विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 163, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१४० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
जिन्होंने देवताओंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये तीन पैंड़ों-से तीनों लोकोंको जीतकर जगत्में धर्म, अर्थ और कामसे प्राप्त होनेवाले तीन मार्ग—तीन गतियाँ स्थापित कर दीं (धर्म-से स्वर्ग अर्थात् ऊर्ध्वगति, अर्थसे मर्त्यलोक अर्थात् मध्यम-गति और कामसे नरकादि अधोलोक अर्थात् अधोगति मिलती है); ॥ १४ ॥
ब्रह्मन् ! प्रत्येक युगमें जिन भगवान्को सहस्र अर्थात् अनन्त सिरवाला, अनन्त आँखोंवाला, अनन्त दान करने-वाला और अनन्त चरणोंवाला कहा जाता है, ॥ २० ॥
योऽन्तकाले जगत् पीत्वा कृत्वा तोयमयं वपुः ।
लो कमेकार्णवं चक्रे दृश्यादृश्येन वर्त्मना ॥ १५ ॥
जो भगवान् प्रलयकालमें दृश्य एवं अदृश्य रीतिसे (कारणसहित) सम्पूर्ण जगत्का पान (ग्रास) करके अपने शरीरको जलमय बनाकर सम्पूर्ण जगत्को एक जलमय ही कर देते हैं, ॥ १५ ॥
नाभ्यारण्यां समुत्पन्नं यस्य पैतामहं गृहम् ।
एकार्णवजलस्थस्य नष्टे स्थावरजङ्गमे ॥ २१ ॥
स्थावर-जङ्गमात्मक जगत्के लीन होनेपर जिन एक समुद्रमय जलमें स्थित पुरुषकी नाभिसे प्रकट होनेवाले कमल-नालरूप अरणि (मन्थनदण्ड) से पितामहका भवन (लोक-कमल) उत्पन्न हुआ, ॥ २१ ॥
यः पुराणे पुराणात्मा वाराहं रूपमास्थितः ।
विषाणाग्रेण वसुधामुज्जहारा रिसूदनः ॥ १६ ॥
प्राचीन समयमें जिन पुराणात्मा अरिसूदन भगवान्ने वराहके रूपमें अपने दाँतोंके अग्रभागसे पृथ्वीका उद्धार किया, ॥ १६ ॥
येन ते निहता दैत्याः संग्रामे तारकामये ।
सर्वदेवमयं कृत्वा सर्वायुधधरं वपुः ॥ २२ ॥
जिन्होंने तारकामय संग्राममें अपने शरीरको सर्वदेवमय और सर्वायुधधारी बनाकर दैत्योंको मार डाला, ॥ २२ ॥
यः पुरा पुरुहूतार्थे त्रैलोक्यमिदमव्ययः ।
ददौ जित्वासुरगणान् सुराणां सुरसत्तमः ॥ १७ ॥
पहले जिन अविनाशी सुरश्रेष्ठने इन्द्रके लिये असुरोंकी सेनाको जीतकर देवताओंको तीनों लोक (वापस) दिला दिये, ॥ १७ ॥
गरुडस्थेन चोत्सिक्तः कालनेमिर्निपातितः ।
निर्जितश्च मयो दैत्यस्तारकश्च महासुरः ॥ २३ ॥
जिन्होंने गरुड़पर बैठकर उद्दण्ड कालनेमिको नष्ट कर दिया तथा मय दैत्य और महान् असुर तारकको मार डाला, ॥ २३ ॥
येन सैंहं वपुः कृत्वा द्विधा कृत्वा च तत् पुनः ।
पूर्वं दैत्यो महावीर्यो हिरण्यकशिपुर्हतः ॥ १८ ॥
जिन्होंने पूर्वकालमें सिंहका रूप धारणकर और फिर उसको दो प्रकारका अर्थात् नरसिंहरूप बनाकर महान् परा-क्रमी दैत्य हिरण्यकशिपुको मार डाला, ॥ १८ ॥
उत्तरान्ते समुद्रस्य क्षीरोदस्यामृतोदधेः ।
यः शेते शाश्वतं योगमास्थाय तिमिरं महत् ॥ २४ ॥
जो क्षीरसमुद्रके उत्तर तटपर स्थित अमृत-समुद्रमे योग-मायारूप शाश्वत योगका आश्रय लेकर शयन करते हैं, ॥ २४ ॥
यः पुरा ह्यनलो भूत्वा और्वः संवर्तको विभुः ।
पातालस्थोऽर्णवगतं पपौ तोयमयं हविः ॥ १९ ॥
जिन विभुने पहले (प्रलयकालमे) पातालमें जाकर और्ववंशी संवर्तक अग्निका स्वरूप धारण कर समुद्रके जल-रूप हवि (घी) का पान कर लिया, ॥ १९ ॥
सुरारणिर्गर्भमधत्त दिव्यं
तपःप्रकर्षाददितिः पुराणम् ।
शक्रं च यो दैत्यगणावरुद्धं
गर्भावसाने निभृतं चकार ॥ २५ ॥
देवताओंको उत्पन्न करनेवाली अरणिरूपा अदितिने महा-तप करके जिन पुराणपुरुष (वामन) रूपी गर्भको धारण किया और जिन्होंने गर्भसे निकलनेके बाद दैत्योंके चक्रमें फँसे हुए इन्द्रको दैत्योंके चक्रसे मुक्त करके पूर्णकाम बना दिया, ॥ २५ ॥
सहस्रशिरसं ब्रह्मन् सहस्राक्षं सहस्रदम् ।
सहस्रचरणं देवं यमाहुर्वै युगे युगे ॥ २० ॥
पदानि यो लोकमयानि कृत्वा
चकार दैत्यान् सलिलेशयांस्तान् ।