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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

७३२ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे

स तच्चक्रं सहस्रारं नदन् मेघ इवोष्णगे।
जग्राह कृष्णस्त्वरितो वाणान्तकरणं रणे ॥१०१॥

तत्पश्चात् श्रीकृष्णने तुरंत ही वर्षाकालके मेघकी भाँति गर्जना करके अपना वह सहस्रार चक्र हाथमें ले लिया, जो रणभूमिमें बाणासुरका अन्त करनेमें समर्थ था ॥ १०१ ॥

तेजो यज्ज्योतिषां चैव तेजो वज्राशनेस्तथा।
सुरेशस्य च यत् तेजस्तच्चक्रे पर्यवस्थितम् ॥१०२॥

उस समय जो ग्रहों और नक्षत्रोंका तेज था, जो वज्र और अशनिका प्रभाव था तथा जो देवेश्वर इन्द्रका तेज था, वह सब उस चक्रमें स्थापित हो गया ॥ १०२ ॥

त्रेताग्नेश्चैव यत् तेजो यच्च वै ब्रह्मचारिणाम्।
ऋषीणां च ततो ज्ञानं तच्चक्रे समवस्थितम् ॥१०३॥

तीनों अग्नियों और ब्रह्मचारियोंका जो तेज है तथा ऋषियोंका जो ज्ञान है, वह सब उस चक्रमें स्थित हो गया ॥

पतिव्रतानां यत् तेजः प्राणाश्च मृगपक्षिणाम्।
यच्च चक्रधरेष्वस्ति तच्चक्रे संनिवेशितम् ॥१०४॥

पतिव्रताओंका जो तेज है, पशुओं और पक्षियोंके जो प्राण हैं तथा चक्रधारियोंमें जो बल है, वह सब उस चक्रमें समाविष्ट हो गया ॥ १०४ ॥

नागराक्षसयक्षाणां गन्धर्वाप्सरसामपि ।
त्रैलोक्यस्य च यत् प्राणं सर्वं चक्रे व्यवस्थितम् ॥१०५॥

नाग, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व और अप्सराओंकी तथा त्रिलोकीकी जो प्राणशक्ति है, वह सब उस चक्रमें प्रतिष्ठित हुई ॥ १०५ ॥

तेजसा तेन संयुक्तं ज्वलन्निव च भास्करः।
वपुषा तेज आदत्ते बाणस्य प्रमुखे स्थितम् ॥१०६॥

उस तेजसे संयुक्त होकर वह चक्र जाज्वल्यमान सूर्यके समान उदीप्त हो उठा और सामने स्थित होकर अपने शरीरसे बाणासुरके तेजको ग्रहण करने लगा ॥ १०६ ॥

ज्ञात्वातितेजसा चक्रं कृष्णेनाभ्युदितं रणे।
अप्रमेयं ह्यविहतं रुद्राणी चाब्रवीच्छिवम् ॥१०७॥

रणक्षेत्रमें अति तेजस्वी श्रीकृष्णने अप्रमेय एवं अमोघ चक्र उठा लिया है, यह जानकर रुद्राणीने शिवजीसे कहा-॥

अजेयमेतत् त्रैलोक्ये चक्रं कृष्णेन धार्यते।
बाणं त्रायस्व देव त्वं यावच्चक्रं न मुञ्चति ॥१०८॥

'देव ! श्रीकृष्ण जिस चक्रको धारण करते हैं, वह तीनों लोकोंमें अजेय है, अतः जबतक वे उस चक्रको छोड़ नहीं देते हैं, तबतक ही यत्न करके बाणासुरकी रक्षा कीजिये' ॥१०८॥

ततस्त्र्यक्षो वचः श्रुत्वा देवीं लम्बामथाब्रवीत् ।
गच्छैहि लम्बे शीघ्रं त्वं बाणसंरक्षणं प्रति ॥१०९॥

पार्वतीजीका यह वचन सुनकर भगवान् त्रिलोचनने देवी लम्बासे कहा—'लम्बे ! तुम बाणासुरकी रक्षाके लिये शीघ्र जाओ' ॥ १०९ ॥

ततो योगं समाधाय अदृश्या हिमवत्सुता ।
कृष्णस्यैकस्य तद्रूपं दर्शन्ती पार्श्वमागता ॥११०॥

तब हिमवान्की पुत्री उमा योगका आश्रय ले अदृश्य हो श्रीकृष्णके पास गयीं, वे अपने उस स्वरूपका दर्शन एकमात्र श्रीकृष्णको ही करा रही थीं ॥ ११० ॥

चक्रोद्यतकरं दृष्ट्वा भगवन्तं रणाजिरे ॥
अन्तर्धानमुपागम्य त्यज्य सा वाससी पुनः ॥१११॥
परित्राणाय बाणस्य विजयाधिष्ठिता ततः।
प्रमुखे वासुदेवस्य दिग्वासाः कोटवी स्थिता ॥११२॥

समराङ्गणमें भगवान् श्रीकृष्णको हाथमें चक्र उठाये देख वे पुनः अदृश्य हो अपने वस्त्रका परित्याग करके बाणासुरकी रक्षाके लिये विजयाधिष्ठित हो कोटवी या लम्बाके रूपमें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके समक्ष नंगी खड़ी हो गयीं ॥

तां दृष्ट्वा पुनः प्राप्तां देवीं रुद्रस्य सम्मताम् ।
लम्बाद्वितीयां तिष्ठन्तीं कृष्णो वचनमब्रवीत् ॥११३॥
भूयः सामर्षताम्राक्षी दिग्वस्त्रावस्थिता रणे।
बाणसंरक्षणपरा हन्मि बाणं न संशयः ॥११४॥

रुद्रप्रिया पार्वती देवीको पुनः लम्बाके साथ आकर सामने खड़ी हुई देख श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा—'फिर तुम अमर्षसे लाल आँखें किये रणभूमिमें आकर नंगी खड़ी हो गयीं और बाणासुरकी रक्षाके प्रयत्नमें लग गयीं, परंतु मैं बाणासुरको मारूँगा, इसमें संशय नहीं है' ॥ ११३-११४॥

एवमुक्ता तु कृष्णेन भूयो देव्यब्रवीदिदम् ।
जाने त्वां सर्वभूतानां स्रष्टारं पुरुषोत्तमम् ।
महाभागं महादेवमनन्तं नीलमव्ययम् ॥११५॥
पद्मनाभं हृषीकेशं लोकानामादिसम्भवम् ।
नार्हसे देव हन्तुं वै बाणमप्रतिमं रणे ॥११६॥

श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर देवीने फिर इस प्रकार कहा—'प्रभो ! मैं आपको जानती हूँ, आप समस्त प्राणियोंके स्रष्टा, पुरुषोत्तम, महान् सौभाग्यशाली, महादेव, अनन्त, श्यामवर्णवाले तथा अविनाशी पुरुष हैं, आपकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, आप समस्त इन्द्रियोंके नियन्ता हैं तथा सम्पूर्ण जगत्के आदि कारण हैं। देव ! यह बाणासुर रणभूमिमें अप्रतिम वीरता दिखानेवाला है, अतः आपको इसका वध नहीं करना चाहिये ॥ ११५-११६ ॥

विष्णुपर्व ] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७३३


प्रयच्छ ह्यभयं बाणे जीवपुत्रीत्वमेव च ।
मया दत्तवरो ह्येष भूयश्च परिरक्ष्यते ॥ ११७ ॥
न मे मिथ्या समुद्योगं कर्तुमर्हसि माधव ।

'भगवन् ! बाणासुरको अभयदान दीजिये और मुझे जीवित पुत्रकी जननी बनाइये। मैंने इसे वर दे रखा है, इसीलिये पुनः मेरे द्वारा इसकी रक्षा की जा रही है। माधव ! आप मेरे उद्योगको मिथ्या न कीजिये' ॥ ११७ १/२ ॥

एवमुक्ते तु वचने देव्या परपुरंजयः ॥ ११८ ॥
कृष्णः प्रभाषते वाक्यं शृणु सत्यं तु भामिनि ।

देवीके ऐसी बात कहनेपर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीकृष्ण इस प्रकार बोले—'भामिनि ! तुम मेरी सच्ची बात सुनो ॥ ११८ १/२ ॥

बाणो बाहुसहस्रेण नर्दते दर्पमाश्रितः ॥ ११९ ॥
एतेषां छेदनं त्वद्य कर्तव्यं नात्र संशयः ।
द्विबाहुना च बाणेन जीवपुत्री भविष्यसि ॥ १२० ॥
आसुरं दर्पमाश्रित्य न च मां संश्रयिष्यति ।

'बाणासुर अपनी सहस्र भुजाओंके कारण घमंडमें भरकर गर्जता रहता है, अतः आज इन भुजाओंका छेदन करना कर्तव्य है, इसमे संशय नहीं है। देवि ! तुम दो बाँहवाले बाणासुरके द्वारा ही जीवित पुत्रवाली बनोगी। यह बाणासुर आसुर अभिमानका आश्रय लेनेके कारण कभी मेरी शरणमे नहीं आयेगा' ॥ ११९-१२० १/२ ॥

एवमुक्ते तु वचने कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ॥ १२१ ॥
प्रोवाच देवी बाणोऽयं देवदत्तो भवेदिति ।

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णके इस तरह कहनेपर देवी बोली—'प्रभो ! यह बाणासुर महादेवजीका दिया हुआ मेरा दत्तक पुत्र हो' ॥ १२१ १/२ ॥

अथ तां कार्तिकेयस्य मातरं सोऽभिभाष्य वै ।
ततः क्रुद्धो महाबाहुः कृष्णः प्रवदतां वरः ॥ १२२ ॥
प्रोवाच बाणं समरे वदतां प्रवरः प्रभुः ।

कार्तिकेयकी मातासे इस प्रकार बातचीत करके वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण समराङ्गणमें कुपित हो बाणासुरसे यों बोले— ॥ १२२ १/२ ॥

युध्यतां युध्यतां संख्ये भवतां कोटवी स्थिता ॥ १२३ ॥
अशक्तानामिव रणे धिग् बाण तव पौरुषम् ।

'बाण ! संग्रामभूमिमें युद्ध करो। युद्ध करो !! असमर्थ पुरुषोंकी भाँति तुम्हारी रक्षाके लिये माता कोटवी इस रणक्षेत्रमें खड़ी है, तुम्हारे पुरुषार्थको धिक्कार है' ॥ १२३ १/२ ॥

एवमुक्त्वा ततः कृष्णस्तच्चक्रं परमात्मवान् ॥ १२४ ॥
निमीलिताक्षो व्यसृजद् बाणं प्रति महाबलः ।

ऐसा कहकर अपने मनको वशमें रखनेवाले महाबली श्रीकृष्णने बाणासुरपर वह उत्तम चक्र छोड़ दिया; उस समय (नग्न खड़ी हुई देवीपर दृष्टि न पड़े, इसके लिये) उन्होंने अपने दोनों नेत्र बंद कर लिये थे ॥ १२४ १/२ ॥

क्षेपणाद्यस्य मुह्यन्ति लोकाः सस्थाणुजङ्गमाः ॥ १२५ ॥
क्रव्यादानि च भूतानि तृप्तिं यान्ति महामृधे ।
तमप्रतिमकर्माणं समानं सूर्यवर्चसा ॥ १२६ ॥
चक्रमुद्यम्य समरे कोपदीप्तो गदाधरः ।
स मुष्णन् दानवं तेजः समरे स्वेन तेजसा ॥ १२७ ॥
चिच्छेद बाहूंचक्रेण श्रीधरः परमौजसा ।

महासमरमें जिसके प्रयोगसे चराचर प्राणियोंसहित समस्त लोक मोहित हो जाते हैं और मांसभक्षी प्राणियोंको तृप्ति प्राप्त होती है, उस अनुपम कर्म करनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी चक्रको उठाकर क्रोधसे बढ़े हुए तेजवाले गदाधारी भगवान् श्रीधरने समराङ्गणमें अपने उत्कृष्ट तेज और बलसे दानव बाणासुरके तेजका अपहरण करते हुए उसकी भुजाओंको चक्रसे काट डाला ॥ १२५-१२७ १/२ ॥

