विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 755, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७३३
प्रयच्छ ह्यभयं बाणे जीवपुत्रीत्वमेव च ।
मया दत्तवरो ह्येष भूयश्च परिरक्ष्यते ॥ ११७ ॥
न मे मिथ्या समुद्योगं कर्तुमर्हसि माधव ।
'भगवन् ! बाणासुरको अभयदान दीजिये और मुझे जीवित पुत्रकी जननी बनाइये। मैंने इसे वर दे रखा है, इसीलिये पुनः मेरे द्वारा इसकी रक्षा की जा रही है। माधव ! आप मेरे उद्योगको मिथ्या न कीजिये' ॥ ११७ १/२ ॥
एवमुक्ते तु वचने देव्या परपुरंजयः ॥ ११८ ॥
कृष्णः प्रभाषते वाक्यं शृणु सत्यं तु भामिनि ।
देवीके ऐसी बात कहनेपर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीकृष्ण इस प्रकार बोले—'भामिनि ! तुम मेरी सच्ची बात सुनो ॥ ११८ १/२ ॥
बाणो बाहुसहस्रेण नर्दते दर्पमाश्रितः ॥ ११९ ॥
एतेषां छेदनं त्वद्य कर्तव्यं नात्र संशयः ।
द्विबाहुना च बाणेन जीवपुत्री भविष्यसि ॥ १२० ॥
आसुरं दर्पमाश्रित्य न च मां संश्रयिष्यति ।
'बाणासुर अपनी सहस्र भुजाओंके कारण घमंडमें भरकर गर्जता रहता है, अतः आज इन भुजाओंका छेदन करना कर्तव्य है, इसमे संशय नहीं है। देवि ! तुम दो बाँहवाले बाणासुरके द्वारा ही जीवित पुत्रवाली बनोगी। यह बाणासुर आसुर अभिमानका आश्रय लेनेके कारण कभी मेरी शरणमे नहीं आयेगा' ॥ ११९-१२० १/२ ॥
एवमुक्ते तु वचने कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ॥ १२१ ॥
प्रोवाच देवी बाणोऽयं देवदत्तो भवेदिति ।
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णके इस तरह कहनेपर देवी बोली—'प्रभो ! यह बाणासुर महादेवजीका दिया हुआ मेरा दत्तक पुत्र हो' ॥ १२१ १/२ ॥
अथ तां कार्तिकेयस्य मातरं सोऽभिभाष्य वै ।
ततः क्रुद्धो महाबाहुः कृष्णः प्रवदतां वरः ॥ १२२ ॥
प्रोवाच बाणं समरे वदतां प्रवरः प्रभुः ।
कार्तिकेयकी मातासे इस प्रकार बातचीत करके वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण समराङ्गणमें कुपित हो बाणासुरसे यों बोले— ॥ १२२ १/२ ॥
युध्यतां युध्यतां संख्ये भवतां कोटवी स्थिता ॥ १२३ ॥
अशक्तानामिव रणे धिग् बाण तव पौरुषम् ।
'बाण ! संग्रामभूमिमें युद्ध करो। युद्ध करो !! असमर्थ पुरुषोंकी भाँति तुम्हारी रक्षाके लिये माता कोटवी इस रणक्षेत्रमें खड़ी है, तुम्हारे पुरुषार्थको धिक्कार है' ॥ १२३ १/२ ॥
एवमुक्त्वा ततः कृष्णस्तच्चक्रं परमात्मवान् ॥ १२४ ॥
निमीलिताक्षो व्यसृजद् बाणं प्रति महाबलः ।
ऐसा कहकर अपने मनको वशमें रखनेवाले महाबली श्रीकृष्णने बाणासुरपर वह उत्तम चक्र छोड़ दिया; उस समय (नग्न खड़ी हुई देवीपर दृष्टि न पड़े, इसके लिये) उन्होंने अपने दोनों नेत्र बंद कर लिये थे ॥ १२४ १/२ ॥
क्षेपणाद्यस्य मुह्यन्ति लोकाः सस्थाणुजङ्गमाः ॥ १२५ ॥
क्रव्यादानि च भूतानि तृप्तिं यान्ति महामृधे ।
तमप्रतिमकर्माणं समानं सूर्यवर्चसा ॥ १२६ ॥
चक्रमुद्यम्य समरे कोपदीप्तो गदाधरः ।
स मुष्णन् दानवं तेजः समरे स्वेन तेजसा ॥ १२७ ॥
चिच्छेद बाहूंचक्रेण श्रीधरः परमौजसा ।
महासमरमें जिसके प्रयोगसे चराचर प्राणियोंसहित समस्त लोक मोहित हो जाते हैं और मांसभक्षी प्राणियोंको तृप्ति प्राप्त होती है, उस अनुपम कर्म करनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी चक्रको उठाकर क्रोधसे बढ़े हुए तेजवाले गदाधारी भगवान् श्रीधरने समराङ्गणमें अपने उत्कृष्ट तेज और बलसे दानव बाणासुरके तेजका अपहरण करते हुए उसकी भुजाओंको चक्रसे काट डाला ॥ १२५-१२७ १/२ ॥
अलातचक्रवत् तूर्णं भ्राम्यमाणं रणाजिरे ॥ १२८ ॥
क्षिप्तं तु वासुदेवेन बाणस्य रणमूर्धनि ।
विष्णुचक्रं भ्रमत्यशु शैघ्याद् रूपं न दृश्यते ॥ १२९ ॥
रणक्षेत्रमें युद्धके मुहानेपर बाणासुरको लक्ष्य करके भगवान् वासुदेवके द्वारा चलाया गया वह चक्र वहाँ तुरंत ही अलातचक्रके समान घूमने लगा । वह इतनी शीघ्रतासे घूम रहा था कि उसका रूप दिखायी नहीं देता था ॥ १२८-१२९ ॥
तस्य बाहुसहस्रस्य पर्यायेण पुनः पुनः ।
बाणस्य च्छेदनं चक्रे तच्चक्रं रणमूर्धनि ॥ १३० ॥
संग्रामके शिरोभागमें उस चक्रने बारी वारीसे बाणासुरकी सहस्र भुजाओंको काटना आरम्भ किया ॥ १३० ॥
कृत्वा द्विबाहुं तं बाणं छिन्नशाखमिव द्रुमम् ।
पुनः कराग्रे कृष्णस्य चक्रं प्राप्तं सुदर्शनम् ॥ १३१ ॥
कटी हुई शाखावाले वृक्षकी भाँति बाणासुरको दो ही बाँहोंसे युक्त बनाकर वह सुदर्शन चक्र पुनः श्रीकृष्णके कराग्रभागमें आ पहुँचा ॥ १३१ ॥
वैशम्पायन उवाच
कृतकृत्ये तु सम्प्राप्ते चक्रे दैत्यनिपातने ।
स्रवता तेन कायेन शोणितौघपरिप्लुतः ॥ १३२ ॥
अभवत् पर्वताकारश्छिन्नबाहुर्महासुरः ।
असृङ् मत्तश्च विविधान् नादान् मुञ्चन् घनो यथा ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! दैत्योंको मार गिरानेवाला वह चक्र जब अपना काम पूरा करके श्रीकृष्णके हाथमे आ गया, तब बाणासुरके उस शरीरसे रक्तकी धारा