विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 740, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७१८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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'अपनी जातिका, अपने वीरभावका तथा भगवान् शङ्करके साथ हमारा जो सम्पर्क है उसका सम्मान करते हुए तुमलोगोंको यहाँसे हटना नहीं चाहिये; देखो ! यह मैं युद्ध-भूमिमें डटा हुआ हूँ' ॥ ९ ॥
एवमुच्चरितं वाक्यं शृण्वन्तस्तदचिन्तयन् ।
अपाक्रामन्त ते सर्वे दानवा भयमोहिताः ॥ १० ॥
इस प्रकार कहे गये उत्साहवर्धक वाक्यको सुनते हुए भी उसकी परवा न करके वे समस्त दानव भयसे मोहित होकर भाग चले ॥ १० ॥
प्रमाथगणशेषं तु तदनीकमतिष्ठत ।
भग्नावशेषं युद्धाय पुनश्चक्रे मनस्तदा ॥ ११ ॥
अब उस सेनामें केवल प्रमथगण शेष रह गये; उन्हींको लेकर वह सेना वहाँ खड़ी थी। उस समय भागनेसे बचे-खुचे सैनिकोंने पुनः युद्धमें मन लगाया ॥ ११ ॥
कुम्भाण्डो नाम बाणस्य सखामात्यश्च वीर्यवान् ।
भग्नं स्वबलमालोक्य इदं वचनमब्रवीत् ॥ १२ ॥
बाणासुरके मन्त्री और सखा पराक्रमी कुम्भाण्डने अपनी सेनामें भगदड़ मची देख यह बात कही—॥ १२ ॥
एष बाणः स्थितो युद्धे शंकरोऽयं गुहस्तथा ।
किमर्थं बलमुत्सृज्य भवन्तो यान्ति मोहिताः ॥ १३ ॥
'वीरो ! ये राजा बाणासुर युद्धमें स्थित हैं। ये भगवान् शङ्कर और कार्तिकेयजी भी यहाँ विराजमान हैं। फिर तुम लोग मोहग्रस्त हो अपनी सेनाको छोड़कर किसलिये भाग रहे हो' ॥
प्राणांस्त्यक्त्वा पलायन्ते सर्वे दानवपुङ्गवाः ।
एवं कुम्भाण्डवाक्यं ते शृण्वन्तो भयविह्वलाः ।
चक्राग्निभयवित्रस्ताः सर्वे यान्ति दिशो दश ॥ १४ ॥
कुम्भाण्डका ऐसा वचन सुनते हुए भी वे समस्त दानवशिरोमणि भयसे व्याकुल हो प्राणोंका मोह छोड़कर पलायन करने लगे। वे सब-के-सब श्रीकृष्णकी चक्राग्निके भयसे थर्रा उठे थे; अतः दसों दिशाओंकी ओर भागे चले जा रहे थे ॥
भग्नं बलं ततो दृष्ट्वा कृष्णेनामिततेजसा ।
संरक्तनयनः स्थाणुर्युद्धाय पर्यवर्तत ॥ १५ ॥
तदनन्तर अमित तेजस्वी श्रीकृष्णके द्वारा दानवसेना-में भगदड़ पड़ी देख भगवान् शङ्कर क्रोधसे लाल आँखें किये स्वयं युद्धके लिये उपस्थित हुए ॥ १५ ॥
बाणसंरक्षणं कर्तुं रथमास्थाय सुप्रभम् ।
देवः कुमारश्च तथा रथेनाग्निसमेन वै ॥ १६ ॥
वे बाणासुरकी रक्षा करनेके लिये उत्तम प्रभासे युक्त रथपर आरूढ़ होकर आये थे; साथ ही कुमार स्कन्ददेव भी अग्निके समान तेजस्वी रथके द्वारा वहाँ उपस्थित हुए थे ॥ १६॥
नन्दीश्वरसमायुक्तं रथमास्थाय वीर्यवान् ।
संदष्टौष्ठपुटो रुद्रः प्राधावत यतो हरिः ॥ १७ ॥
