भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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श्रीहरिः

प्रथम संस्करणकी भूमिका

हरिवंश वेदार्थप्रकाशक महाभारत ग्रन्थका ही अन्तिम पर्व है। आदिपर्वके अनुक्रमणिकाध्यायमें महाभारतको सौ पर्वोंवाला ग्रन्थ बतलाया गया है। उसके अन्तिम तीन पर्व इस हरिवंश ग्रन्थमें ही सम्मिलित हैं। यह बात अनुक्रमणिकाध्यायमें स्पष्टरूपसे निर्दिष्ट है—

हरिवंशस्ततः पर्व पुराणं खिलसंज्ञितम्। विष्णुपर्व शिशोश्चर्या विष्णोः कंसवधस्तथा ॥
भविष्यं पर्व चाप्युक्तं खिलेष्वेवाद्भुतं महत्। एतत्पर्वशतं पूर्णं व्यासेनोक्तं महात्मना ॥
(महाभा० आदिपर्व, अध्याय २। ८२-८३)

जैसे वेदविहित सोमयाग उपनिषदोंके बिना साङ्ग सम्पन्न नहीं होता, वैसे ही श्रीमहाभारतका पारायण भी हरिवंश-पारायणके बिना पूर्ण नहीं होता। किंतु हरिवंशका पारायण गीता आदिकी तरह स्वतन्त्र भी किया जाता है। इस तरह यह 'पुराणं खिलसंज्ञितम्' आदिपर्व (२। ८२) के आधारपर 'हरिवंश-पुराण' तथा 'हरिवंशपर्व' इन दोनों ही नामोंसे विद्वानोंके बीच विख्यात है।

पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे हरिवंश-श्रवणकी परम्परा भारतमें चिरकालसे प्रचलित है। विशेषकर यदि जन्मकुण्डलीमें संतानभाव सूर्यके द्वारा दृष्ट, आविष्ट या बाधित हो तो हरिवंश-श्रवण ही उसका प्रतिकार बतलाया गया है—


* इसके अतिरिक्त निम्नलिखित प्रमाणोंसे भी हरिवंश महाभारतका अङ्ग सिद्ध होता है—

१- हरिवंशपर्वके ३०वें अध्यायमें—'यथा ते कथितं पूर्वं मया राजर्षिसत्तम' इसके द्वारा वैशम्पायनने आदिपर्वस्थ पूर्वोक्त ययातिकी कथाका स्मरण दिलाया है और उसके लिये 'कथितं पूर्वं' पहले कहे जानेकी बात कही है। इससे दोनोंकी एकग्रन्थता स्पष्ट है।

२-इसीके ३२वें अध्यायमें 'त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला' कहा गया है। आकाशवाणीने शकुन्तलाके जिस कथनकी बात कही है, वह महाभारतके आदिपर्वमे ही है।

३-भविष्यपर्वके ७३वें अध्यायमें जो भगवान् श्रीकृष्णके कैलास-गमनका कारण पूछा गया है, वह आनुशासनिक पर्वके संक्षिप्त कैलास-गमन वृत्तको लक्ष्य करके ही पूछा गया है। इसी प्रकार और भी कई उदाहरण हैं।