अलातचक्रवत् तूर्णं भ्राम्यमाणं रणाजिरे ॥ १२८ ॥
क्षिप्तं तु वासुदेवेन बाणस्य रणमूर्धनि ।
विष्णुचक्रं भ्रमत्यशु शैघ्याद् रूपं न दृश्यते ॥ १२९ ॥

रणक्षेत्रमें युद्धके मुहानेपर बाणासुरको लक्ष्य करके भगवान् वासुदेवके द्वारा चलाया गया वह चक्र वहाँ तुरंत ही अलातचक्रके समान घूमने लगा । वह इतनी शीघ्रतासे घूम रहा था कि उसका रूप दिखायी नहीं देता था ॥ १२८-१२९ ॥

तस्य बाहुसहस्रस्य पर्यायेण पुनः पुनः ।
बाणस्य च्छेदनं चक्रे तच्चक्रं रणमूर्धनि ॥ १३० ॥

संग्रामके शिरोभागमें उस चक्रने बारी वारीसे बाणासुरकी सहस्र भुजाओंको काटना आरम्भ किया ॥ १३० ॥

कृत्वा द्विबाहुं तं बाणं छिन्नशाखमिव द्रुमम् ।
पुनः कराग्रे कृष्णस्य चक्रं प्राप्तं सुदर्शनम् ॥ १३१ ॥

कटी हुई शाखावाले वृक्षकी भाँति बाणासुरको दो ही बाँहोंसे युक्त बनाकर वह सुदर्शन चक्र पुनः श्रीकृष्णके कराग्रभागमें आ पहुँचा ॥ १३१ ॥

वैशम्पायन उवाच

कृतकृत्ये तु सम्प्राप्ते चक्रे दैत्यनिपातने ।
स्रवता तेन कायेन शोणितौघपरिप्लुतः ॥ १३२ ॥
अभवत् पर्वताकारश्छिन्नबाहुर्महासुरः ।
असृङ् मत्तश्च विविधान् नादान् मुञ्चन् घनो यथा ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! दैत्योंको मार गिरानेवाला वह चक्र जब अपना काम पूरा करके श्रीकृष्णके हाथमे आ गया, तब बाणासुरके उस शरीरसे रक्तकी धारा

७३४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

बहने लगी, कटी हुई बाँहवाला वह महान् असुर खूनसे लथपथ होकर पर्वताकार हो गया और रक्तसे मतवाला हो मेघके समान नाना प्रकारसे गर्जना करने लगा ॥ १३२-१३३ ॥

तस्य नादेन महता केशवो रिपुसूदनः ।
चक्रं भूयः क्षेप्तुकामो बाणनाशार्थमुद्यतः ।
तमुपेत्य महादेवः कुमारसहितोऽब्रवीत् ॥ १३४॥

उसके उस महान् सिंहनादसे कुपित हुए शत्रुसूदन केशव बाणासुरका विनाश कर डालनेके लिये उद्यत हो गये। वे पुनः अपना चक्र छोड़ना ही चाहते थे कि कुमार कार्तिकेयसहित महादेवजी उनके पास आ गये और इस प्रकार बोले ॥ १३४ ॥

ईश्वर उवाच
कृष्ण कृष्ण महाबाहो जाने त्वां पुरुषोत्तमम् ।
मधुकैटभहन्तारं देवदेवं सनातनम् ॥ १३५॥

महादेवजी बोले—कृष्ण ! कृष्ण !! महाबाहो ! मैं आपको जानता हूँ, आप मधु और कैटभका वध करनेवाले सनातन देवाधिदेव पुरुषोत्तम श्रीहरि हैं ॥ १३५ ॥

लोकानां त्वं गतिर्देव त्वत्प्रसूतमिदं जगत् ।
अजेयस्त्वं त्रिभिर्लोकैः ससुरासुरपन्नगैः ॥ १३६॥

देव ! आप सम्पूर्ण लोकोंकी गति हैं; आपसे ही इस जगत्‌की उत्पत्ति हुई है; देवता, असुर तथा नागोंसहित तीनों लोकोंके लिये आप अजेय हैं ॥ १३६ ॥

तस्मात्संहर दिव्यं त्वमिदं चक्रं समुद्यतम् ।
अनिवार्यमसंहार्यं रणे शत्रुभयंकरम् ॥ १३७॥

अतः आप ऊपर उठे हुए अपने इस दिव्य चक्रको पुनः समेट लीजिये । रणभूमिमें इसका निवारण अथवा संहार करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, यह शत्रुओंके लिये अत्यन्त भयंकर है ॥ १३७ ॥

बाणस्यास्याभयं दत्तं मया केशिनिषूदन ।
तन्मे न स्याद् वृथा वाक्यमतस्त्वां क्षामयाम्यहम्॥१३८॥

केशिनिषूदन ! मैंने इस बाणासुरको अभयदान दे रखा है; मेरा वह वचन व्यर्थ न हो जाय इसके लिये मैं आपसे क्षमा करनेकी प्रार्थना करता हूँ ॥ १३८ ॥

श्रीकृष्ण उवाच
जीवतां देव बाणोऽयमेतच्चक्रं निवर्तितम् ।
मान्यस्त्वं देवदेवानामसुरणां च सर्वशः ॥ १३९॥

श्रीकृष्ण बोले—देव ! यह चक्र मैंने लौटा लिया, अब यह बाणासुर चिरजीवी हो; आप देवताओंके भी देवता तथा सम्पूर्ण असुरोंके लिये माननीय हैं ॥ १३९ ॥

नमस्तेऽस्तु गमिष्यामि यत्कार्यं तन्महेश्वर ।
न तावत् क्रियते तस्मान्मामन्नुज्ञातुमर्हसि ॥ १४०॥

महेश्वर ! आपको नमस्कार है। अब मैं लौट जाऊँगा; बाणासुरका वधरूपी जो कार्य मुझे करना था, वह आपके अनुरोधसे अब मेरे द्वारा नहीं किया जा रहा है; इसलिये आप मुझे लौटनेकी आज्ञा प्रदान करें ॥ १४० ॥

एवमुक्त्वा महादेवं कृष्णस्तूर्णं महामनाः ।
जगाम तत्र यत्रास्ते प्रद्युम्निः सायकैश्चितः ॥ १४१॥

महादेवजीसे ऐसा कहकर महामनस्वी भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत उस स्थानपर गये, जहाँ प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध सायकोंसे बँधे हुए थे ॥ १४१ ॥

गते कृष्णे ततो नन्दी बाणमाह वचः शुभम् ।
गच्छ बाण प्रसन्नस्य देवदेवस्य चाग्रतः ॥ १४२॥

श्रीकृष्णके चले जानेपर नन्दीने बाणासुरसे यह मङ्गलमय बात कही—'बाण ! तुम प्रसन्न हुए देवाधिदेव महादेवजीके सामने चलो' ॥ १४२ ॥

तच्छ्रुत्वा नन्दिवाक्यं तु बाणोऽगच्छत शीघ्रगः ।
छिन्नबाहुं ततो बाणं दृष्ट्वा नन्दी प्रतापवान् ॥ १४३॥
अपवाह्य रथेनैनं यतो देवस्ततो ययौ ।

नन्दीका यह वचन सुनकर बाणासुर शीघ्रतापूर्वक चल पड़ा। उसकी भुजाएँ कटी हुई देख प्रतापी नन्दी उसे रथपर बिठाकर जहाँ महादेवजी थे, वहाँ ले गये ॥ १४३॥

ततो नन्दी पुनर्वाणं प्रागुवाचोत्तरं वचः ॥ १४४॥
बाण बाण प्रनृत्यस्व श्रेयस्तव भविष्यति ।
एष देवो महादेवः प्रसादसुमुखस्तव ॥ १४५॥

तत्पश्चात् नन्दीने पुनः बाणासुरसे पहले ही यह उत्कृष्ट बात कही—'बाण ! बाण !! तुम भगवान् शङ्करके सामने नृत्य करो, इससे तुम्हारा कल्याण होगा; यह भगवान् महादेवजी तुम्हारे ऊपर कृपा करनेके लिये प्रसन्न मुख हो रहे हैं' ॥ १४४-१४५ ॥

शोणितौघप्लुतैर्गात्रैर्नन्दिवाक्यप्रचोदितः ।
जीवितार्थी ततो बाणः प्रमुखे शंकरस्य वै ॥ १४६॥
अनृत्यद् भयसंविग्नो दानवः स विचेतनः ।

नन्दीके वाक्यसे प्रेरित हो जीवनकी इच्छा रखनेवाला बाणासुर भयसे व्याकुल और अचेत होकर रक्तसे लथपथ हुए शरीरसे भगवान् शङ्करके सम्मुख नृत्य करने लगा ॥ १४६॥

तं दृष्ट्वा च प्रनृत्यन्तं भयोद्विग्नं पुनः पुनः ॥ १४७॥
नन्दिवाक्यप्रजवितं भक्तानुग्रहकृद् भवः ।
करुणावशमापन्नो महादेवोऽब्रवीद् वचः ॥ १४८॥

नन्दीके कहनेसे भयके कारण उद्विग्न होकर वेगपूर्वक

विष्णुपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७३५


बारंबार नृत्य करते हुए उस दानवकी ओर देखकर भक्त-वत्सल भगवान् शिव करुणाके वशीभूत हो इस प्रकार बोले ॥ १४७-१४८ ॥

ईश्वर उवाच

वरं वृणीष्व बाण त्वं मनसा यदभीप्ससि।
प्रसादसुमुखस्तेऽहं प्रियोऽसि मम दानव ॥ १४९॥

श्रीमहादेवजीने कहा— बाण ! तुम अपने मनसे जो चाहते हो, वह वर मुझसे माँगो। मैं तुमपर कृपा करनेके लिये प्रसन्न हुआ हूँ। दानव ! तुम मेरे प्रिय हो ॥ १४९ ॥

बाण उवाच

अजश्चामरश्चैव भवेयं सततं विभो।
एष मे प्रथमो देव वरोऽस्तु यदि मन्यसे ॥ १५०॥

बाणासुर बोला— सर्वव्यापी देव ! मैं सदा अजर और अमर रहूँ, यदि आप स्वीकार करें तो मेरे लिये यही प्रथम वर हो ॥ १५० ॥

देव उवाच

तुल्योऽसि दैवतैर्बाण न मृत्युस्तव विद्यते ।
अथापरं वृणीष्वाद्य अनुग्राह्योऽसि मे सदा ॥ १५१॥

श्रीमहादेवजीने कहा— बाणासुर ! तुम देवताओंके तुल्य हो, तुम्हारे लिये मृत्यु नहीं है। अब कोई दूसरा वर माँगो; क्योंकि तुम सदा मेरे कृपापात्र हो ॥ १५१ ॥

बाण उवाच

यथाहं शोणितैर्दिग्धो भृशार्तो व्रणपीडितः।
भक्तानां नृत्यतां देव पुत्रजन्म भवेद्भव ॥ १५२॥

बाणासुर बोला— भगवन् ! मैं अत्यन्त आर्त, घावसे पीड़ित और खूनसे लथपथ हूँ। तथापि जिस प्रकार नृत्य कर रहा हूँ, इस तरह नृत्य करनेवाले भक्तोंके यहाँ पुत्रजन्म-का उत्सव हो ॥ १५२ ॥

श्रीहर उवाच

निराहाराः क्षमावन्तः सत्यार्जवसमाहिताः।
मद्भक्ता येऽपि नृत्यन्ति तेषामेवं भविष्यति ॥ १५३॥

श्रीमहादेवजीने कहा— जो मेरे भक्तजन निराहार, क्षमाशील तथा सत्य और सरलतासे संयुक्त रहकर एकाग्र-चित्त हो मेरी प्रसन्नताके लिये नृत्य करेंगे, उन्हें ऐसा ही फल प्राप्त होगा ॥ १५३ ॥

तृतीयं त्वमथो बाण वरं वर मनोगतम्।
तद् विधास्यामि ते पुत्र सफलोऽस्तु भवानिह ॥ १५४॥