नन्दीश्वरसे संयुक्त रथपर आरूढ़ हो पराक्रमी भगवान् रुद्र अपने ओष्ठको दाँतोंसे दबाकर उसी ओर दौड़े; जहाँ श्रीहरि विद्यमान थे ॥ १७ ॥
पिबन्निव तदाकाशं सिंहयुक्तो महास्वनः ।
रथो भाति घनोन्मुक्तः पौर्णमास्यां यथा शशी ॥ १८ ॥
सिंहोंसे जुता हुआ उनका रथ ऐसी तीव्रगतिसे दौड़ रहा था, मानो आकाशको पिये लेता हो। उससे बड़ी भारी घरघराहट हो रही थी। वह रथ ऐसा जान पड़ता था, मानो मेघोंके आवरणसे मुक्त हुआ पूर्णमासीका चन्द्रमा प्रकाशित हो रहा हो ॥ १८ ॥
ततो गणसहस्रैस्तु नानारूपैर्भयावहैः ।
नदद्भिर्विविधान् नादान् रथो देवस्य शोभयन् ॥ १९ ॥
तत्पश्चात् नाना प्रकारके सिंहनाद करते हुए नाना रूप-धारी सहस्रों भयंकर गणोंके साथ महादेवजीका रथ रणभूमिकी शोभा बढ़ाने लगा ॥ १९ ॥
केचित् सिंहमुखास्तत्र तथा व्याघ्रमुखाः परे ।
नागाश्वोष्ट्रमुखास्तत्र प्रवेपुरतिपीडिताः ॥ २० ॥
भगवान् शिवके गणोंमें कोई सिंहके समान मुखवाले थे तो कोई व्याघ्रके समान; कितनोंके मुख हाथी, घोड़े और ऊँटके समान थे; ये सब श्रीकृष्णके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर थर थर काँपने लगे ॥ २० ॥
व्यालयज्ञोपवीताश्च केचित् तत्र महाबलाः ।
खरोष्ट्रगजवक्त्राश्च अश्वग्रीवाश्च संस्थिताः ॥ २१ ॥
उनमेंसे कितने ही महाबली प्रमथगणोंने सर्पमय यज्ञो-पवीत धारण कर रखे थे; कितनोंके मुख गधे, ऊँट और हाथियोंके समान थे, कितने ही घोड़ोंकी-सी गर्दन लिये खड़े थे ॥ २१ ॥
छागमार्जारवक्त्राश्च मेषवक्त्रास्तथा परे ।
चीरिणः शिखिनश्चान्ये जटिलोर्ध्वशिरोरुहाः ॥ २२ ॥
भग्नाः परिपतन्ति स्म शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ।
अन्य शिवगणोंके मुख भेड़, बकरे और बिलावोंके समान थे; कितने ही चीर वस्त्र धारण किये हुए थे, कितनोंके मस्तकपर शिखा सुशोभित हो रही थीं; बहुतोंने जटाएँ बढ़ा रखी थीं और कितनोंके सिरके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए थे। श्रीकृष्णके बाणोंसे घायल हो इन सबके पाँव उखड़ गये। ये शङ्ख एवं दुन्दुभियोंके शब्द सुनकर ही रणभूमिमें गिर पड़ते थे ॥ २२ १/२ ॥
केचित् सौम्यमुखास्तत्र दिव्यैः शस्त्रैरलंकृताः॥ २३ ॥
नानापुष्पकृतापीड़ा नानाप्रहरणाद्युधाः ।
कितने ही शिवगणोंके मुख सौम्य थे, वे वहाँ दिव्य अस्त्र-शस्त्रोंसे सुशोभित होते थे। उन्होंने भाँति-भाँतिके फूलोंके मुकुट धारण किये थे और उनके आयुध भी अनेक प्रकारके थे ॥ २३ १/२ ॥
वामना विकटाश्चैव सिंहव्याघ्रपरिच्छदाः ॥ २४ ॥
रुधिराद्र्रैमहावक्त्रैर्महादंष्ट्रा बलिप्रियाः ।
कितने ही गण बौने और विकट आकारवाले थे; उन्होंने सिंहों और व्याघ्रोंकी खालोंसे अपने शरीरको ढक रखा था। कितनोंकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं और वे खूनसे