भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 162

हरिवंशपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः [ १३९


किमात्मको वराहः स का मूर्तिः का च देवता ।
किमाचारः प्रभावो वा किं वा तेन पुरा कृतम् ॥ ३ ॥

(इस प्रकार वराहावतारके अधियज्ञस्वरूपकी बात पूछनेके अनन्तर अब राजा जनमेजय उनके आधिदैविक रूपके विषयमें पूछते हैं—) उन वराहका वास्तविक स्वरूप क्या है ? उनकी मूर्ति (बाहरी आकृति) कैसी है ? उनका (अधिष्ठातृ) देवता कौन है ? उनके कर्म क्या हैं ? उनका प्रभाव कैसा है और उन्होंने उस अवतारमें क्या किया था ? ॥ ३ ॥

यज्ञार्थं समवेतानां मिषतां च द्विजन्मनाम् ।
महावराहचरितं कृष्णद्वैपायनेरितम् ॥ ४ ॥

मैंने कृष्णद्वैपायनजीका कहा हुआ महावराहका चरित्र यज्ञमें एकत्रित हुए ब्राह्मणोंके वाद-विवादमे सुना है (परंतु उसका तत्त्व मेरी समझमें नहीं आया) ॥ ४ ॥

यथा नारायणो ब्रह्मन् वाराहं रूपमास्थितः ।
दंष्ट्रया गां समुद्रस्थामुज्जहारारिसूदनः ॥ ५ ॥

ब्रह्मन् ! भगवान् नारायणने जिस प्रकार वराहरूप धारण किया और उन अरिसूदन भगवान्ने जिस प्रकार अपनी दाँढ़से समुद्रके गर्भमें पड़ी हुई पृथ्वीका उद्धार किया, यह सब मुझे आप बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ॥

विस्तरेणैव कर्माणि सर्वाणि रिपुघातिनः ।
श्रोतुमिच्छाम्यशेषेण हरेः कृष्णस्य धीमतः ॥ ६ ॥

मै शत्रुसंहारक परम ज्ञानी हरिरूप भगवान् श्रीकृष्णके (वराह आदि सब अवतारोंमें किये हुए) सभी चरित्रोंको विस्तारपूर्वक पूर्णरीतिसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥

कर्मणामानुपूर्व्याच्च प्रादुर्भावाश्च ये विभोः ।
या चास्य प्रकृतिर्ब्रह्मांस्तां मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ७ ॥

ब्रह्मन् ! लीलाओंके क्रमसे इन सर्वव्यापी भगवान्के जितने भी हुए हैं अवतार उन सबकी और (उन अवतारोंके समय उनकी) जो प्रकृति थी उसकी आप कृपा करके व्याख्या कीजिये ॥ ७ ॥

कथं च भगवान् विष्णुः सुरशत्रुनिषूदनः ।
वसुदेवकुले धीमान् वासुदेवत्वमागतः ॥ ८ ॥

फिर देवताओंके शत्रुओंका नाश करनेवाले परम चतुर भगवान् विष्णु वसुदेवके कुलमें उत्पन्न होकर वासुदेव क्यों कहलाये (अर्थात् वे कर्मबन्धनसे रहित होनेपर भी उत्तम स्थानसे नीचे स्थानमें क्यों आये) ? ॥ ८ ॥

अमरैरावृतं पुण्यं पुण्यकृद्भिर्निषेवितम् ।
देवलोकं समुत्सृज्य मर्त्यलोकमिहागतः ॥ ९ ॥

वे देवताओंसे घिरे हुए एवं पुण्यात्माओंद्वारा सेवित पवित्र देवलोकको छोड़कर इस मृत्युलोकमें क्यों आये ? ॥ ९ ॥

देवमानुष्ययोर्नेता यो भुवः प्रभवो विभुः ।
किमर्थं दिव्यमात्मानं मानुष्ये संन्ययोजयत् ॥ १० ॥

जो देवता और मनुष्योंके नेता हैं और जो विभु पृथ्वीके भी उत्पत्तिस्थान हैं, उन्होंने अपने दिव्य आत्माको मनुष्य-शरीरमें क्यों स्थापित किया ? ॥ १० ॥

यच्चक्रं वर्तयत्येको मानुषाणामनामयम् ।
मानुष्ये स कथं बुद्धिं चक्रे चक्रभृतां वरः ॥ ११ ॥

जो अकेले ही सब मनुष्योंके (कर्मसे जन्म और जन्मसे पुनः कर्मरूप) चक्रको निर्विघ्नतापूर्वक चलाते हैं, उन चक्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णने मनुष्य बननेका विचार क्यों किया ? ॥ ११ ॥

गोपायनं यः कुरुते जगतः सार्धलौकिकम् ।
स कथं गां गतो देवो विष्णुर्गोपत्वमागतः ॥ १२ ॥

जो जगत्के सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करते हैं, वे भगवान् विष्णु पृथ्वीपर आकर गोप कैसे बन गये ? ॥ १२ ॥

महाभूतानि भूतात्मा यो दधार चकार च ।
श्रीगर्भः स कथं गर्भे स्त्रिया भूचरया धृतः ॥ १३ ॥

जो समस्त भूतोंके अन्तरात्मा प्रभु स्वयं महाभूतोंको रचते और धारण करते हैं, उन श्रीगर्भको पृथ्वीपर विचरण करनेवाली स्त्रीने अपने गर्भमें किस प्रकार धारण किया ? ॥ १३ ॥

येन लोकान् क्रमैर्जित्वा त्रिभिस्त्रींस्त्रिदशेप्सया ।
स्थापिता जगतो मार्गास्त्रिवर्गप्रभवाश्रयाः ॥ १४ ॥