'बेटा बाणासुर ! अब तुम कोई तीसरा मनोवाञ्छित वर माँगो, मैं उसे पूर्ण करूँगा; मेरी कृपासे तुम यहाँ सफलमनोरथ होओ ॥ १५४ ॥


बाण उवाच

चक्रताडनजा घोरा रुजा तीव्रा हि मेऽनघ।
वरेणासौ तृतीयेन शान्तिं गच्छतु मे भव ॥ १५५॥

बाणासुर बोला— निष्पाप महादेव ! चक्रके आघातसे मुझे बड़ी भयंकर एवं तीव्र वेदना हो रही है, आपके दिये हुए तीसरे वरसे मेरी वह पीड़ा शान्त हो जाय ॥ १५५ ॥

श्रीरुद्र उवाच

एवं भवतु भद्रं ते न रुजा प्रभविष्यति।
अक्षतं तव गात्रं तु स्वस्थावस्थं भविष्यति ॥ १५६॥

श्रीमहादेवजी बोले— वत्स ! ऐसा ही हो। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम्हें पीड़ा नहीं होगी। तुम्हारा शरीर घाव-से रहित और स्वस्थ हो जायगा ॥ १५६ ॥

चतुर्थं ते वरं दद्मि वृणीष्व यदि काङ्क्षसि।
न तेऽहं विमुखस्तात प्रसादसुमुखो ह्यहम् ॥ १५७॥

तात ! अब मैं तुम्हें चौथा वर देता हूँ; यदि चाहो तो माँग लो। मैं तुमसे विमुख नहीं हूँ। तुमपर कृपा करनेके लिये सदा ही प्रसन्नमुख हूँ ॥ १५७ ॥

बाण उवाच

प्रमथगणवंशस्य प्रथमः स्यामहं विभो।
महाकाल इति ख्यातिं गच्छेयं शाश्वतीः समाः ॥ १५८॥

बाणासुर बोला— प्रभो ! मैं आपके प्रमथगणोंके समुदायका प्रमुख व्यक्ति होऊँ और महाकालके नामसे मेरी नित्य निरन्तर ख्याति बनी रहे ॥ १५८ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं भविष्यतीत्याह बाणं देवो महेश्वरः।
दिव्यरूपोऽक्षतो गात्रैर्नीरोगस्तु ममाश्रयात् ॥ १५९॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन् ! तब महेश्वरदेवने बाणासुर-से कहा—'बाण ! ऐसा ही होगा, तुम मेरा आश्रय ग्रहण करनेके कारण शरीरसे अक्षत और नीरोग रहोगे। तुम्हारा रूप दिव्य हो जायगा ॥ १५९ ॥

ममातिसर्गाद् बाण त्वं भव चैवाकुतोभयः।
भूयस्ते पञ्चमं दद्मि प्रख्यातबलपौरुष।
पुनर्वरय भद्रं ते यत् ते मनसि वर्तते ॥ १६०॥

'विख्यात बल और पौरुषसे युक्त बाणासुर ! तुम मेरे दिये हुए वरके प्रभावसे निर्भय हो जाओ; तुम्हे कहींसे कोई भय न रहे। अब मैं तुम्हे पुनः पाँचवाँ वर देता हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारे मनमें जैसी इच्छा हो, उसके अनुसार फिर कोई वर माँगो' ॥ १६०॥

७३६श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

बाण उवाच
वैरूप्यमङ्गजं यन्मे मा भूद् देव कदाचन ।
द्विबाहुरपि मे देहो न विरूपो भवेद् भव ॥१६१॥
बाणासुर बोला—देव ! शङ्कर ! मेरे शरीरमें कभी कुरूपता न रहे; दो बाँहोंसे युक्त होनेपर भी मेरी देह कुरूप न प्रतीत हो ॥ १६१ ॥

श्रीहर उवाच
भविता सर्वमेतत् ते यथेच्छसि महासुर ।
भवत्येवं न चादेयं भक्तानां विद्यते मम ॥१६२॥
श्रीमहादेवजी बोले—महासुर ! तुम जैसा चाहते हो, यह सब तुम्हारे लिये सुलभ होगा । मेरे पास भक्तोंके लिये कुछ भी अदेय नहीं है ॥ १६२ ॥

वैशम्पायन उवाच
ततोऽब्रवीन्महादेवो बाणं स्थितमथान्तिके ।
एवं भविष्यते सर्वं यत् त्वया समुदाहृतम् ॥१६३॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब महादेवजीने अपने पास खड़े हुए बाणासुरसे कहा—‘वत्स ! तुमने जो कुछ कहा या माँगा है, वह सब इसी रूपमें पूर्ण होगा’ ॥ १६३ ॥

एतावदुक्त्वा भगवांस्त्रिनेत्रो गणसंवृतः ।
पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवान्तरधीयत ॥१६४॥
ऐसा कहकर अपने गणोंसे घिरे हुए त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव समस्त प्राणियोंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १६४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उपाहरणे बाणासुरवरप्रदाने षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१२६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उपाहरणके प्रसंगमें बाणासुरको भगवान् शिवका वरदानविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥


सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

अनिरुद्धका नागपाशसे छुटकारा और उनके द्वारा श्रीकृष्ण आदिकी वन्दना, नारदजीके कहनेसे उनका वीर्य-विवाह, उषाकी विदाई, सबका द्वारकाको प्रस्थान, मार्गमें श्रीकृष्णद्वारा वरुण देवतापर विजय, वरुणद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और पूजा, श्रीकृष्णके आगमनसे द्वारकावासियोंका हर्ष, भगवान्‌के आदेशसे पुरवासियोंद्वारा देवताओंकी वन्दना, इन्द्रद्वारा श्रीकृष्णकी प्रशंसा और सब देवताओं तथा ऋषियों आदिका अपने-अपने स्थानको जाना

वैशम्पायन उवाच
एवं वरान् बहून् प्राप्य बाणः प्रीतमनाऽभवत् ।
जगाम सह रुद्रेण महाकालत्वमागतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार बहुत-से वर पाकर बाणासुरका मन प्रसन्न हो गया । वह महाकालत्वको प्राप्त होकर भगवान् शिवके साथ चला गया ॥ १ ॥

वासुदेवोऽपि बहुधा नारदं पर्यपृच्छत ।
क्वानिरुद्धोऽस्ति भगवन् संयतो नागबन्धनैः ॥ २ ॥
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन स्नेहक्लिन्नं हि मे मनः ।
अनिरुद्धे हृते वीरे क्षुभिता द्वारका पुरी ॥ ३ ॥
इधर भगवान् श्रीकृष्णने नारदजीसे बारंबार पूछा—‘भगवन् ! अनिरुद्ध कहाँ नागपाशमें बँधे हुए हैं, मैं इसे ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ । मेरा हृदय स्नेहसे आकुल हो रहा है। वीर अनिरुद्धका अपहरण होनेसे सारी द्वारकापुरी क्षुब्ध हो उठी है ॥ २-३ ॥

शीघ्रं तं मोक्षयिष्यामो यदर्थं वयमागताः ।
अद्य तं नष्टशत्रुं वै द्रष्टुमिच्छामहे वयम् ॥ ४ ॥
स प्रदेशस्तु भगवन् विदितस्तव सुव्रत ।
‘अतः हमलोग शीघ्र उन्हें बन्धनसे छुड़ायेंगे, जिसके लिये कि हमारा यहाँ आगमन हुआ है। अनिरुद्धका शत्रु नष्ट हो गया, अब हम उन्हें देखना और उनसे मिलना चाहते हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले भगवान् नारद ! जहाँ अनिरुद्ध हैं, वह स्थान आपको विदित है’ ॥ ४½ ॥

एवमुक्तस्तु कृष्णेन नारदः प्रत्यभाषत ॥ ५ ॥
कन्यापुरे कुमारोऽसौ बद्धो नागैश्च माधव ।
श्रीकृष्णके इस प्रकार पूछनेपर नारदजीने उत्तर दिया—‘माधव ! कुमार अनिरुद्ध कन्याके अन्तःपुरमें नागपाशसे बँधे हुए हैं’ ॥ ५½ ॥

एतस्मिन्नन्तरे शीघ्रं चित्रलेखा ह्युपस्थिता ॥ ६ ॥
बाणस्योत्तमशर्वस्य दैत्येन्द्रस्य महात्मनः ।
इदमन्तःपुरं देव प्रविशस्व यथासुखम् ॥ ७ ॥

विष्णुपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७३७


इसी बीचमें चित्रलेखा शीघ्रतापूर्वक वहाँ उपस्थित हुई और बोली—'देव ! जिसने भगवान् शङ्करको ही सर्वोपरि मानकर उनकी आराधना की है, उस दैत्यराज महात्मा बाणासुरका अन्तःपुर यही है। आप इसमें सुखपूर्वक प्रवेश कीजिये' ॥ ६-७ ॥

ततः प्रविष्टास्ते सर्वे ह्यनिरुद्धस्य मोक्षणे ।
बलः सुपर्णः कृष्णस्तु प्रद्युम्नो नारदस्तथा ॥ ८ ॥

तब बलराम, गरुड, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न और नारद —ये सब लोग अनिरुद्धको बन्धनसे मुक्त करनेके लिये बाणासुरके अन्तःपुरमें प्रविष्ट हुए ॥ ८ ॥

ततो दृष्ट्वैव गरुडं येऽनिरुद्धशरीरगाः ।
शररूपा महासर्पा वेष्टयित्वा तनुं स्थिताः ॥ ९ ॥
ते सर्वे सहसा देहात् तस्य निःसृत्य भोगिनः ।
क्षितिं समभवंस्तित्वा प्रकृत्यावस्थिताः शराः ॥ १० ॥

फिर तो गरुडको देखते ही अनिरुद्धके शरीरमें जो बाण-रूपी महासर्प उनके सारे अङ्गोंको आवेष्टित करके स्थित थे, वे सब सहसा उनकी देहसे निकलकर पृथ्वीपर गिर पड़े और साधारण बाणोंके रूपमें परिणत हो गये ॥ ९-१० ॥

दृष्टः स्पृष्टश्च कृष्णेन सोऽनिरुद्धो महायशाः ।
स्थितः प्रीतमना भूत्वा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ११ ॥

श्रीकृष्णका दर्शन और स्पर्श पाकर महायशस्वी अनिरुद्ध मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और खड़े हो हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले ॥ ११ ॥

अनिरुद्ध उवाच
देवदेव सदा युद्धे जेता त्वमसि केशव ।
न शक्तः प्रमुखे स्थातुं साक्षादपि शतक्रतुः ॥ १२ ॥

अनिरुद्धने कहा—देवाधिदेव केशव ! आप सदा ही युद्धमें विजयी हैं। प्रभो ! आपके सामने साक्षात् इन्द्र भी ठहर नहीं सकते ॥ १२ ॥

ततो महाबलं देवं बलभद्रं यशस्विनम् ।
अभिवादयते हृष्टः सोऽनिरुद्धो महामनाः ॥ १३ ॥

तदनन्तर महामनस्वी अनिरुद्धने बड़े हर्षके साथ महान् बलशाली यशस्वी बलभद्रदेवको प्रणाम किया ॥ १३ ॥

माधवं च महात्मानमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
खगोत्तमं महावीर्यं सुपर्णमभिवाद्य च ॥ १४ ॥
ततो मकरकेतुं च विचित्रबाणधरं प्रभुम् ।
पितरं सोऽभ्युपागम्य प्रद्युम्नमभिवादयत् ॥ १५ ॥

फिर हाथ जोड़कर महात्मा माधव तथा महापराक्रमी पक्षिप्रवर गरुड़का पृथक्-पृथक् अभिवादन करके उन्होंने अपने पिता विचित्र बाणधारी सर्वसमर्थ मकरध्वज प्रद्युम्नके पास जाकर उन्हे भी प्रणाम किया ॥ १४-१५ ॥

