स्थान [यज्ञ मंडप] से देवताओं ने हरा दिया। (तत् यत् परा- भावयन्त, तस्मात् ओङ्कारः पूर्वं उच्यते) सो जो उन्होंने हराया, उसी से ओङ्कार पहिले बोला जाता है। (यः ह वै एतम् ओङ्कारं न वेद अवशः स्यात् इति) जो मनुष्य निश्चय करके इस ओङ्कार को न जाने, वह अप्रिय होवे। (अथ यः एवं ब्रह्म वेद, वशः स्यात् इति) और जो व्यापक ब्रह्म को जाने, वह प्रिय होवे। (तस्मात् ओङ्कारः ऋचि ऋग्, यजुषि यजुः, साम्नि साम, सूत्रे सूत्रं, ब्राह्मणे ब्राह्मणं, श्लोके श्लोकः, प्रणवे प्रणवः भवति इति ब्राह्मणम्) इसलिये ओङ्कार ऋग्वेद [पदार्थों की स्तुति :३-(वसोः) श्रेष्ठगुणस्य (धाराणाम्) प्रवाहानाम् (ऐन्द्रनगरम्) इन्द्र-अण्। इन्द्रस्य जीवस्येदं नगरम्। इन्द्रियायतनं शरीरम् (पुत्रम्) क० २। पुत्तो नरकात् त्रायकं सन्तानं वेदमन्त्रं वा (ज्येष्ठम्) सर्वश्रेष्ठम्। सर्ववृद्धम् (भवता) भगवता (मुखेन) दिखेनेर्मुँट् चोदात्तः (उ० ५।२०) खनेरलचो, तयोर्डित्वं धातोर्मुँट् च। मुखमिव मुख्येन प्रधानेन (मे) मह्यम् (प्रतीवाहः) पुरस्कारः (वरम्) अभीष्टफलम् (वृणीष्व) याचस्व (अनीरयित्वा) ईर गतौ-कृत्वा। अनुदीर्य। अनुच्चार्य (अब्रह्म) ब्रह्मणा वेदेन विरुद्धम् (संयताः) यम नियमने-क्तः। निरुद्धाः (आग्नीध्रीयात्) अग्निमिन्धे दीपयति अग्नीत्। अग्नि+ञि इन्धी दीप्तौ-क्विप्। तस्य शरणम्। अग्नीधः शरणे रण् भं च (वा० पा०४।३।१२०) अग्नीध्-रण्, ततः स्वार्थे छप्रत्ययः। अग्नीधः अग्नि- प्रकाशकस्य याजकस्य शरणाद् गृहात्। यज्ञमंडपात् (पराभावयन्त) पराज-