विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१३६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश
ततस्त्वरितमागत्य द्वारकां मधुसूदनः।
पूर्वजं हलिनं धीमानिदं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
तदनन्तर श्रीमान् कृष्णचन्द्रने तुरंत ही द्वारकापुरीमें आकर अपने बड़े भाई हलधरसे यह बात कही—॥ ९ ॥
हतः प्रसेनः सिंहेन सत्राजिच्छतधन्वना।
स्यमन्तकः स मद्गामी तस्य प्रभुरहं विभो ॥ १०॥
'प्रभो ! प्रसेनको सिंहने मार डाला था, शतधन्वाने सत्राजित्को मार डाला। अब इस मणिका उत्तराधिकार मुझे प्राप्त होता है; अब मैं उसका स्वामी हूँ ॥ १०॥
तदारोह रथं शीघ्रं भोजं हत्वा महाबलम्।
स्यमन्तको महाबाहो ह्यस्माकं स भविष्यति ॥ ११॥
'महाबाहो ! इसलिये अब आप शीघ्र ही रथपर चढ़िये; महाबली भोज (वंशी शतधन्वा) को मारनेके बाद वह स्यमन्तकमणि निस्सन्देह हमारी होगी'॥ ११ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं भोजकृष्णयोः।
शतधन्वा ततोऽक्रूरमैक्षत् सर्वतो दिशम् ॥ १२॥
तदनन्तर भोजवंशी शतधन्वा और श्रीकृष्णमें घमासान युद्ध प्रारम्भ हुआ। उस समय शतधन्वा सब दिशाओंमें अक्रूर-को देखने लगा ॥ १२ ॥
संरब्धौ तावुभौ दृष्ट्वा तत्र भोजनार्दनौ।
शक्तोऽपि शाठ्याद्धार्दिक्यमक्रूरो नाभ्यपद्यत ॥ १३ ॥
शतधन्वा और श्रीकृष्णको क्रोधमें भरा हुआ देखकर अक्रूर समर्थ होनेपर भी शठताके कारण हृदीकके पुत्र शतधन्वाकी सहायता करने नहीं गये ॥ १३ ॥
अपयाने ततो बुद्धिं भोजश्चक्रे भयार्दितः।
योजनानां शतं साग्रं हयया प्रत्यपद्यत ॥ १४ ॥
तब तो भयसे घबराया हुआ शतधन्वा भागनेका विचार करने लगा और वह घोड़ीपर चढ़कर चार सौ कोससे अधिक दूर निकल गया ॥ १४ ॥
विख्याता हृद्या नाम शतयोजनगामिनी।
भोजस्य वडवा राजन् यया कृष्णमयोधयत् ॥ १५ ॥
राजन् ! शतधन्वाने जिस घोड़ीपर चढ़कर श्रीकृष्णके साथ युद्ध किया था, उस घोड़ीका नाम हृद्या था और वह चार सौ कोसका धावा मारनेवालीके रूपमें प्रसिद्ध थी ॥१५॥
क्षीणां जवेन च हयामध्वनः शतयोजने।
दृष्ट्वा रथस्य तां वृद्धिं शतधन्वा समत्यजत् ॥ १६ ॥
घोड़ी वेगसे चलनेके कारण चार सौ कोसका मार्ग तय करनेके बाद थकन लगी। इधर शतधन्वाने श्रीकृष्णके रथको बढ़ते देखकर घोड़ीको छोड़ दिया (और वह पैदल भागने लगा) ॥ १६ ॥
ततस्तस्या हयायास्तु श्रमात् खेदाच्च भारत।
खमुत्पेतुस्तथ प्राणाः कृष्णो राममथाब्रवीत् ॥ १७ ॥
भारत ! तदनन्तर उस घोड़ीने श्रम और खेदके कारण अपने प्राणोंको छोड़ दिया। उस समय श्रीकृष्णने बलदेवजी-से कहा—॥ १७ ॥
तिष्ठस्त्वह महाबाहो दृष्टदोषा हया मया।
पद्भ्यां गत्वा हरिष्याम मणिरत्नं स्यमन्तकम्॥ १८॥
'महाबाहो ! घोड़े थक गये हैं, उनका यह दोष मैंने देख लिया है; अतः आप यहीं ठहरिये, मैं पैदल ही जाकर मणियोंमें रत्नस्वरूप स्यमन्तक-मणिको छीन लाऊँगा' ॥
पद्भ्यामेव ततो गत्वा शतधन्वानमच्युतः।
मिथिलामभितो राजन् जघान परमास्त्रवित् ॥ १९ ॥
राजन् ! तदनन्तर अस्त्रविद्याके पारगामी श्रीकृष्णने पैदल ही जाकर शतधन्वाको मिथिलानगरीके समीप मार डाला ॥
स्यमन्तकं च नापश्यद्धत्वा भोजं महाबलम्।
निवृत्तं चाब्रवीत् कृष्णं रत्नं देहीति लाङ्गली ॥ २० ॥
महाबली भोजवंशी शतधन्वाको मारनेपर भी श्रीकृष्णको स्यमन्तक-मणि न मिली। श्रीकृष्णके वापस आनेपर बलदेवजी-ने उनसे कहा कि 'वह मणि-रत्न दीजिये' ॥ २० ॥
नास्तीति कृष्णश्चोवाच ततो रामो रुषान्वितः।
धिक्शब्दमसकृत् कृत्वा प्रत्युवाच जनार्दनम् ॥ २१ ॥
तब श्रीकृष्णने कहा—'मणि तो वहाँ नहीं मिली' तब तो बलदेवजीने क्रोधमें भरकर बारंबार 'धिक्कार है ! धिक्कार है !!' कहकर श्रीकृष्णसे कहा—॥ २१ ॥
भ्रातृत्वान्मर्षयाम्येष स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम्।
कृत्यं न मे द्वारक्या न त्वया न च वृष्णिभिः ॥ २२ ॥
'भाई होनेके कारण आपकी इस करतूतको मैं सह रह