सखीगणवृता चैव सा चोषा भवने स्थिता ।
बलं चातिबलं चैव वासुदेवं सुदुर्जयम् ॥ १६ ॥
असंख्यातगतिं चैव सुपर्णमभिवाद्य च ।
पुष्पबाणधरं चैव लजमानाभ्यवादयत् ॥ १७ ॥

तत्पश्चात् उस भवनमें रहनेवाली सखियोंसहित उषाने आकर अत्यन्त बलशाली बलराम, परम दुर्जय वासुदेव और अप्रमेय गतिशील गरुड़को प्रणाम करके पुष्पबाणधारी प्रद्युम्नको भी लज्जापूर्वक नमस्कार किया ॥ १६-१७ ॥

ततः शक्रस्य वचनान्नारदः परमद्युतिः ।
वासुदेवसमीपं स प्रहसन् पुनरागतः ॥ १८ ॥

तब इन्द्रके कहनेसे परमतेजस्वी नारदजी पुनः भगवान् श्रीकृष्णके समीप हँसते हुए आये ॥ १८ ॥

वर्द्धापयति तं देवं गोविन्दं शत्रुसूदनम् ।
दिष्ट्या वर्द्धसि गोविन्द अनिरुद्धसमागमात् ॥ १९ ॥

वे शत्रुसूदन गोविन्ददेवको बधाई देते हुए बोले—'गोविन्द ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज आप अनिरुद्ध-से मिलकर अभ्युदयको प्राप्त हुए हैं' ॥ १९ ॥

ततोऽनिरुद्धसहिता नारदं प्रणताः स्थिताः ।
आशीर्भिर्वर्द्धयित्वा च देवर्षिः कृष्णमब्रवीत् ॥ २० ॥

तब अनिरुद्धसहित वे सब लोग नारदजीके चरणोंमें प्रणाम करके खड़े हो गये; तब देवर्षिने आशीर्वादसे उन सबके अभ्युदयकी कामना करके श्रीकृष्णसे कहा—॥ २० ॥

अनिरुद्धस्य वीर्याख्यो विवाहः क्रियतां विभो ।
जम्बूलमालिकां द्रष्टुं श्रद्धा हि मम जायते ॥ २१ ॥

'प्रभो ! आप यहाँ अनिरुद्धका 'वीर्य'¹ नामक विवाह कीजिये; मुझे जम्बूलमालिका देखने और सुननेके लिये बड़ी श्रद्धा (इच्छा) हो रही है'² ॥ २१ ॥

ततः प्रहसिताः सर्वे नारदस्य वचःश्रवात् ।
कृष्णःप्रोवाच भगवन् क्रियतामाशु मा चिरम् ॥ २२ ॥

नारदजीकी यह बात सुनकर सब लोग हँस पड़े। फिर श्रीकृष्णने कहा—'भगवन् ! शीघ्र ही अनिरुद्ध और उषाका विवाह कीजिये; विलम्ब न हो' ॥ २२ ॥

एतस्मिन्नन्तरे तात कुम्भाण्डः समुपस्थितः ।
वैवाहिकांस्तु सम्भारान् गृह्य कृष्णं नमस्य तु ॥ २३ ॥


१. बल-पराक्रमद्वारा जीती गयी कन्याका विवाह 'वीर्यविवाह' कहलाता है।
२. वर-वधूके विवाहके समय कन्या-पक्षकी स्त्रियोंद्वारा वरपक्षकी स्त्रियोंको जो प्रेमपूर्ण परिहासके रूपमें गाली दी जाती है, उसका नाम जम्बूल है। उसकी परम्पराको जम्बूलमालिका कहा गया है। (नीलकण्ठ)

७३८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे तात ! इसी बीचमें वैवाहिक सामग्रीका संग्रह करके मन्त्री कुम्भाण्ड उपस्थित हुए और श्रीकृष्णको नमस्कार करके बोले ॥ २३ ॥ कुम्भाण्ड उवाच कृष्ण कृष्ण महाबाहो भव त्वमभयप्रदः । शरणागतोऽस्मि देवेश प्रसीदोपैषोऽञ्जलिस्तव ॥ २४ ॥ कुम्भाण्डने कहा—कृष्ण ! कृष्ण ! महाबाहो ! आप मुझे अभय प्रदान करें। देवेश्वर ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, प्रसन्न होइये ! आपके सामने ये मेरे दोनों हाथ जुड़े हुए हैं ॥ २४ ॥ नारदस्य वचः श्रुत्वा सर्वं प्रागेव चाच्युतः । अभयं यच्छते तस्मै कुम्भाण्डाय महात्मने ॥ २५ ॥ कुम्भाण्ड मन्त्रिणां श्रेष्ठ प्रीतोऽस्मि तव सुव्रत । सुकृतं ते विजानामि राष्ट्रिकोऽस्तु भवानिह ॥ २६ ॥ साक्षात्पक्षः सुसुखी निर्वृत्तोऽस्तु भवानिह । राज्यं च ते मया दत्तं चिरं जीव ममाश्रयात् ॥ २७ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण नारदजीसे कुम्भाण्डके विषयमें सब कुछ सुन चुके थे; उनकी उस बातका स्मरण करके वे महात्मा कुम्भाण्डको अभय देते हुए बोले—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मन्त्रिप्रवर कुम्भाण्ड ! तुमने जो सत्कर्म किया है, उसे मैं जानता हूँ। अब तुम्हीं यहाँके राष्ट्रपति बनो और अपने बन्धु-बान्धवोंसहित यहाँ परम सुखी तथा सन्तुष्ट रहो। मैंने तुम्हें यह राज्य अर्पित कर दिया, अब तुम मेरा आश्रय लेकर चिरजीवी बने रहो'॥ २५-२७ ॥ एवं दत्त्वा राज्यमस्मै कुम्भाण्डाय महात्मने । विवाहमकरोत् तस्यानिरुद्धस्य जनार्दनः । ततस्तु भगवान् वह्निस्तत्र स्वयमुपस्थितः ॥ २८ ॥ इस प्रकार महात्मा कुम्भाण्डको राज्य देकर श्रीकृष्णने वहाँ अनिरुद्धका विवाहसंस्कार सम्पन्न किया। उस समय भगवान् अग्निदेव वहाँ स्वयं उपस्थित हुए थे ॥ २८॥ स विवाहोऽनिरुद्धस्य नक्षत्रे च शुभेऽभवत् । ततोऽप्सरोगणश्चैव कौतुकं कर्तुमुद्यतः ॥ २९ ॥ अनिरुद्धका वह विवाह शुभ नक्षत्रमें सम्पन्न हुआ। उसमें माङ्गलिक कृत्य करनेके लिये अप्सराएँ उपस्थित हुई थीं ॥ २९ ॥ स्नातस्त्वलंकृतस्तत्र सोऽनिरुद्धः स्वभार्यया । ततः स्निग्धैः शुभैर्वाक्यैर्गन्धर्वाश्च जगुस्तदा ॥ ३० ॥ नृत्यन्त्यप्सरसश्चैव विवाहमुपशोभयन् । वहाँ अपनी पत्नीके साथ अनिरुद्धने स्नान करके अलङ्कार धारण किया। तत्पश्चात् मङ्गलसूचक स्निग्ध वचनोंद्वारा गन्धर्वगण गान करने लगे और अप्सराएँ उस विवाहकी शोभा बढ़ाती हुई नाचने लगीं ॥ ३०३ ॥ ततो निर्वर्तयित्वा तु विवाहं शत्रुसूदनः ॥ ३१ ॥ अनिरुद्धस्य सुप्रज्ञः सर्वैर्देवगणैर्वृतः । आमन्त्र्य वरदं तत्र रुद्रं देवनमस्कृतम् ॥ ३२ ॥ चकार गमने बुद्धिं कृष्णः परपुरंजयः । तदनन्तर अनिरुद्धका विवाहसंस्कार सम्पन्न कराकर समस्त देवताओंसे घिरे हुए परम बुद्धिमान् शत्रुसूदन एवं परपुरंजय भगवान् श्रीकृष्णने देववन्दित वरदायक रुद्रदेवकी आज्ञा ले वहाँसे द्वारका जानेका विचार किया ॥ ३१-३२३ ॥ द्वारकाभिमुखं कृष्णं ज्ञात्वा शत्रुनिषूदनम् ॥ ३३ ॥ कुम्भाण्डो वचनं प्राह प्राञ्जलिर्मधुसूदनम् । शत्रुसूदन श्रीकृष्णको द्वारका जानेके लिये उद्यत जान कुम्भाण्डने हाथ जोड़कर उन मधुसूदनसे कहा—॥ ३३३ ॥ बाणस्य गावस्तिष्ठन्ति हस्ते तु वरुणस्य वै ॥ ३४ ॥ यासाममृतकल्पं वै क्षीरं क्षरति माधव । तत् पीत्वातिबलश्चैव नरो भवति दुर्जयः ॥ ३५ ॥ 'माधव ! बाणासुरकी गौएँ वरुणके हाथमें हैं। जिनके थनोंसे अमृतके समान गुणकारक दूध बहता रहता है। उस दूधको पीकर मनुष्य अत्यन्त बलशाली और दुर्जय हो जाता है' ॥ ३४-३५ ॥ कुम्भाण्डेनैवमाख्याते हरिः प्रीतमनास्तदा । गमनाय मतिं चक्रे गन्तव्यमिति निश्चयम् ॥ ३६ ॥ कुम्भाण्डके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीहरिको उस समय बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने जानेका विचार एवं दृढ़ निश्चय कर लिया ॥ ३६ ॥ ततस्तु भगवान् ब्रह्मा वर्धाप्य स तु केशवम् । जगाम ब्रह्मलोकं स वृतः संभवनालयैः ॥ ३७ ॥ तदनन्तर श्रीकृष्णको बधाई देकर ब्रह्मलोकवासियोंसे घिरे हुए, भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मलोकको चले गये ॥ ३७ ॥ इन्द्रो मरुद्गणयुतो द्वारकाभिमुखो ययौ । ततः कृष्णस्ततः सर्वे गच्छन्ति जयकाङ्क्षिणः ॥ ३८ ॥ मरुद्गणोंके साथ इन्द्र द्वारकापुरीकी ओर चल दिये। जिस ओर श्रीकृष्ण जा रहे थे, उधर ही वे सब लोग उनकी विजय चाहते हुए यात्रा करने लगे ॥ ३८ ॥ वाहनेन मयूरेण सखीभिः परिवारिता । द्वारकाभिमुखी ह्यषा देव्या प्रस्थापिता ययौ ॥ ३९ ॥ साक्षात् पार्वती देवीने उषाको विदा किया। सखियोंसे घिरी हुई उषा मयूर जुते हुए रथसे द्वारकाकी ओर चली ॥ ततो बलश्च कृष्णश्च प्रद्युम्नश्च महाबलः ।

विष्णुपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७३९


आरूढवन्तो गरुडमनिरुद्धश्च वीर्यवान् ॥ ४० ॥

तत्पश्चात् बलभद्र, श्रीकृष्ण, महाबली प्रद्युम्न और पराक्रमी अनिरुद्ध—ये चारों गरुड़पर आरूढ़ हुए ॥ ४० ॥

प्रस्थितश्च स तेजस्वी गरुडः पततां वरः।
उन्मूलयंस्तरुगणान् कम्पयंश्चापि मेदिनीम् ॥ ४१ ॥

पक्षियोंमें श्रेष्ठ तेजस्वी गरुड़ वृक्षगणोंको उखाड़ते और पृथ्वीको कम्पित करते हुए वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ ४१ ॥

आकुलाश्च दिशः सर्वा रेणुध्वस्तमिवाम्बरम् ।
गरुडे सम्प्रयातेऽभून्मन्दरश्मिर्दिवाकरः ॥ ४२ ॥

गरुड़के प्रस्थान करनेपर सम्पूर्ण दिशाएँ व्याकुल हो गयीं, आकाश धूलसे आच्छन्न-सा हो गया और सूर्यदेवकी किरणें मन्द पड़ गयीं ॥ ४२ ॥

ततस्ते दीर्घमध्वानं प्रययुः पुरुषर्षभाः।
आरुह्य गरुडं सर्वे जित्वा बाणं महौजसम् ॥ ४३ ॥

