भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 738

७१६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे त्रिधा विभज्य चात्मानं मन्प्रियं यदि काङ्क्षसे । चतुष्पादान् भजैकेन द्वितीयेन च स्थावरान् ॥ २१ ॥ तृतीयो यश्च ते भागो मानुषेषूपपत्स्यते । त्रिधाभूतं वपुः कृत्वा पक्षिषु त्वं भव ज्वर ॥ २२ ॥ चतुर्थो यस्तृतीयस्य भविष्यति स ते ध्रुवम् । एकान्तरस्तृतीयस्तु स वै चातुर्थिको ज्वरः ॥ २३ ॥ यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो अपने आप- को तीन भागोंमें विभक्त करके एक भागसे चौपायोंका आश्रय लो, द्वितीय भागसे वृक्ष, पर्वत आदि स्थावर वस्तुओंका सेवन करो तथा तुम्हारा जो तीसरा भाग है, वह मनुष्योंमें रहने योग्य होगा । ज्वर ! इस प्रकार तुम अपने स्वरूपको तीन भागोंमें बाँटकर उपर्युक्त स्थानोंमें रहो तथा तुम्हारे तीसरे भागका जो एक चौथाई अंश है, वह पक्षियोंमें अटल भावसे स्थित होगा । यह तीसरी श्रेणीका जो ज्वर है, वह एक दिनका अन्तर देकर आनेपर एकान्तर या अँतरया कहलायेगा, दो दिनका अन्तर देनेपर तिजरा और तीन दिन- का अन्तर देकर आनेपर वही चातुर्थिक (चौथिया ज्वर) कहलायेगा ॥ २१-२३ ॥ मानुषेष्वभिभेदेन वस त्वं प्रविभज्य वै । जातिष्वथावशेषासु निवंस त्वं शृणुष्व मे ॥ २४ ॥ इन भेद-उपभेदोंके साथ अपने रूपका विभाजन करके तुम मनुष्योंमें निवास करो । साथ ही, जो शेष जातियाँ हैं, उनमें भी तुम वास करो । किस तरह ? यह मुझसे सुनो-॥ वृक्षेषु कीटरूपेण तथा संकोचपत्रकः । पाण्डुपत्रश्च विख्यातः फलेष्वातूर्यमेव च ॥ २५ ॥ वृक्षोंमें तुम कीटरूपसे निवास करो, इसके सिवा वहाँ तुम संकोचपत्रक और पाण्डुपत्रक नामसे विख्यात होगे (वृक्षोंके जो पत्ते सिकुड़ने लगते हैं, यह उनमें संकोचपत्रक नामक ज्वर है और जो उनके पत्ते पीले पड़ने लगते हैं, यह उनमें पाण्डुपत्रक नामक ज्वर है) तथा वृक्षोंके फलोंमें आतूर्यनामसे तुम्हारी ख्याति होगी (फलोंके एक देशमें जाली पड़ जानेसे जो वे फल सिकुड़ने या सूखने लगते हैं, यह उनमें आतूर्यनामक ज्वरका लक्षण है) ॥ २५ ॥ अपां तु नीलिकां विद्याच्छिखोद्भेदेन बर्हिणाम् । पद्मिन्यादौ हिमो भूत्वा पृथिव्यामपि चोपरः ॥ २६ ॥ गैरिकः पर्वतेष्वेव मत्प्रसादाद् भविष्यसि । जलोंमें नीलिकाको ज्वर समझना चाहिये । मोरोंके सिरपर जो शिखा फूट निकलती है, उसीके रूपमें उनके भीतर तुम्हारा वास होगा । तुम कमलिनी आदिपर हिम (पाला), पृथ्वीमें ऊपर तथा पर्वतोंपर गेरू होकर मेरी कृपासे वहाँ निवास करोगे ॥ २६३ ॥ गोष्वपस्मारको भूत्वा खोरकश्च भविष्यसि ॥ २७ ॥ एवं त्वं बहुरूपेण भविष्यसि महीतले । गौओंमें अपस्मार ( कम्पन) और खोरक (खुर- रोग ) होकर रहोगे । इस प्रकार तुम पृथ्वीपर बहुत-से रूपोंमें प्रकट होओगे ॥ २७३ ॥ दर्शनात् स्पर्शनाच्चापि प्राणिनां वधमेष्यसि ॥ २८ ॥ ऋते देवमनुष्याणां नान्यस्त्वां विसहिष्यति । तुम अपने दृष्टिपात और स्पर्शसे भी प्राणियोंका वध कर डालोगे । देवता और मनुष्योंके सिवा दूसरा कोई तुम्हारा वेग नहीं सह सकेगा ॥ २८३ ॥ वैशम्पायन उवाच कृष्णस्य वचनं श्रुत्वा ज्वरो हृष्टमना ह्यभूत् ॥ २९ ॥ प्रोवाच वचनं किंचित् प्रणमित्वा कृताञ्जलिः । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर ज्वरका मन प्रसन्न हो गया । उसने हाथ जोड़कर प्रणाम करके कुछ बात कही ॥ २९३ ॥ ज्वर उवाच सर्वजातिप्रभुत्वेन कृतो धन्योऽस्मि माधव ॥ ३० ॥ भूयश्च ते वचः कर्तुमिच्छामि पुरुषर्षभ । तदाज्ञापय गोविन्द किं करोमि महाभुज ॥ ३१ ॥ ज्वर बोला—पुरुषप्रवर माधव ! आपने सभी जातिके प्राणियोंपर मेरी प्रभुता स्थापित करके मुझे धन्य कर दिया । महाबाहु गोविन्द ! अब मैं पुनः आपकी आज्ञाका पालन करना चाहता हूँ । अतः आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ॥ ३०-३१ ॥ अहमसुरकुलप्रमाथिना त्रिपुरहरेण हरेण निर्मितः । रणशिरसि विनिर्जितस्त्वया प्रभुरसि देव तवास्मि किंकरः ॥ ३२ ॥ देव ! असुरकुलनाशक और त्रिपुरसंहारक भगवान् हरने मेरी सृष्टि की है, आज युद्धके मुहानेपर आपने मुझे पराजित कर दिया । अतः आप मेरे प्रभु हैं और मैं आपका किङ्कर हूँ ॥ ३२ ॥ धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यत् त्वया मत्प्रियं कृतम् । आज्ञापय प्रियं किं ते चक्रायुध करोम्यहम् ॥ ३३ ॥ चक्रधारी श्रीकृष्ण ! आपने जो मेरा प्रिय किया, इससे मैं धन्य हो गया । आपके अनुग्रहका पात्र बन गया, अब आज्ञा दीजिये, मैं आपका कौन सा प्रिय कार्य सम्पन्न करूँ ? ॥ वैशम्पायन उवाच ज्वरस्य वचनं श्रुत्वा वासुदेवोऽब्रवीद् वचः । अभिसंधिं शृणुष्वाद्य यत्त्वां वक्ष्यामि निश्चयात् ॥३४॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! ज्वरका यह वचन सुनकर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने कहा—'ज्वर ! मैं क्या चाहता हूँ; यह सुनो । मैं निश्चित रूपसे तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसपर ध्यान दो' ॥ ३४ ॥ श्रीभगवानुवाच महाहवे तव मम च द्वयोरिमं पराक्रमं भुजबलकेवलाश्रयोः ।