भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 161
१३८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

‘माननीय विभो ! जो मणिरत्न स्यमन्तक आपके पास है, आप उसे दे दीजिये, अनार्यताका व्यवहार न कीजिये ॥

षष्टिवर्षे गते काले यद्रोषोऽभून्ममानघ ।
स संरूढोऽसकृत्प्राप्तस्ततः कालात्ययो महान् ॥ ३७ ॥

‘निष्पाप अक्रूरजी ! साठ वर्ष पहले (मणिके कारणसे) जो रोष मुझे चढ़ा था, वही रोष बहुत समय बीतनेपर भी मुझे फिर बार-बार आ रहा है (अतः उस मणिको मुझे दे दीजिये), ॥ ३७ ॥

ततः कृष्णस्य वचनात् सर्वसात्वतसंसदि ।
प्रददौ तं मणिं बभ्रुरक्लेशेन महामतिः ॥ ३८ ॥

इस प्रकार श्रीकृष्णके कहनेपर महान्बुद्धिमान् अक्रूरजीने सम्पूर्ण सात्वतोंकी सभामें वह मणि बिना कष्ट पाये ही श्रीकृष्णको अर्पण कर दी ॥ ३८ ॥

ततस्तमार्जवप्राप्तं बभ्रोर्हस्तादरिंदमः ।
ददौ हृष्टमनाः कृष्णस्तं मणिं बभ्रुवे पुनः ॥ ३९ ॥

तदनन्तर अक्रूरजीके हाथसे सरलतापूर्वक मणि पा जानेपर अरिदमन श्रीकृष्णने मनमें प्रसन्न होकर वह मणि फिर अक्रूरजीको दे दी ॥ ३९ ॥

स कृष्णहस्तात् सम्प्राप्तं मणिरत्नं स्यमन्तकम् ।
आबध्य गान्दिनीपुत्रो विरराजांशुमानिव ॥ ४० ॥

तब श्रीकृष्णके हाथसे मिली हुई मणिरत्न स्यमन्तक-मणिको गलेमें बाँधकर गान्दिनीपुत्र अक्रूर सूर्यके समान सुशोभित हुए ॥ ४० ॥

यस्त्वेवं शृणुयान्नित्यं शुचिर्भूत्वा समाहितः ।
सुखानां सकलानां च फलभागीह जायते ॥ ४१ ॥

इस प्रकार जो मनुष्य पवित्र होकर सावधानतापूर्वक इस कथाको नित्यप्रति सुनता है, उसको फलरूपमें सम्पूर्ण सुख प्राप्त होते हैं ॥ ४१ ॥

आ ब्रह्मभुवनाञ्चापि यशःख्यातिर्न संशयः ।
भविष्यति नृपश्रेष्ठ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ४२ ॥

नृपश्रेष्ठ ! उसकी कीर्ति ब्रह्मलोकतक पहुँचती है, इसमें कुछ संदेह नहीं है, यह मैं आपसे सत्य कह रहा हूँ ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वण्ये-
कोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें (बलदेवजीके द्वारा दुर्योधनको गदा-विद्याकी शिक्षाविषयक) उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥


चत्वारिंशोऽध्यायः

जनमेजयका भगवान्‌के वराह, नृसिंह, परशुराम, श्रीकृष्ण आदि अवतारोंका रहस्य पूछना

जनमेजय उवाच

प्रादुर्भावान् पुराणेषु विष्णोरमिततेजसः ।
सतां कथयतामेष वाराह इति नः श्रुतम् ॥ १ ॥

जनमेजयने कहा— ब्रह्मन् ! मैंने कथा कहनेवाले सज्जनोंके मुखसे अमिततेजस्वी विष्णुके अवतारोंमें वराह अवतारकी भी बात पुराणोंमें सुनी है (वराह शब्दका आध्यात्मिक अर्थ वर और अह अर्थात् श्रेष्ठ यज्ञ है) ॥ १ ॥

न जाने तस्य चरितं न विधिं नैव विस्तरम् ।
न कर्मगुणसंतानं न हेतुं न मनीषितम् ॥ २ ॥

परंतु मैं उन वराह भगवान्‌के (सर्वकार्य जनकस्वरूप) चरित्रको, (अपूर्वस्वरूपका आविष्कार करनेकी) विधिको, (अनुष्ठानकी आवश्यकता रूप) विस्तारको तथा उनके कर्म (अर्थात् उसके कर्मसे तृप्त होनेवाले देवता आदि) तथा गुण-देश-द्रव्य-काल आदि एवं संतान (प्रयोगविधि) को, हेतु अर्थात् अधिकारको और वे किस अभिप्रायसे त्यागात्मक स्वरूपको ग्रहण करते हैं, उसे मैं कुछ नहीं समझता (अतः आप मुझे ये सब बातें समझाइये) ॥ २ ॥