तत्पश्चात् वे सभी पुरुषप्रवर वीर अपने विशाल मार्गपर बढ़ने लगे। वे सब महाबली बाणासुरको परास्त करके गरुड़पर आरूढ़ हो द्वारकाकी ओर जा रहे थे ॥ ४३ ॥

ततोऽम्बरतलस्थास्ते वारुणीं दिशमास्थिताः।
अपश्यन्त महात्मानो गावो दिव्यपयःप्रदाः।
वेलावनविचारिण्यो नानावर्णाः सहस्रशः ॥ ४४ ॥

आकाशमें पहुँचकर वे सब लोग पश्चिम दिशाकी ओर बढ़ने लगे। उस समय उन महात्माओंने अनेक प्रकारके रूप-रंगवाली सहस्रों दिव्य गौओंको देखा, जो दिव्य दुग्ध प्रदान करनेवाली थीं। वे सब-की-सब समुद्रतटवर्ती वनमें विचर रही थीं ॥ ४४ ॥

अवध्याय तदा रूपं कुम्भाण्डवचनाश्रयात् ।
कृष्णः प्रहरतां श्रेष्ठस्तत्त्वतोऽर्थविशारदः ॥ ४५ ॥
निशाम्य बाणगावस्तु तासु चक्रे मनस्तदा ।
आस्थितो गरुडं प्राह स तु लोकादिरव्ययः ॥ ४६ ॥

कुम्भाण्डके वचनोंका स्मरण करके तत्काल उन गौओंके स्वरूपको पहचानकर प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ तथा तात्त्विक अर्थनीतिमें विशारद भगवान् श्रीकृष्णने बाणासुरकी उन गौओंको देखा और मन-ही-मन उन्हें ले लेनेका विचार किया। फिर सम्पूर्ण जगत्‌के आदिकारण वे अविनाशी प्रभु गरुड़पर बैठे-बैठे ही बोले ॥ ४५-४६ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

वैनतेय प्रयाहि त्वं यत्र बाणस्य गोधनम् ।
यासां पीत्वा किल क्षीरममृतत्वमवाप्नुयात् ॥ ४७ ॥

श्रीकृष्णने कहा—विनतानन्दन ! जहाँ बाणासुरकी गौएँ हैं, वहीं चलो। कहते हैं, उन गौओंका दूध पीकर मनुष्य अमरत्वको प्राप्त कर लेता है ॥ ४७ ॥

आह मां सत्यभामा च बाणगावो ममानय ।
यासां पीत्वा किल क्षीरं न जीर्यन्ति महासुराः ॥ ४८ ॥

सत्यभामाने मुझसे कहा था 'कि मेरे लिये बाणासुरकी गौएँ ले आइयेगा, जिनका दूध पीकर वे महान् असुर कभी बूढ़े नहीं होते हैं ॥ ४८ ॥

विजराश्च जरां त्यक्त्वा भवन्ति किल जन्तवः।
ता आनयस्व भद्रं ते यदि धर्मो न लुप्यते ॥ ४९ ॥
अथवा कार्यलोपो वै मैव तासु मनः कृथाः।
इति मामब्रवीत् सत्या ताश्चैता विदिता मम ॥ ५० ॥

'तथा बूढ़े प्राणी भी वृद्धावस्थाको त्यागकर अजर हो जाते हैं। नाथ ! आपका कल्याण हो, यदि धर्मका लोप न होता हो तो उन गौओंको ले आइयेगा अथवा यदि कार्यमें बाधा पड़ती हो तो उन गौओंकी ओर ध्यान न दीजियेगा' इस प्रकार सत्यभामाने मुझसे कहा था। वे बाणासुरकी गौएँ ये ही हैं, इन्हें मैंने पहचान लिया ॥ ४९-५० ॥

गरुड उवाच

दृश्यन्ते गाव एतास्ता दृष्ट्वा मां वरुणालयम् ।
विशन्ति सहसा सर्वाः कार्यमत्र विधीयताम् ॥ ५१ ॥

गरुड़ बोले—प्रभो ! ये ही तो वे गौएँ दिखायी दे रही हैं, परंतु मुझे देखकर सहसा सब-की-सब समुद्रमें समायी जा रही हैं; अतः यहाँ जो कार्य करना उचित हो, वह कीजिये ॥ ५१ ॥

इत्युक्त्वा चैव गरुडः पक्षवातेन सागरम् ।
सहसा क्षोभयित्वा च विवेश वरुणालयम् ॥ ५२ ॥

ऐसा कहकर गरुड़ने अपने पंखोंकी हवासे सहसा समुद्रको विक्षुब्ध करते हुए वरुणके निवासस्थानमें प्रवेश किया ॥ ५२ ॥

दृष्ट्वा जवेन गरुडं प्राप्तं वै वरुणालयम् ।
वारुणाश्च गणाः सर्वे विभ्रान्ताः प्राचलंस्तदा ॥ ५३ ॥

गरुड़को वेगपूर्वक वरुणालयमें आया हुआ देख वरुणके समस्त सैनिकगण तत्काल विभ्रान्त एवं विचलित हो उठे ॥ ५३ ॥

ततस्तु वारुणं सैन्यमभियातं सुदुर्जयम् ।
प्रमुखे वासुदेवस्य नानाप्रहरणोद्यतम् ।
तद् युद्धमभवद् घोरं वारुणैः पन्नगारिणा ॥ ५४ ॥

तत्पश्चात् वरुणकी अत्यन्त दुर्जय सेना नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो भगवान् श्रीकृष्णके सामने चढ़ आयी। उस समय वरुणके उन सैनिकोंके साथ गरुड़‌का बड़ा भयंकर युद्ध हुआ ॥ ५४ ॥

तेषामपततां संख्ये वारुणानां सहस्रशः।
भग्नं बलमनाधृष्यं केशवेन महात्मना ॥ ५५ ॥

७४०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

युद्धमें आक्रमण करनेवाले उन सहस्रों वरुणसैनिकोंकी उस अजेय सेनाको महात्मा केशवने मार भगाया ॥ ५५ ॥

ततस्ते प्रद्रुता यान्ति तमेव वरुणालयम् ।
षष्टिं रथसहस्राणि षष्टिं रथशतानि च ॥ ५६ ॥
वारुणानि च युद्धानि दीप्तशस्त्राणि संयुगे ।

तब वे भागे हुए सैनिक उस वरुणालयमें ही जा घुसे, इसके बाद वरुणके छाछठ हजार रथी सैनिक चमकीले अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो रणक्षेत्रमें आकर युद्ध करने लगे ॥

तद् बलं बलिभिः शूरैर्बलदेवजनार्दनैः ॥ ५७ ॥
प्रद्युम्नेनानिरुद्धेन गरुडेन च सर्वशः ।
शरौघैर्विविधैस्तीक्ष्णैर्वध्यमानं समन्ततः ॥ ५८ ॥

बलदेव, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और गरुड़—इन सभी बलवान् शूरवीरोंने नाना प्रकारके तीखे बाणसमूहोंद्वारा वरुणकी उस रथसेनाको सब ओरसे मार भगाया ॥ ५७-५८ ॥

ततो भग्नं बलं दृष्ट्वा कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ।
वरुणस्त्वथ संक्रुद्धो निर्ययौ यत्र केशवः ॥ ५९ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णके द्वारा अपनी सेनाको भगायी गयी देख वरुण देवता अत्यन्त कुपित हो उठे और घरसे निकलकर उस स्थानपर आये जहाँ श्रीकृष्ण विराजमान थे ॥ ५९ ॥

ऋषिभिर्देवगन्धर्वैस्तथैवाप्सरसां गणैः ।
संस्तूयमानो बहुधा वरुणः प्रत्यदृश्यत ॥ ६० ॥

उस समय बहुत-से ऋषि, देवता, गन्धर्व तथा अप्सराओं-के समुदाय अनेक प्रकारसे उनकी स्तुति कर रहे थे। इस रूपमें वरुणदेवका वहाँ दर्शन हुआ ॥ ६० ॥

छत्रेण ध्रियमाणेन पाण्डुरेण वपुष्मता ।
सलिलस्राविणा श्रेष्ठं चापमुद्यम्य धिष्ठितः ॥ ६१ ॥

उनके मस्तकपर सुन्दर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे जलकी बूँदें झर रही थीं। वे एक श्रेष्ठ धनुष हाथमें लेकर खड़े थे ॥ ६१ ॥

अपां पतिरतिक्रुद्धः पुत्रपौत्रबलान्वितः ।
आह्वयन्निव युद्धाय विस्फारितमहाधनुः ॥ ६२ ॥

जलके स्वामी वरुण अत्यन्त क्रोधमें भरकर अपने पुत्रों-पौत्रों तथा सैनिकोंके साथ आकर अपने विशाल धनुषको फैलाये हुए इस तरह खड़े थे, मानो युद्धके लिये ललकार रहे हों ॥ ६२ ॥

स तु प्राध्मापयच्छङ्खं वरुणः समधावत ।
हरिं हर इव क्रुद्धो बाणजालैः समावृणोत् ॥ ६३ ॥

वरुणने पहले तो शङ्ख बजाया, फिर क्रोधमें भरकर श्रीकृष्णपर उसी तरह धावा किया, जैसे रुद्रदेवने भगवान् विष्णुपर आक्रमण किया हो। उन्होंने कुपित हो अपने बाणोंके जालसे श्रीकृष्णको ढक दिया ॥ ६३ ॥

ततः प्रध्माय जलजं पाञ्चजन्यं जनार्दनः ।
बाणजालैर्दिशः सर्वास्ततश्चक्रे महाबलः ॥ ६४ ॥

तब महाबली जनार्दनने पाञ्चजन्य शङ्ख बजाकर अपने बाणसमूहोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया ॥ ६४ ॥

ततः शरौघैर्विमलैर्वरुणः पीडितो रणे ।
स्मयन्निव ततः कृष्णं वरुणः प्रत्ययुध्यत ॥ ६५ ॥

रणभूमिमें उन निर्मल बाणसमूहोंसे पीड़ित होनेपर भी मुसकराते हुए-से वरुण श्रीकृष्णके साथ युद्ध करने लगे ॥

ततोऽस्त्रं वैष्णवं घोरमभिमन्त्र्याहवे स्थितः ।
वासुदेवोऽब्रवीद् वाक्यं प्रमुखे तस्य धीमतः ॥ ६६ ॥

तब घोर वैष्णवास्त्रको अभिमन्त्रित करके युद्धस्थलमें बुद्धिमान् वरुणके सामने खड़े हुए भगवान् वासुदेव उनसे इस प्रकार बोले-॥ ६६ ॥

इदमस्त्रं महाघोरं वैष्णवं शत्रुसूदनम् ।
मयोद्यतं वधार्थं ते तिष्ठेदानीं स्थिरो भव ॥ ६७ ॥

'वरुणदेव ! मैंने तुम्हारे वधके लिये शत्रुओंका संहार करनेवाले इस महाघोर वैष्णवास्त्रको उठा रखा है, अब तुम स्थिरतापूर्वक खड़े रहो' ॥ ६७ ॥

ततोऽस्त्रं वरुणो देवो ह्यस्त्रं वैष्णवमुद्यतः ।
वारुणास्त्रेण संयोज्य विननाद महाबलः ॥ ६८ ॥

यह सुनकर महाबली वरुणदेव वैष्णवास्त्रका सामना करनेके लिये उद्यत हो उसे वारुणास्त्रसे संयुक्त करके जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ६८ ॥

तस्यास्त्रे वितता ह्यापो वरुणस्य विनिःस्रुताः ।
वैष्णवास्त्रस्य शमने वर्तते समितिंजयः ॥ ६९ ॥

वरुणके अस्त्रमें राशि-राशि जल व्याप्त था, जो तत्काल प्रकट होने लगा। युद्धविजयी वरुण उसीसे वैष्णवास्त्रको बुझा देनेके लिये उद्यत थे ॥ ६९ ॥

