विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 737, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[विष्णुपर्व ] त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७१५
जृम्भते श्वसते चैव वल्गते च पुनः पुनः।
रोमाञ्चोत्थितगात्रश्च निद्रया चाभिभूयते ॥ ४ ॥
वे बारंबार जँभाई लेते, लंबी साँस खींचते और उछलते-कूदते थे; उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया और वे निद्रासे अभिभूत होने लगे ॥ ४ ॥
ततः स्थैर्यं समालम्ब्य कृष्णः परपुरंजयः ।
विकुर्वति महायोगी जम्भमाणः पुनः पुनः ॥ ५ ॥
तदनन्तर किसी तरह स्थिरता धारण करके शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले महायोगी श्रीकृष्ण बारंबार जँभाई लेते हुए विकारको प्राप्त होने लगे ॥ ५ ॥
ज्वराभिभूतमात्मानं विज्ञाय पुरुषोत्तमः ।
सोऽसृजज्ज्वरमन्यं तु पूर्वज्वरविनाशनम् ॥ ६ ॥
अपने आपको ज्वरसे आक्रान्त हुआ जान पुरुषोत्तम श्रीहरिने दूसरे ज्वरकी सृष्टि की, जो पूर्व ज्वरका विनाश करनेवाला था ॥ ६ ॥
घोरं वैष्णवमत्युग्रं सर्वप्राणिभयंकरम् ।
संसृष्टवान् स तेजस्वी तं ज्वरं भीमविक्रमम् ॥ ७ ॥
तेजस्वी श्रीकृष्णने जिस भयानक पराक्रमी ज्वरकी सृष्टि की थी, वह घोर वैष्णव ज्वर अत्यन्त उग्र तथा समस्त प्राणियोंके लिये भयङ्कर था ॥ ७ ॥
ज्वरः कृष्णविसृष्टस्तु गृहीत्वा तं ज्वरं बलात् ।
कृष्णाय हृष्टः प्रायच्छत् तं जग्राह ततो हरिः ॥ ८ ॥
श्रीकृष्णद्वारा रचे गये उस ज्वरने पूर्वोक्त त्रिशिरा ज्वरको बलपूर्वक पकड़कर बड़े हर्षके साथ उसे श्रीकृष्णको समर्पित कर दिया। तब श्रीहरिने पुनः उस ज्वरको पकड़ लिया ॥ ८ ॥
ततस्तं परमक्रुद्धो वासुदेवो महाबलः ।
स्वगात्रात् स्वज्वरेणैव निष्कासयत वीर्यवान् ॥ ९ ॥
तब अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए महाबली पराक्रमी भगवान् वासुदेवने अपने ज्वरके द्वारा ही त्रिशिरा ज्वरको अपने शरीरसे निकलवा दिया ॥ ९ ॥
आविध्य भूतले चैनं शतधा कर्तुमुद्यतः ।
व्याघोषत ज्वरस्तत्र भोः परित्रातुमर्हसि ॥ १० ॥
तत्पश्चात् वे उसे पृथ्वीपर घुमाकर उसके सौ टुकड़े कर देनेको उद्यत हो गये, तब वहाँ उस ज्वरने यह पुकार की, 'प्रभो ! आप मेरी रक्षा करें' ॥ १० ॥
आविध्यमाने तस्मिंस्तु कृष्णेनामिततेजसा ।
अशरीरा ततो वाणी ह्यन्तरिक्षादभाषत ॥ ११ ॥
अमिततेजस्वी श्रीकृष्णके द्वारा उस ज्वरके घुमाये जाते समय आकाशसे शरीररहित वाणीने इस प्रकार कहा—॥११॥
कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां नन्दिवर्धन ।
मा वधीर्ज्वरमेनं तु रक्षणीयस्त्वयानघ ॥ १२ ॥
'कृष्ण ! कृष्ण !! महाबाहो !!! यदुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले निष्पाप श्रीकृष्ण ! आप इस ज्वरका वध न कीजिये, यह आपके द्वारा रक्षणीय है' ॥ १२ ॥
इत्येवमुक्ते वचने तं मुमोच हरिः स्वयम् ।
भूतभव्यभविष्यस्य जगतः परमो गुरुः ॥ १३ ॥
आकाशवाणीके ऐसा कहनेपर भूत, भविष्य और वर्तमान जगत्के परम गुरु साक्षात् श्रीहरिने उसे छोड़ दिया ॥ १३ ॥
कृष्णस्य पादयोर्मूर्ध्ना शरणं सोऽगमज्ज्वरः ।
एवं मुक्तो हृषीकेशं ज्वरो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ १४ ॥
उनके हाथसे इस प्रकार मुक्त होकर वह ज्वर श्रीकृष्णके दोनों चरणोंमें मस्तक रखकर उन्हींकी शरणमें गया और उन भगवान् हृषीकेशसे इस प्रकार बोला—॥ १४ ॥
शृणुष्व मम गोविन्द विज्ञाप्यं यदुनन्दन ।
यो मे मनोरथो देव तं त्वं कुरु महाभुज ॥ १५ ॥
'गोविन्द ! यदुनन्दन ! मेरा निवेदन सुनिये । देव ! महाबाहो ! मेरा जो मनोरथ है, उसे पूर्ण कीजिये ॥ १५ ॥
अहमेको ज्वरस्तात नान्यो लोके ज्वरो भवेत् ।
त्वत्प्रसादाद्धि देवेश वरमेनं वृणोम्यहम् ॥ १६ ॥
'तात ! देवेश्वर ! संसारमें मैं एक ज्वर हूँ, अब मेरे सिवा दूसरा कोई ज्वर न हो। आपकी कृपासे मैं इस वरको माँगता हूँ' ॥ १६ ॥
देव उवाच
एवं भवतु भद्रं ते यथा त्वं ज्वर काङ्क्षसे ।
वरार्थिनां वरो देयो भवांश्च शरणं गतः ॥ १७ ॥
श्रीभगवान्ने कहा— ज्वर ! तुम्हारा भला हो, तुम जैसा चाहते हो, ऐसा ही हो।' मेरे लिये सभी वरार्थियोंको वर देना उचित है, तुम तो वरार्थी होकर मेरी शरणमें आये हो ( अतः तुम विशेष कृपाके पात्र हो ) ॥ १७ ॥
एक एव ज्वरो लोके भवानस्तु यथा पुरा ।
योऽयं मया ज्वरः सृष्टो मय्येवैष प्रलीयताम् ॥ १८ ॥
तुम पहलेकी ही भाँति संसारमें एक ही ज्वरके रूपमें रहो । मैंने जो इस ज्वरकी सृष्टि की है, यह फिर मुझमें ही लीन हो जाय ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ते तु वचने ज्वरं प्रति महायशाः ।
कृष्णः प्रहरतां श्रेष्ठः पुनर्वाक्यमुवाच ह ॥ १९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! उस ज्वरके प्रति ऐसी बात कहकर प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ महायशस्वी श्रीकृष्ण पुनः इस प्रकार बोले ॥ १९ ॥
वासुदेव उवाच
शृणुष्व ज्वर संदेशं यथा लोके चरिष्यसि ।
सर्वजातिषु विश्रब्धं यथा स्थावरजङ्गमे ॥ २० ॥
वासुदेवने कहा— ज्वर ! मेरा संदेश सुनो, जिसके अनुसार तुम चराचर जगत्में सभी जातिके प्राणियोंके भीतर बेखटके विचरण करोगे ॥ २० ॥