विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 756, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७३४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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बहने लगी, कटी हुई बाँहवाला वह महान् असुर खूनसे लथपथ होकर पर्वताकार हो गया और रक्तसे मतवाला हो मेघके समान नाना प्रकारसे गर्जना करने लगा ॥ १३२-१३३ ॥
तस्य नादेन महता केशवो रिपुसूदनः ।
चक्रं भूयः क्षेप्तुकामो बाणनाशार्थमुद्यतः ।
तमुपेत्य महादेवः कुमारसहितोऽब्रवीत् ॥ १३४॥
उसके उस महान् सिंहनादसे कुपित हुए शत्रुसूदन केशव बाणासुरका विनाश कर डालनेके लिये उद्यत हो गये। वे पुनः अपना चक्र छोड़ना ही चाहते थे कि कुमार कार्तिकेयसहित महादेवजी उनके पास आ गये और इस प्रकार बोले ॥ १३४ ॥
ईश्वर उवाच
कृष्ण कृष्ण महाबाहो जाने त्वां पुरुषोत्तमम् ।
मधुकैटभहन्तारं देवदेवं सनातनम् ॥ १३५॥
महादेवजी बोले—कृष्ण ! कृष्ण !! महाबाहो ! मैं आपको जानता हूँ, आप मधु और कैटभका वध करनेवाले सनातन देवाधिदेव पुरुषोत्तम श्रीहरि हैं ॥ १३५ ॥
लोकानां त्वं गतिर्देव त्वत्प्रसूतमिदं जगत् ।
अजेयस्त्वं त्रिभिर्लोकैः ससुरासुरपन्नगैः ॥ १३६॥
देव ! आप सम्पूर्ण लोकोंकी गति हैं; आपसे ही इस जगत्की उत्पत्ति हुई है; देवता, असुर तथा नागोंसहित तीनों लोकोंके लिये आप अजेय हैं ॥ १३६ ॥
तस्मात्संहर दिव्यं त्वमिदं चक्रं समुद्यतम् ।
अनिवार्यमसंहार्यं रणे शत्रुभयंकरम् ॥ १३७॥
अतः आप ऊपर उठे हुए अपने इस दिव्य चक्रको पुनः समेट लीजिये । रणभूमिमें इसका निवारण अथवा संहार करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, यह शत्रुओंके लिये अत्यन्त भयंकर है ॥ १३७ ॥
बाणस्यास्याभयं दत्तं मया केशिनिषूदन ।
तन्मे न स्याद् वृथा वाक्यमतस्त्वां क्षामयाम्यहम्॥१३८॥
केशिनिषूदन ! मैंने इस बाणासुरको अभयदान दे रखा है; मेरा वह वचन व्यर्थ न हो जाय इसके लिये मैं आपसे क्षमा करनेकी प्रार्थना करता हूँ ॥ १३८ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
जीवतां देव बाणोऽयमेतच्चक्रं निवर्तितम् ।
मान्यस्त्वं देवदेवानामसुरणां च सर्वशः ॥ १३९॥
श्रीकृष्ण बोले—देव ! यह चक्र मैंने लौटा लिया, अब यह बाणासुर चिरजीवी हो; आप देवताओंके भी देवता तथा सम्पूर्ण असुरोंके लिये माननीय हैं ॥ १३९ ॥
नमस्तेऽस्तु गमिष्यामि यत्कार्यं तन्महेश्वर ।
न तावत् क्रियते तस्मान्मामन्नुज्ञातुमर्हसि ॥ १४०॥
महेश्वर ! आपको नमस्कार है। अब मैं लौट जाऊँगा; बाणासुरका वधरूपी जो कार्य मुझे करना था, वह आपके अनुरोधसे अब मेरे द्वारा नहीं किया जा रहा है; इसलिये आप मुझे लौटनेकी आज्ञा प्रदान करें ॥ १४० ॥
एवमुक्त्वा महादेवं कृष्णस्तूर्णं महामनाः ।
जगाम तत्र यत्रास्ते प्रद्युम्निः सायकैश्चितः ॥ १४१॥
महादेवजीसे ऐसा कहकर महामनस्वी भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत उस स्थानपर गये, जहाँ प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध सायकोंसे बँधे हुए थे ॥ १४१ ॥
गते कृष्णे ततो नन्दी बाणमाह वचः शुभम् ।
गच्छ बाण प्रसन्नस्य देवदेवस्य चाग्रतः ॥ १४२॥
श्रीकृष्णके चले जानेपर नन्दीने बाणासुरसे यह मङ्गलमय बात कही—'बाण ! तुम प्रसन्न हुए देवाधिदेव महादेवजीके सामने चलो' ॥ १४२ ॥
तच्छ्रुत्वा नन्दिवाक्यं तु बाणोऽगच्छत शीघ्रगः ।
छिन्नबाहुं ततो बाणं दृष्ट्वा नन्दी प्रतापवान् ॥ १४३॥
अपवाह्य रथेनैनं यतो देवस्ततो ययौ ।
नन्दीका यह वचन सुनकर बाणासुर शीघ्रतापूर्वक चल पड़ा। उसकी भुजाएँ कटी हुई देख प्रतापी नन्दी उसे रथपर बिठाकर जहाँ महादेवजी थे, वहाँ ले गये ॥ १४३॥
ततो नन्दी पुनर्वाणं प्रागुवाचोत्तरं वचः ॥ १४४॥
बाण बाण प्रनृत्यस्व श्रेयस्तव भविष्यति ।
एष देवो महादेवः प्रसादसुमुखस्तव ॥ १४५॥
तत्पश्चात् नन्दीने पुनः बाणासुरसे पहले ही यह उत्कृष्ट बात कही—'बाण ! बाण !! तुम भगवान् शङ्करके सामने नृत्य करो, इससे तुम्हारा कल्याण होगा; यह भगवान् महादेवजी तुम्हारे ऊपर कृपा करनेके लिये प्रसन्न मुख हो रहे हैं' ॥ १४४-१४५ ॥
शोणितौघप्लुतैर्गात्रैर्नन्दिवाक्यप्रचोदितः ।
जीवितार्थी ततो बाणः प्रमुखे शंकरस्य वै ॥ १४६॥
अनृत्यद् भयसंविग्नो दानवः स विचेतनः ।
नन्दीके वाक्यसे प्रेरित हो जीवनकी इच्छा रखनेवाला बाणासुर भयसे व्याकुल और अचेत होकर रक्तसे लथपथ हुए शरीरसे भगवान् शङ्करके सम्मुख नृत्य करने लगा ॥ १४६॥
तं दृष्ट्वा च प्रनृत्यन्तं भयोद्विग्नं पुनः पुनः ॥ १४७॥
नन्दिवाक्यप्रजवितं भक्तानुग्रहकृद् भवः ।
करुणावशमापन्नो महादेवोऽब्रवीद् वचः ॥ १४८॥
नन्दीके कहनेसे भयके कारण उद्विग्न होकर वेगपूर्वक