आपस्तु वारुणास्तत्र क्षिप्ताः क्षिप्ता ज्वलन्ति वै ।
दह्यन्ते वारुणास्तत्र ततोऽस्त्रे ज्वलिते पुनः ॥ ७० ॥
वैष्णवे तु महावीर्ये दिशो भीता विदुद्रुवुः ।

परंतु वारुणास्त्रके द्वारा फेंकी गयी जलधाराएँ जब-जब वैष्णवास्त्रपर पड़ती थीं, तब तब अग्निके समान प्रज्वलित हो उठती थीं और उनके द्वारा वहाँ वरुणके सैनिक ही दग्ध होने लगते थे। इस प्रकार महान् शक्तिशाली वैष्णवास्त्रके प्रज्वलित होनेपर वरुणके सैनिक पुनः भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगे ॥ ७० १/२ ॥

[ विष्णुपर्व ]सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः७४१

तद् बलं ज्वलितं दृष्ट्वा वरुणः कृष्णमब्रवीत् ॥ ७१ ॥
स्मर स्वप्रकृतिं पूर्वामव्यक्तां व्यक्तलक्षणाम् ।
तमो जहि महाभाग तमसा मुह्यसे कथम् ॥ ७२ ॥

अपनी उस सेनाको जलती हुई देख वरुणने श्रीकृष्णसे कहा—'महाभाग ! आप अपनी उस पूर्व प्रकृतिका स्मरण कीजिये, जो व्यक्ताव्यक्त स्वरूप है। तमोगुणका नाश कीजिये, आप स्वयं तमोगुणसे क्यों मोहित हो रहे हैं ? ॥ ७१-७२ ॥

सत्त्वस्थो नित्यमासीस्त्वं योगीश्वर महामते ।
पञ्चभूताश्रयान् दोषानहंकारं च वर्जय ॥ ७३ ॥

'योगीश्वर ! महामते ! आप सदा ही सत्त्वगुणमें स्थित रहे हैं, अतः पञ्चभूतोंके आश्रित रहनेवाले अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—इन पाँच दोषों तथा अहंकारको त्याग दीजिये ॥ ७३ ॥

या या ते वैष्णवी मूर्तिस्तस्या ज्येष्ठो ह्यहं तव ।
ज्येष्ठभावेन मान्यो तु किंमां त्वं दग्धुमिच्छसि ॥ ७४ ॥

'आपकी जो-जो वैष्णवी मूर्ति है, उससे मैं ज्येष्ठ हूँ।* ज्येष्ठ होनेके नाते आपके आदरका पात्र हूँ, तो भी आप क्यों मुझे दग्ध करना चाहते हैं ? ॥ ७४ ॥

नाग्निर्विक्रमते ह्यग्नौ त्यज कोपं युधां वर ।
त्वयि न प्रभविष्यामि जगतः प्रभवो ह्यसि ॥ ७५ ॥

'योद्धाओंमे श्रेष्ठ श्रीकृष्ण ! आग आगपर अपना पराक्रम प्रकट नहीं करती है, अतः क्रोधको त्याग दीजिये। आपपर मेरी प्रभुता नहीं चल सकेगी, क्योंकि आप जगत्‌के आदि कारण हैं ॥ ७५ ॥

पूर्वं हि या त्वया सृष्टा प्रकृतिर्विकृतात्मिका ।
धर्मिणी वीजभावेन पूर्वं धर्मे समाश्रिता ॥ ७६ ॥

'पूर्वकालमें आपने जिस प्रकृति (माया) की सृष्टि की थी, वह महत्तत्त्व आदि विकारोंके रूपमें परिणत होनेवाली है, इसलिये परिणामधर्मिणी है। वह आपसे पूर्वधर्म (जन्म-भाव)† का आश्रय लेकर अर्थात् आपसे ही उत्पन्न होकर जगत्‌के कारणरूपसे विद्यमान है ॥ ७६ ॥


* भगवान् विष्णुके जितने अवतार हैं, उन सबमें मत्स्यावतार प्रथम माना गया है। यह अवतार जलमें हुआ था और जलके अधिष्ठाता वरुणदेव इसके पहलेसे विद्यमान थे, अतः ये सभी अवतारोंसे ज्येष्ठ सिद्ध होते हैं। वामन-अवतारके समय भगवान् इन्द्र-वरुण आदि देवताओंके छोटे भाई बने, इसलिये भी वरुणकी ज्येष्ठता सिद्ध होती है।
† जन्म, सत्ता, परिणाम, वृद्धि, क्षय और नाश—ये छः भावविकार प्राकृत शरीरके धर्म हैं । इनमें पहला भाव या धर्म 'जन्म' है, इसलिये यहाँ 'पूर्वधर्म' का अर्थ 'जन्म' किया गया है। नीलकण्ठने ऐसा ही माना है।

आग्नेयं वैष्णवं सौम्यं प्रकृत्यैवेदमार्दितः ।
त्वया सृष्टं जगदिदं स कथं मयि वर्तसे ॥ ७७ ॥

'उक्त प्रकृतिके द्वारा आपने ही पहले इस आग्नेय, वैष्णव एवं सौम्य अस्त्रकी सृष्टि की है और आपसे ही इस सम्पूर्ण जगत्‌की रचना हुई है, वे जगत्स्रष्टा परमात्मा होकर आप मेरे प्रति कैसा बर्ताव करते हैं ॥ ७७ ॥

अजेयः शाश्वतो देवः स्वयम्भूभूतभावनः ।
अक्षरं च क्षरं चैव भावाभावौ महाद्युते ॥ ७८ ॥

'महाद्युते ! आप अजेय, सनातन देवता, स्वयम्भू और भूतभावन हैं, अक्षर और क्षर तथा भाव और अभाव आप-हीके स्वरूप हैं ॥ ७८ ॥

रक्ष मां रक्षणीयोऽहं त्वयानघ नमोऽस्तु ते ।
आदिकर्तासि लोकानां त्वयैतद् बहुलीकृतम् ॥ ७९ ॥

'निष्पाप श्रीकृष्ण ! आप मेरी रक्षा कीजिये ! मैं आपके द्वारा संरक्षण पानेके योग्य हूँ, आपको नमस्कार है। आप समस्त लोकोंके आदिकर्ता हैं। आपने ही इस दृश्य जगत्‌का विस्तार किया है ॥ ७९ ॥

विक्रीडसि महादेव बालः क्रीडनकैरिव ।
न ह्यहं प्रकृतिद्वेषी नाहं प्रकृतिदूषकः ॥ ८० ॥

'महादेव ! जैसे बालक खिलौनोंसे खेलता है, उसी प्रकार आप इस जगत्‌के द्वारा क्रीड़ा करते हैं, आप ही इस जगत्‌की प्रकृति अर्थात् कारण हैं, न तो मैं आपसे द्वेष रखता हूँ और न आपपर दोषारोपण ही करता हूँ ॥ ८० ॥

प्रकृत्या विकारेषु वर्तते पुरुषर्षभ ।
तस्या विकारशमने वर्तसे त्वं महाद्युते ॥ ८१ ॥

'महातेजस्वी पुरुषोत्तम ! अहङ्कार आदि विकारोंमें जो प्रकृति (लोभ, द्वेषादि रूप पूर्ववासना) है, उसके विकारों (चोरी, हिंसा आदि दोषों) की शान्तिके लिये आप दुष्टोंका दमन आदि कार्य करते हैं ॥ ८१ ॥

विकारो वा विकाराणां विकाराय न तेऽनघ ।
तानधर्मविदो मन्दान् भवान् विकुरुते सदा ॥ ८२ ॥

'अनघ ! अथवा वे क्रोध आदि विकार विकारों (दुष्टों) के विकार (विनाश) के लिये ही होते हैं, आपको विकृत करनेके लिये नहीं। आप सदा उन अधर्मवेत्ता मूढ पुरुषोंका ही विनाश किया करते हैं (सत्पुरुषोंका नहीं) ॥ ८२ ॥

इदं प्रकृतिजैर्दोषैस्तमसा मुह्यते यदा ।
रजसा वापि संस्पृष्टं तदा मोहः प्रवर्तते ॥ ८३ ॥

'यह जगत् जब प्राकृत दोषों, तथा तमोगुणसे ग्रस्त होकर अपना विवेक खो बैठता है अथवा रजोगुणसे संयुक्त होकर संग्रह-परिग्रहमें व्यग्र हो जाता है, तब उसपर मोह छा जाता है ॥ ८३ ॥

७४२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

परावरज्ञः सर्वज्ञ ऐश्वर्यविधिमाश्रितः।
किं मोहयसि नः सर्वान् प्रजापतिरिव स्वयं ॥ ८४॥

'आप स्वयं प्रजापतिके समान कार्य और कारणके ज्ञाता, सर्वज्ञ तथा ऐश्वर्यविधिको आश्रय लेकर स्थित हैं, फिर भी हम सब लोगोंको मोहमें क्यों डाल रहे हैं?'॥ ८४॥

वरुणेनैवमुक्तस्तु कृष्णो लोकपरायणः।
भावज्ञः सर्वकृद् धीरस्ततः प्रीतमना ह्यभूत् ॥ ८५॥
इत्येवमुक्तः कृष्णस्तु प्रहसन् वाक्यमब्रवीत् ।

वरुणदेवके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण जगत्के आश्रय, हार्दिक भावके ज्ञाता, सर्वस्रष्टा एवं धीर स्वभाववाले भगवान् श्रीकृष्ण मन-ही-मन उनपर बहुत प्रसन्न हुए, उनकी पूर्वोक्त बात सुनकर वे हँसते हुए उनसे इस प्रकार बोले ॥ ८५ ½ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

गावः प्रयच्छ मे वीर शान्त्यर्थं भीमविक्रम ॥ ८६॥
इत्येवमुक्ते कृष्णेन वाक्यं वाक्यविशारदः।
वरुणो ह्यब्रवीद् भूयः शृणु मे मधुसूदन ॥ ८७॥

श्रीकृष्णने कहा—भयानक पराक्रमी वीर ! तुम इस विवादकी शान्तिके लिये ये गौएँ मुझे दे दो। श्रीकृष्णके ऐसी बात कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल वरुणदेव पुनः इस प्रकार बोले—'मधुसूदन ! पहले मेरी बात सुन लीजिये' ॥

वरुण उवाच

बाणेन सार्धं समयो मया देव कृतः पुरा।
कथं च समयं कृत्वा कुर्यां विफलमन्यथा ॥ ८८॥

वरुणने कहा—देव ! मैंने पूर्वकालमें बाणासुरके साथ एक प्रतिज्ञा की है, वह प्रतिज्ञा करके उसके विपरीत आचरण-द्वारा मैं उसे निष्फल कैसे कर सकता हूँ ॥ ८८ ॥

त्वमेव वेद सर्वस्य यथा समयभेदकः।
चारित्रं दुष्यते तेन न च सद्भिः प्रशस्यते ॥ ८९॥

प्रतिज्ञा तोड़नेवाला कैसा होता है, इन सब बातोंको आप ही सबसे अधिक जानते हैं। प्रतिज्ञा तोड़नेसे चरित्र कलङ्कित होता है और साधु पुरुष उसकी प्रशंसा नहीं करते ॥ ८९ ॥

धर्मभागिभिर्नरो नित्यं वर्ज्यते मधुसूदन।
न च लोकानवाप्नोति पापः समयभेदकः ॥ ९०॥

मधुसूदन ! धर्मात्मा पुरुष प्रतिज्ञा भङ्ग करनेवाले मनुष्यको सदाके लिये त्याग देते हैं, वह पापी उत्तम लोकोंको नहीं पाता ॥ ९० ॥

प्रसीद धर्मलोपश्च मा भून्मे मधुसूदन।
न मां समयभेदेन योक्तुमर्हसि माधव ॥ ९१॥

मधुसूदन ! प्रसन्न होइये ! मेरे धर्मका लोप न हो। माधव ! मुझे प्रतिज्ञा-भङ्गके पापसे संयुक्त न कीजिये ॥ ९१॥

जीवन्नाहं प्रदास्यामि गावो वै वृषभेक्षण।
हत्वा नयस्व मां गाव एष मे समयः पुरा ॥ ९२॥

वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले गोविन्द ! मैं जीते-जी इन गौओंको नहीं दूँगा। आप मेरा वध करके इन्हें ले जाइये। पूर्वकालमें मैंने यही प्रतिज्ञा की है ॥ ९२ ॥

एतच्च मे समाख्यातं समयं मधुसूदन।
सत्यमेव महाबाहो न मिथ्या तु सुरेश्वर ॥ ९३॥

'मधुसूदन ! महाबाहो ! यह मैंने अपनी प्रतिज्ञा कह सुनायी। सुरेश्वर ! यह सर्वथा सत्य ही है, मिथ्या नहीं है ॥

यद्येवाहमनुग्राह्यो रक्ष मां मधुसूदन।
अथवा गोषु निर्बन्धो हत्वा नय महाभुज ॥ ९४॥

महाबाहु मधुसूदन ! यदि मैं आपके अनुग्रहका पात्र हूँ, तो आप मेरी रक्षा कीजिये अथवा गौओंके लिये ही आग्रह हो, तो मुझे मारकर इन्हें ले जाइये ॥ ९४॥

वैशम्पायन उवाच

वरुणेनैवमुक्तस्तु यदूनां वंशवर्धनः।
अभेद्यं समयं मत्वा न्यस्तवादो गवां प्रति ॥ ९५॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वरुणदेवके ऐसा कहनेपर यदुवंशकी वृद्धि करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने उनकी प्रतिज्ञाको अभेद्य मानकर गौओंके लिये विवाद त्याग दिया ॥ ९५ ॥

स प्रहस्य ततो वाक्यं व्याजहारार्थकोविदः।
तस्मान्मुक्तोऽसि यद्येवं बाणेन समयः कृतः ॥ ९६॥

व्यवहारकुशल श्रीकृष्ण उस समय हँसकर बोले—'यदि आपने बाणासुरके साथ ऐसी प्रतिज्ञा कर ली है तो अब आप इस कलहसे मुक्त हैं' ॥ ९६ ॥

प्रश्रितैर्मधुरैर्वाक्यैस्तत्त्वार्थमधुभाषितैः।
कथं पापं करिष्यामि वरुण त्वय्यहं प्रभो ॥ ९७॥

फिर वे विनययुक्त मधुर वचनों तथा तात्त्विक अर्थसे युक्त मीठी बातोंद्वारा उन्हें प्रसन्न करते हुए बोले—'प्रभो ! वरुणदेव ! मैं आपके प्रति दुर्व्यवहार कैसे करूँगा ॥ ९७॥

गच्छ मुक्तोऽसि वरुण सत्यसंधोऽसि नो भवान्।
त्वत्प्रियार्थं मया मुक्ता बाणगावो न संशयः ॥ ९८॥

'वरुणदेव ! जाइये, अब आप मुक्त हैं। सत्यप्रतिज्ञ होनेके साथ ही हमारे सम्बन्धी हैं, आपका प्रिय करनेके लिये मैंने बाणासुरकी गौओंको छोड़ दिया, इसमें संशय नहीं है ॥ ९८॥

ततस्तूर्यनिनादैश्च भेरीणां च महास्वनैः।
अर्घ्यमादाय वरुणः केशवं प्रत्यपूजयत् ।

विष्णुपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७४३

केशवोऽर्घ्यं तदा गृह्य वरुणाद् यदुनन्दनः ॥ ९९ ॥

तदनन्तर वाद्योंकी ध्वनि और डंकोंकी बड़ी भारी आवाजके साथ वरुणदेवने अर्घ्य लेकर श्रीकृष्णका पूजन किया। यदुनन्दन श्रीकृष्णने वरुणसे वह अर्घ्य लेकर उनकी पूजा स्वीकार की ॥ ९९ ॥

बलं चापूजयद् देवः कुशलीव समाहितः ।
वरुणायाभयं दत्त्वा वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १००॥
द्वारकां प्रस्थितः शौरिः शचीपतिसहायवान् ।

तत्पश्चात् वरुणदेवने सकुशल पुरुषकी भाँति एकाग्र-चित्त हो बलभद्रजीका भी पूजन किया। फिर प्रतापी शूरनन्दन श्रीकृष्ण वरुणदेवको अभयदान देकर शचीपति इन्द्रके साथ द्वारकाको प्रस्थित हुए ॥ १०० १/२ ॥

तत्र देवाः समरुतः साध्याः सिद्धचारणाः ॥ १०१॥
गन्धर्वाप्सरसश्चैव किन्नराश्चान्तरिक्षगाः ।
अनुगच्छन्ति भूतेशं सर्वभूतादिमव्ययम् ॥ १०२॥

वहाँ सम्पूर्ण भूतोंके आदिकारण, अविनाशी, भूतनाथ श्रीकृष्णके पीछे-पीछे देवता, मरुद्गण, साध्यगण, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सरा तथा किन्नर भी आकाशमार्गसे चल रहे थे ॥ १०१-१०२ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ यक्षराक्षसाः ।
विद्याधरगणाश्चैव ये चान्ये सिद्धचारणाः ।
गच्छन्तमनुगच्छन्ति यशसा विजयेन च ॥ १०३॥

आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, यक्ष, राक्षस, विद्याधर तथा जो अन्य सिद्ध-चारण थे, वे सब यश और विजयके साथ यात्रा करते हुए श्रीकृष्णका अनुसरण कर रहे थे ॥ १०३ ॥

नारदश्च महाभागः प्रस्थितो द्वारकां प्रति ।
तुष्टो वाणजयं दृष्ट्वा वरुणं च कृतप्रियम् ॥ १०४॥

महाभाग नारद भी द्वारकाको ही प्रस्थान कर रहे थे। वे श्रीकृष्णके द्वारा बाणासुरपर विजय और वरुणके प्रिय कार्यका सम्पादन देखकर बहुत संतुष्ट थे ॥ १०४ ॥

कैलासशिखरप्रख्यैः प्रासादैः कन्दरैः शुभैः ।
दूराद्विशाम्य मधुहा द्वारकां द्वारमालिनीम् ॥ १०५॥
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं चक्रे चक्रगदाधरः ।
संज्ञां प्रयच्छते देवो द्वारकापुरवासिनाम् ॥ १०६॥

तदनन्तर चक्र और गदा धारण करनेवाले मधुसूदनने द्वारमालाओंसे अलंकृत तथा कैलासशिखरके समान कान्ति-मान् प्रासादों और सुन्दर कन्दराओंसे सुशोभित द्वारकापुरी-को दूरसे ही देखकर पाञ्चजन्य शङ्खका गम्भीर घोष किया। इस प्रकार भगवान् वासुदेवने द्वारकावासियोंको अपने आग-मनकी सूचना प्रदान की ॥ १०५-१०६ ॥

देवानुयाननिर्घोषं पाञ्चजन्यस्य निस्वनम् ।
श्रुत्वा द्वारवती सर्वा प्रहर्षमतुलं गता ॥ १०७॥

पीछे-पीछे आनेवाले देवताओंके विमानोंका गम्भीर घोष और पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनि सुनकर सारी द्वारकापुरी अनुपम प्रसन्नतासे फूल उठी ॥ १०७ ॥

पूर्णकुम्भैश्च लाजैश्च बहुविन्यस्तविस्तरैः ।
द्वारोपशोभितां कृत्वा सर्वां द्वारवतीं पुरीम् ॥ १०८॥

नगरनिवासियोंने द्वारकापुरीके सभी द्वारोंपर जलसे भरे हुए कलश रखे, खील बिखेरे तथा बड़े विस्तारके साथ अनेक प्रकारकी सजावटें कीं। यह सब करके उन्होंने सम्पूर्ण नगरीको अभिनव शोभासे सम्पन्न कर दिया ॥ १०८ ॥

सुश्लिष्टरथ्यां सश्रीकां बहुरत्नोपशोभिताम् ।
विप्राश्चार्घ्यं समादाय तथैव कुलनैगमाः ॥ १०९॥
जयशब्दैश्च विविधैः पूजयन्ति स्म माधवम् ।
वैनतेये तमासीनं नीलाञ्जनचयोपमम् ॥ ११०॥

गलियाँ और सड़कें खूब झाड़-बुहारकर स्वच्छ एवं सुसज्जित कर दी गयीं, सारी पुरीकी शोभा बढ़ा दी गयी तथा उसे अनेक प्रकारके रत्नोंसे सजा दिया गया, ब्राह्मण तथा कुलाचारके ज्ञाता पुरोहित आदि अर्घ्य लेकर नाना प्रकारसे जय-जयकार करते हुए नीली अञ्जनराशिके समान श्यामसुन्दर माधवकी, जो गरुड़पर विराजमान थे, पूजा करने लगे ॥

ववन्दिरे तदा कृष्णं श्रिया परमया युतम् ।
तमानुपूर्व्या वर्णाश्च पूजयन्ति महाबलम् ॥ १११॥
अनन्तं केशहन्तारं श्रेष्ठिपूर्वाश्च श्रेणयः ।

उस समय सबने उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न भगवान् श्रीकृष्णकी वन्दना की। सभी वर्णोंके लोग, महाबली अनन्त (बलराम) एवं केशिहन्ता श्रीकृष्णकी क्रमशः पूजा करने लगे, सेठ आदि व्यापारियोंने भी उनका पूजन किया ॥

ऋषिभिर्देवगन्धर्वैश्चारणैश्च समन्ततः ॥ ११२॥
स्तूयते पुण्डरीकाक्षो द्वारकोपवने स्थितः ।

उस अवसरपर द्वारकाके उपवनमें ठहरे हुए कमलनयन श्रीकृष्णकी ऋषि, देवता, गन्धर्व और चारण आदि सब ओरसे स्तुति कर रहे थे ॥ ११२ १/२ ॥

तदाश्चर्यमपश्यन्त दाशार्हगणसत्तमाः ॥ ११३॥
प्रहर्षमतुलं प्राप्ता दृष्ट्वा कृष्णं महाभुजम् ।
वाणं जित्वा महादेवमायान्तं पुरुषोत्तमम् ॥ ११४॥

यदुकुलके श्रेष्ठ पुरुषोंने उस आश्चर्यको अपनी आँखों देखा था। बाणासुरको जीतकर लौटे हुए महान् देवता महाबाहु पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको देखकर उन्हें अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ था ॥ ११३-११४ ॥

७४४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

द्वारकावासिनां वाचश्चरन्ति बहुधा तदा।
प्राप्ते कृष्णे महाभागे यादवानां महारथे ॥११५॥
यादव-महारथी महाभाग श्रीकृष्णके लौट आनेपर द्वारका-वासियोंके मुखसे उस समय नाना प्रकारकी बातें निकलने लगीं—॥ ११५ ॥

गत्वा च दूरमध्वानं सुपर्णो द्रुतमागतः।
धन्याः स्मोऽनुगृहीताः स्मो येषां वै जगतः पिता ॥११६॥
रक्षिता चैव गोप्ता च दीर्घबाहुर्महाभुजः।
वैनतेयं समारुह्य जित्वा वाणं सुदुर्जयम् ॥११७॥
प्राप्तोऽयं पुण्डरीकाक्षो मनांस्याह्लादयन्निव।
'ये गरुड़ बहुत दूरके मार्गपर जाकर शीघ्र ही लौट आये। हम धन्य हैं और भगवान्‌के द्वारा अनुगृहीत हैं, जिनके रक्षक और पालक लंबी भुजावाले जगत्पिता महाबाहु श्रीकृष्ण हैं। गरुड़पर आरूढ़ हो अत्यन्त दुर्जय बाणासुरको जीतकर ये कमलनयन श्रीकृष्ण हमारे मनको आह्लादित करते हुए-से यहाँ आ पहुँचे हैं' ॥ ११६-११७॥

एवं कथयतामेव द्वारकावासिनां तदा ॥११८॥
वासुदेवगृहं देवा विविशुस्ते महारथाः।
जब द्वारकावासी इस प्रकारकी बातें कह रहे थे, उस समय वे महारथी देवगण भगवान् श्रीकृष्णके भवनमें प्रविष्ट हुए ॥ ११८॥

