भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 736, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 736
७१४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

डरो मत।' ऐसा कहकर श्रीकृष्णने बड़े स्नेहके साथ हलधरको हृदयसे लगाया। फिर तो वे तत्काल ही उस दाहसे मुक्त हो गये ॥ ८३-८४ १/२ ॥

मोक्षयित्वा बलं तत्र दाहात् तु मधुसूदनः ॥ ८५ ॥
प्रोवाच परमक्रुद्धो वासुदेवो ज्वरं तदा ।
बलरामजीको वहाँ ज्वरजनित दाहसे मुक्त करके अत्यन्त कुपित हुए वसुदेवनन्दन मधुसूदनने उस समय उस ज्वरसे कहा ॥ ८५ १/२ ॥

श्रीभगवानुवाच
एह्येहि ज्वर युध्यस्व या ते शक्तिर्महामृधे ॥ ८६ ॥
यच्च ते पौरुषं सर्वं तद् दर्शयतु नो भवान् ।
श्रीभगवान् बोले—ज्वर ! आओ, आओ, युद्ध करो। तुम्हारी जो शक्ति है और तुममें जो पुरुषार्थ है, वह सब हमें इस महासमरमें दिखाओ ॥ ८६ १/२ ॥

सव्येतराभ्यां बाहुभ्यामेवमुक्तो ज्वरस्तदा ॥ ८७ ॥
चिक्षेपाग्निं महत् भस्म ज्वालागर्भं महाबलः ।
उनके ऐसा कहनेपर उस महाबली ज्वरने अपनी दोनों दाहिनी भुजाओंसे उनके ऊपर वह महान् भस्म फेंका, जिसके भीतर ज्वाला छिपी हुई थी ॥ ८७ १/२ ॥

ततः प्रदीप्तगात्रस्तु मुहूर्तमभवत् प्रभुः ॥ ८८ ॥
कृष्णः प्रहरतां श्रेष्ठः शमं चाग्निर्गतस्ततः ।
उस भस्मसे दो घड़ीके लिये प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णका सारा शरीर जल उठा; परंतु फिर वह आग अपने-आप बुझ गयी ॥ ८८ १/२ ॥

ततस्तैर्भुजगाकारैर्बाहुभिस्तु त्रिभिस्तदा ॥ ८९ ॥
जघान कृष्णं ग्रीवायां मुष्टिनैकेन चोरसि ।
तब उस त्रिशिराने अपनी तीन सर्पाकार भुजाओंसे श्रीकृष्णके कण्ठमें प्रहार किया और एक मुक्केसे उनकी छातीपर चोट की ॥ ८९ १/२ ॥

स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोः पुरुषसिंहयोः ॥ ९० ॥
ज्वरस्य तु महायुद्धे कृष्णस्य तु महौजसः ।
पर्वतेषु पतन्तीनामशनीनामिव स्वनः ॥ ९१ ॥
(फिर श्रीकृष्ण भी उस ज्वरको पीटने लगे।) उस महायुद्धमें ज्वर और महातेजस्वी श्रीकृष्ण दोनों पुरुषसिंहोंमें भयंकर मुष्टिका प्रहार होने लगा । उसका शब्द पर्वतोंपर गिरती हुई बिजलियोंकी गड़गड़ाहटके समान प्रतीत होता था॥

कृष्णज्वरभुजाघातैर्युद्धमासीत् सुदारुणम् ।
नैवमेवं प्रहर्तव्यमिति तत्र महास्वनः ।
मुहूर्तमभवद् युद्धमन्योन्यं तु महात्मनोः ॥ ९२ ॥
श्रीकृष्ण और ज्वर दोनोंमें भुजाओंके आघातसे अत्यन्त भयंकर युद्ध हो रहा था। 'ऐसे नहीं, ऐसे प्रहार करना चाहिये' यह शब्द वहाँ बड़े जोर-जोरसे सुनायी देता था। इस प्रकार उन दोनों महात्माओंमें दो घड़ीतक परस्पर युद्ध चलता रहा॥

ततो ज्वरं कनकविचित्रभूषणं
न्यपीडयद् भुजयुगलेन संयुगे ।
जगत्क्षयं समुपनयञ्जगत्पतिः
शरीरधृग् गगनचरं महामृधे ॥ ९३ ॥
तदनन्तर मानवशरीर धारण करके प्रकट हुए जगदीश्वर श्रीहरिने उस महासमरमें सोनेके विचित्र आभूषणोंसे विभूषित उस आकाशचारी ज्वरको अपनी दोनों भुजाओंसे धर दबाया। उस समय ऐसा जान पड़ता था कि वे जगदीश्वर सारे संसारका संहार कर डालेंगे ॥ ९३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कृष्णज्वरयुद्धे द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्ण और ज्वरका युद्धविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२२ ॥


त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णसे पराजित हुए ज्वरका उनकी शरणमें जाना, उनसे वर पाना और उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर रणभूमिसे हट जाना

वैशम्पायन उवाच
मृतमित्यभिविज्ञाय ज्वरं शत्रुनिषूदनः ।
कृष्णो भुजबलाभ्यां तु चिक्षेपाथ महीतले ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस ज्वरको मरा हुआ जानकर शत्रुसूदन श्रीकृष्णने अपनी बलिष्ठ भुजाओंसे उठाकर उसे पृथ्वीपर फेंक दिया ॥ १ ॥

मुक्तमात्रः स बाहुभ्यां कृष्णदेहं विवेश ह ।
अमुक्त्वा विग्रहं तस्य कृष्णस्याप्रतिमौजसः ॥ २ ॥
श्रीकृष्णकी भुजाओंसे छूटते ही वह उनके शरीरके भीतर घुस गया; वह अमिततेजस्वी श्रीकृष्णके श्रीविग्रहको छोड़कर न जा सका ॥ २ ॥

स ह्याविष्टस्तथा तेन ज्वरेणाप्रतिमौजसा ।
कृष्णः स्खलन्निव मुहुः क्षितौ गाढं व्यवर्तत ॥ ३ ॥
उस अप्रतिम बलशाली ज्वरसे आविष्ट होकर श्रीकृष्ण बारंबार लड़खड़ाते हुए-से पृथ्वीपर बैठ गये और जोर-जोरसे लोटने लगे ॥ ३ ॥