विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 754, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें७३२ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे
स तच्चक्रं सहस्रारं नदन् मेघ इवोष्णगे।
जग्राह कृष्णस्त्वरितो वाणान्तकरणं रणे ॥१०१॥
तत्पश्चात् श्रीकृष्णने तुरंत ही वर्षाकालके मेघकी भाँति गर्जना करके अपना वह सहस्रार चक्र हाथमें ले लिया, जो रणभूमिमें बाणासुरका अन्त करनेमें समर्थ था ॥ १०१ ॥
तेजो यज्ज्योतिषां चैव तेजो वज्राशनेस्तथा।
सुरेशस्य च यत् तेजस्तच्चक्रे पर्यवस्थितम् ॥१०२॥
उस समय जो ग्रहों और नक्षत्रोंका तेज था, जो वज्र और अशनिका प्रभाव था तथा जो देवेश्वर इन्द्रका तेज था, वह सब उस चक्रमें स्थापित हो गया ॥ १०२ ॥
त्रेताग्नेश्चैव यत् तेजो यच्च वै ब्रह्मचारिणाम्।
ऋषीणां च ततो ज्ञानं तच्चक्रे समवस्थितम् ॥१०३॥
तीनों अग्नियों और ब्रह्मचारियोंका जो तेज है तथा ऋषियोंका जो ज्ञान है, वह सब उस चक्रमें स्थित हो गया ॥
पतिव्रतानां यत् तेजः प्राणाश्च मृगपक्षिणाम्।
यच्च चक्रधरेष्वस्ति तच्चक्रे संनिवेशितम् ॥१०४॥
पतिव्रताओंका जो तेज है, पशुओं और पक्षियोंके जो प्राण हैं तथा चक्रधारियोंमें जो बल है, वह सब उस चक्रमें समाविष्ट हो गया ॥ १०४ ॥
नागराक्षसयक्षाणां गन्धर्वाप्सरसामपि ।
त्रैलोक्यस्य च यत् प्राणं सर्वं चक्रे व्यवस्थितम् ॥१०५॥
नाग, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व और अप्सराओंकी तथा त्रिलोकीकी जो प्राणशक्ति है, वह सब उस चक्रमें प्रतिष्ठित हुई ॥ १०५ ॥
तेजसा तेन संयुक्तं ज्वलन्निव च भास्करः।
वपुषा तेज आदत्ते बाणस्य प्रमुखे स्थितम् ॥१०६॥
उस तेजसे संयुक्त होकर वह चक्र जाज्वल्यमान सूर्यके समान उदीप्त हो उठा और सामने स्थित होकर अपने शरीरसे बाणासुरके तेजको ग्रहण करने लगा ॥ १०६ ॥
ज्ञात्वातितेजसा चक्रं कृष्णेनाभ्युदितं रणे।
अप्रमेयं ह्यविहतं रुद्राणी चाब्रवीच्छिवम् ॥१०७॥
रणक्षेत्रमें अति तेजस्वी श्रीकृष्णने अप्रमेय एवं अमोघ चक्र उठा लिया है, यह जानकर रुद्राणीने शिवजीसे कहा-॥
अजेयमेतत् त्रैलोक्ये चक्रं कृष्णेन धार्यते।
बाणं त्रायस्व देव त्वं यावच्चक्रं न मुञ्चति ॥१०८॥
'देव ! श्रीकृष्ण जिस चक्रको धारण करते हैं, वह तीनों लोकोंमें अजेय है, अतः जबतक वे उस चक्रको छोड़ नहीं देते हैं, तबतक ही यत्न करके बाणासुरकी रक्षा कीजिये' ॥१०८॥
ततस्त्र्यक्षो वचः श्रुत्वा देवीं लम्बामथाब्रवीत् ।
गच्छैहि लम्बे शीघ्रं त्वं बाणसंरक्षणं प्रति ॥१०९॥
पार्वतीजीका यह वचन सुनकर भगवान् त्रिलोचनने देवी लम्बासे कहा—'लम्बे ! तुम बाणासुरकी रक्षाके लिये शीघ्र जाओ' ॥ १०९ ॥
ततो योगं समाधाय अदृश्या हिमवत्सुता ।
कृष्णस्यैकस्य तद्रूपं दर्शन्ती पार्श्वमागता ॥११०॥
तब हिमवान्की पुत्री उमा योगका आश्रय ले अदृश्य हो श्रीकृष्णके पास गयीं, वे अपने उस स्वरूपका दर्शन एकमात्र श्रीकृष्णको ही करा रही थीं ॥ ११० ॥
चक्रोद्यतकरं दृष्ट्वा भगवन्तं रणाजिरे ॥
अन्तर्धानमुपागम्य त्यज्य सा वाससी पुनः ॥१११॥
परित्राणाय बाणस्य विजयाधिष्ठिता ततः।
प्रमुखे वासुदेवस्य दिग्वासाः कोटवी स्थिता ॥११२॥
समराङ्गणमें भगवान् श्रीकृष्णको हाथमें चक्र उठाये देख वे पुनः अदृश्य हो अपने वस्त्रका परित्याग करके बाणासुरकी रक्षाके लिये विजयाधिष्ठित हो कोटवी या लम्बाके रूपमें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके समक्ष नंगी खड़ी हो गयीं ॥
तां दृष्ट्वा पुनः प्राप्तां देवीं रुद्रस्य सम्मताम् ।
लम्बाद्वितीयां तिष्ठन्तीं कृष्णो वचनमब्रवीत् ॥११३॥
भूयः सामर्षताम्राक्षी दिग्वस्त्रावस्थिता रणे।
बाणसंरक्षणपरा हन्मि बाणं न संशयः ॥११४॥
रुद्रप्रिया पार्वती देवीको पुनः लम्बाके साथ आकर सामने खड़ी हुई देख श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा—'फिर तुम अमर्षसे लाल आँखें किये रणभूमिमें आकर नंगी खड़ी हो गयीं और बाणासुरकी रक्षाके प्रयत्नमें लग गयीं, परंतु मैं बाणासुरको मारूँगा, इसमें संशय नहीं है' ॥ ११३-११४॥
एवमुक्ता तु कृष्णेन भूयो देव्यब्रवीदिदम् ।
जाने त्वां सर्वभूतानां स्रष्टारं पुरुषोत्तमम् ।
महाभागं महादेवमनन्तं नीलमव्ययम् ॥११५॥
पद्मनाभं हृषीकेशं लोकानामादिसम्भवम् ।
नार्हसे देव हन्तुं वै बाणमप्रतिमं रणे ॥११६॥
श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर देवीने फिर इस प्रकार कहा—'प्रभो ! मैं आपको जानती हूँ, आप समस्त प्राणियोंके स्रष्टा, पुरुषोत्तम, महान् सौभाग्यशाली, महादेव, अनन्त, श्यामवर्णवाले तथा अविनाशी पुरुष हैं, आपकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, आप समस्त इन्द्रियोंके नियन्ता हैं तथा सम्पूर्ण जगत्के आदि कारण हैं। देव ! यह बाणासुर रणभूमिमें अप्रतिम वीरता दिखानेवाला है, अतः आपको इसका वध नहीं करना चाहिये ॥ ११५-११६ ॥