विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 160, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः १३७
हूँ, आपका कल्याण हो ! मैं चलता हूँ। अब मुझे द्वारकासे, आपसे और वृष्णिवंशियोंसे भी कोई काम नहीं है' ॥ २२ ॥
प्रविवेश ततो रामो मिथिलामरिर्मदनः।
सर्वकामैरुपहृतैर्मैथिलेनाभिपूजितः ॥ २३ ॥
तदनन्तर शत्रुमर्दन बलदेवजी मिथिलापुरीमे चले गये। वहाँ मिथिलानरेशने बहुत-से श्रेष्ठ पदार्थोंकी भेंट देकर बलदेवजीका स्वागत किया ॥ २३ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु बभ्रुर्मतिमंतां वरः।
नानारूपान् क्रतून् सर्वानजहार निरर्गलान् ॥ २४ ॥
इसी समय बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ बभ्रु (वंशी अक्रूरजी भी) अनेक प्रकारके बहुत-से यज्ञोंको धड़ल्लेके साथ करने लगे ॥
दीक्षामयं स कवचं रक्षार्थं प्रविवेश ह।
स्यमन्तकृते प्राज्ञो गान्दीपुत्रो महायशाः ॥ २५ ॥
महायशस्वी बुद्धिमान् गान्दीपुत्रने स्यमन्तकके लिये दीक्षारूपी कवचको अपनी रक्षाके लिये पहिन लिया (अर्थात् यज्ञमें दीक्षा लेनेवालेको युद्ध करनेका अधिकार नहीं होता, इसलिये उन्होंने युद्धसे बचनेका यह मार्ग निकाल लिया) ॥
अथ रत्नानि चाग्र्याणि द्रव्याणि विविधानि च।
षष्टि वर्षाणि धर्मात्मा यज्ञेषु विनियोजयत् ॥ २६ ॥
उसके बाद धर्मात्मा अक्रूरने साठ वर्षोंतक यज्ञोंमें अनेक प्रकारके द्रव्य और उत्तम रत्न दक्षिणारूपमें दिये ॥
अक्रूरयज्ञा इति ते ख्यातास्तस्य महात्मनः।
बह्वन्नदक्षिणाः सर्वे सर्वकामप्रदायिनः ॥ २७ ॥
उन महात्माके किये हुए वे सब यज्ञ अक्रूर-यज्ञोंके नामसे प्रसिद्ध हैं, उनमें बहुत-सा अन्न और बहुत-सी दक्षिणाएँ दी गयीं तथा उन सभी यज्ञोंमें ऋत्विजोंकी सब प्रकारकी कामनाएँ पूर्ण की गयीं ॥ २७ ॥
अथ दुर्योधनो राजा गत्वा तु मिथिलां प्रभुः।
गदाशिक्षां ततो दिव्यां बलभद्रादवाप्तवान् ॥ २८ ॥
इसी समय शक्तिशाली राजा दुर्योधनने मिथिलापुरीमें जाकर बलदेवजीसे दिव्य गदा-विद्याकी शिक्षा ग्रहण की ॥२८॥
प्रसाद्य तु ततो रामो वृष्ण्यन्धकमहारथैः।
आनीतो द्वारकामेव कृष्णेन च महात्मना ॥ २९ ॥
तदनन्तर वृष्णि और अन्धकवंशी महारथी तथा महात्मा श्रीकृष्ण बलरामजीको प्रसन्न करके द्वारकामें ही बुला लाये ॥
अक्रूरस्त्वन्धकैः सार्धमपायाद् भरतर्षभ।
हत्वा सत्राजितं सुप्तं सहबन्धुं महाबलम् ॥ ३० ॥
ज्ञातिभेदभयात् कृष्णस्तमुपेक्षितवानथ ।
अपयाते तथाक्रूरे नाववर्षत् पाकशासनः ॥ ३१ ॥
भरतश्रेष्ठ ! रात्रिमें सोये हुए महाबली सत्राजित् और उनके भाइयोंको शतधन्वाके द्वारा मरवाकर अक्रूर (अपने कुटुम्बी कतिपय) अन्धकवंशियोंको साथ लेकर भाग गये थे, किंतु श्रीकृष्णने जातिमें फूट पड़नेके भयसे उनकी उपेक्षा कर दी, परंतु अक्रूरके चले जानेपर इन्द्रदेवने वर्षा करना बंद कर दिया ॥ ३०-३१ ॥
अनावृष्ट्या यदा राज्यमभवद् बहुधा कृशम्।
ततः प्रसादयामासुरक्रूरं कुकुरान्धकाः ॥ ३२ ॥
जब अनावृष्टि होनेसे राज्यके मनुष्य प्रायः दुर्बल होने लगे, तब कुकुर और अन्धकवंशियोंने अक्रूरको अनुनय-विनय करके (द्वारका लौटनेके लिये) राजी कर लिया ॥ ३२ ॥
पुनर्द्वारवतीं प्राप्ते तस्मिन् दानपतौ ततः।
प्रववर्ष सहस्राक्षः कच्छे जलनिधेस्तदा ॥ ३३ ॥
फिर क्या था, उन दानपति अक्रूरके द्वारकापुरीमें वापस आते ही सहस्राक्ष इन्द्रने समुद्रके तटवर्ती प्रदेशपर जोरोंसे वर्षा करनी आरम्भ कर दी ॥ ३३ ॥
कन्यां च वासुदेवाय स्वसारं शीलसम्मताम्।
अक्रूरः प्रददौ धीमान् प्रीत्यर्थं कुरुनन्दन ॥ ३४ ॥
कुरुनन्दन ! बुद्धिमान् अक्रूरजीने अपनी शीलवती बहिनका, जो कुमारी थी, श्रीकृष्णके साथ उनको प्रसन्न करनेके लिये विवाह कर दिया ॥ ३४ ॥
अथ विज्ञाय योगेन कृष्णो बभ्रुगतं मणिम्।
सभांमध्ये गतं प्राह तमक्रूरं जनार्दनः ॥ ३५ ॥
तदनन्तर जनार्दन श्रीकृष्णने योगके द्वारा यह जानकर कि मणि अक्रूरके पास है, सभामे बैठे हुए अक्रूरसे (एक दिन) कहा—॥ ३५ ॥
यत् तद् रत्नं मणिवरं तव हस्तगतं विभो।
तद् प्रयच्छस्व मानार्ह मयि मानार्यकं कृथाः ॥ ३६ ॥