अवतीर्य सुपर्णात् तु वासुदेवो बलस्तदा ॥११९॥
प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च गृहान् प्रविशंस्तदा।
वहाँ पहुँचनेपर बलराम, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध भी तत्काल गरुड़से उतरकर अपने-अपने घरोंमें गये ॥११९॥

ततो देवविमानानि संचरन्ति तदा दिवम् ॥१२०॥
अवस्थितानि दृश्यन्ते नानारूपाणि सर्वशः।
तदनन्तर देवताओंके विमान, जो आकाशमें विचरते थे, उस समय वहाँ स्थिर दिखायी देने लगे; उन सबके स्वरूप नाना प्रकारके थे ॥ ॥ १२०॥

हंसर्षभमृगैर्नागैर्वाजिसारसवर्हिणैः ॥१२१॥
भास्वन्ति तानि दृश्यन्ते विमानानि सहस्रशः।
हंस, वृषभ, मृग, हाथी, घोड़े, सारस और मोर आदि-से युक्त वे सहस्रों तेजस्वी विमान वहाँ दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ १२१॥

अथ कृष्णोऽब्रवीद्वाक्यं कुमारांस्तान् सहस्रशः।
प्रद्युम्नादीन् समस्तांस्तु श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ॥१२२॥
तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने सहस्रोंकी संख्यामें उपस्थित हुए प्रद्युम्न आदि समस्त यादवकुमारोंसे स्निग्ध एवं मधुर वाणीमें कहा—॥ १२२ ॥

एते रुद्रास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथाश्विनावपि।
साध्या देवास्तथान्ये च वन्दध्वं च यथाक्रमम् ॥१२३॥
'बच्चो ! ये रुद्र, आदित्य, वसु, अश्विनीकुमार, साध्य-गण तथा अन्य देवता यहाँ पधारे हैं, तुमलोग क्रमशः इन सबकी वन्दना करो ॥ १२३ ॥

सहस्राक्षं महाभागं दानवानां भयंकरम्।
वन्दध्वं सहिताः शक्रं सगशं नागवाहनम् ॥१२४॥
'दानवोंको भय देनेवाले सहस्र नेत्रधारी महाभाग इन्द्र ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो अपने सेवकगणोंके साथ पधारे हैं, तुम एक साथ होकर इनकी भी वन्दना करो ॥ १२४ ॥

सप्तर्षयो महाभागा भृग्वाङ्गिरसमाश्रिताः।
ऋषयश्च महात्मानो वन्दध्वं च यथाक्रमम् ॥१२५॥
'ये महाभाग सप्तर्षि भृगु और बृहस्पति के पास खड़े हैं, अन्यान्य महात्मा ऋषि भी पधारे हैं; तुमलोग क्रमशः इन सबकी वन्दना करो ॥ १२५ ॥

एते चक्रधराश्चैव तान् वन्दध्वं च सर्वशः।
सागराश्च ह्रदाश्चैव मत्प्रियार्थमिहागताः ॥१२६॥
दिशश्च विदिशश्चैव वन्दध्वं च यथाक्रमम्।
'ये समस्त चक्रधारी (लोकपाल) खड़े हैं, इन सबको प्रणाम करो। सागर, सरोवर, दिशा और विदिशाएँ—ये सब मेरा प्रिय करनेके लिये यहाँ पधारे हैं, तुमलोग क्रमशः इनकी वन्दना करो ॥ १२६॥

वासुकिप्रमुखाश्चैव नागा वै सुमहाबलाः ॥१२७॥
गावश्च मत्प्रियार्थं वै वन्दध्वं च यथाक्रमम्।
'वासुकि आदि महाबली नाग तथा गौएँ मेरा प्रिय करनेके लिये आयी हैं, तुमलोग क्रमशः इन्हें प्रणाम करो ॥

ज्योतींषि सह नक्षत्रैर्यक्षराक्षसकिन्नरैः ॥१२८॥
आगता मत्प्रियार्थे वै वन्दध्वं च यथाक्रमम्।
'नक्षत्रोंसहित ग्रह और तारे, यक्ष, राक्षस और किन्नर—ये सभी मेरा प्रिय करनेके लिये यहाँ आये हैं, तुम क्रमशः इनकी वन्दना करो' ॥ १२८ ॥

वासुदेववचः श्रुत्वा कुमाराः प्रणताः स्थिताः ॥ १२९॥
यथाक्रमेण सर्वेषां देवतानां महात्मनाम्।
भगवान् वासुदेवका यह वचन सुनकर वे समस्त यादव-कुमार क्रमशः सभी देवताओं और महात्माओंको प्रणाम करके खड़े हो गये ॥ १२९॥

सर्वान् दिवौकसो दृष्ट्वा पौरा विस्मयमागताः ॥१३०॥
पूजार्थमथ सम्भारान् प्रगृह्य द्रुतमागताः।
समस्त देवताओंको वहाँ उपस्थित देख पुरवासियोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे पूजाकी सामग्री लेकर शीघ्रतापूर्वक वहाँ आये ॥ १३० ॥

अहो सुमहदाश्चर्यं वासुदेवस्य संश्रयात् ॥१३१॥
प्राप्यते यदिहास्माभिरिति वाचश्चरन्त्युत।

विष्णुपूर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७४५


उस समय उनके मुखसे निम्नाङ्कित बातें निकल रही थीं—'अहो ! भगवान् वासुदेवका आश्रय लेनेसे हमें महान् आश्चर्यकी वस्तु देखनेको मिल रही है' ॥ १३१ १/२ ॥
ततश्चन्दनचूर्णैश्च गन्धपुष्पैश्च सर्वशः ॥ १३२॥
किरन्ति पौराः सर्वांस्तान् पूजयन्तो दिवौकसः ।
तदनन्तर समस्त देवताओंकी पूजा करते हुए पुरवासी वहाँ सब ओर चन्दनके चूर्ण और सुगन्धित पुष्प बिखेरने लगे ॥
लाजैः प्रणामैर्धूपैश्च वाद्यध्वनियमैस्तथा ॥ १३३॥
द्वारकावासिनः सर्वै पूजयन्ति दिवौकसः ।
उन्होंने खील चढ़ाये, बारंबार प्रणाम किये, धूप-दीप आदि निवेदन किये, भाँति-भाँतिके वाद्योंकी ध्वनि की और अहिंसा आदि यमोंका पालन किया, इस प्रकार समस्त द्वारकावासियोंने देवताओंकी पूजा की ॥ १३३ १/२ ॥
आहुकं वासुदेवं च साम्बं च यदुनन्दनम् ॥ १३४॥
सात्यकिं चोल्मुकं चैव विपृथुं च महाबलम् ।
अक्रूरं च महाभागं तथा निशठमेव च ॥ १३५॥
एतान् परिष्वज्य तदा मूर्ध्नि चाघ्राय वासवः ।
अथ शक्रो महाभागः समक्षं यदुमण्डले ॥ १३६॥
स्तुवन्तं केशिहन्तारं तत्रोवाचोत्तरं वचः ।
इसके बाद देवराज इन्द्रने राजा उग्रसेन, भगवान् वासुदेव, यदुनन्दन साम्ब, सात्यकि, उल्मुक, महाबली विपृथु, महाभाग अक्रूर तथा निशठ—इन सबको हृदयसे लगाकर मस्तक सूँघा, फिर उन महाभाग इन्द्रने सारी यदु-मण्डलीके समक्ष अपनी (इन्द्रकी) स्तुति करते हुए केशि-हन्ता भगवान् श्रीकृष्णको उत्तर देते हुए उनके विषयमें वहाँ इस प्रकार उत्कृष्ट बात कही—॥ १३४-१३६ १/२ ॥
सात्वतः सात्वतामेष सर्वेषां यदुनन्दनः ॥ १३७॥
मोक्षयित्वा रणे चैव यशसा पौरुषेण च ।
महादेवस्य मिषतो गुहस्य च महात्मनः ॥ १३८॥
एष बाणं रणे जित्वा द्वारकां पुनरागतः ।
'ये श्रीकृष्ण समस्त सात्वतवंशी यादवोंमें सर्वश्रेष्ठ सात्वत हैं। इन्होंने रणभूमिमे अपने यश और पुरुषार्थके द्वारा यदुनन्दन अनिरुद्धको बन्धनमुक्त कराकर महादेवजी तथा महामना कार्तिकेयके देखते-देखते संग्राममे बाणासुरको परास्त करके पुनः द्वारकामे पदार्पण किया है ॥ १३७-१३८ १/२ ॥
सहस्रबाहोर्बाहूनां कृत्वा द्वयमनुत्तमम् ॥ ३९॥
स्थापयित्वा द्विबाहुत्वे प्राप्तोऽयं स्वपुरं हरिः ।
'सहस्र भुजाओंसे युक्त बाणासुरके लिये इन्होंने दो ही परम उत्तम भुजाएँ शेष छोड़ दीं और उसे द्विबाहुके पदपर प्रतिष्ठित करके ये श्रीहरि अपनी पुरीमें पधारे हैं ॥ १३९ १/२ ॥


यदर्थं जन्म कृष्णस्य मानुषेषु महात्मनः ॥ १४०॥
तदप्यवसितं कार्यं नष्टशोका वयं कृताः ।
'जिसके लिये मनुष्योंमे महात्मा श्रीकृष्णका अवतार हुआ था, वह कार्य भी अब पूरा हो गया; इन्होंने हम देवताओंके सारे शोक नष्ट कर दिये ॥ १४० १/२ ॥
पिवतां मधु माध्वीकं भवतां प्रीतिपूर्वकम् ॥ १४१॥
कालो यास्यत्यविरतं विषयेष्वेव सज्जताम् ।
'यादवो ! अब मधुर मधुपान करते और निरन्तर मनोवाञ्छित विषयोंका ही सुख भोगते हुए तुमलोगोंका समय बड़ी प्रसन्नताके साथ बीतेगा ॥ १४१ १/२ ॥
बाहूनां संश्रयात् सर्वे वयमस्य महात्मनः ॥ १४२॥
प्रणष्टशोका रंस्यामः सर्वे एव यथासुखम् ।
'हम सब देवता इन महात्मा श्रीकृष्णकी भुजाओंका आश्रय लेनेसे सर्वथा शोकहीन हो गये। अब हम सभी सुखपूर्वक स्वर्गलोकमें रमण करेंगे' ॥ १४२ १/२ ॥
एवं स्तुत्वा सहस्राक्षः केशवं दानवान्तकम् ॥ १४३॥
आपृच्छथ तं महाभागः सर्वदेवगणैर्वृतः ।
ततः पुनः परिष्वज्य कृष्णं लोकनमस्कृतम् ।
पुरंदरो दिवं यातः सह देवमरुद्गणैः ॥ १४४॥
इस प्रकार दानवविनाशक भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करके सम्पूर्ण देवताओसे घिरे हुए महाभाग इन्द्रने उनसे जानेके लिये आज्ञा माँगी, तत्पश्चात् विश्ववन्दित श्रीकृष्णको पुनः हृदयसे लगाकर इन्द्र देवताओं और मरुद्गणोंके साथ स्वर्गलोकको चले गये ॥ १४३-१४४ ॥
ऋषयश्च महात्मानो जयाशीर्भिर्महौजसम् ।
यथागतं पुनर्याता यक्षराक्षसकिंनराः ॥ १४५॥
महात्मा ऋषि भी विजयसूचक आशीर्वादोंसे महाबली श्रीकृष्णका अभिनन्दन करके जैसे आये थे, वैसे फिर चले गये। इसी तरह यक्ष, राक्षस और किन्नर भी अपने-अपने स्थानको लौट गये ॥ १४५ ॥
पुरंदरे दिवं याते पद्मनाभो महाबलः ।
अपृच्छत महाभागः सर्वान् कुशलमव्ययम् ॥ १४६॥
देवराज इन्द्रके स्वर्गलोकको चले जानेपर महाबली, महाभाग, पद्मनाभ श्रीकृष्णने समस्त यादवोंका कुशल-मङ्गल पूछा ॥ १४६ ॥
ततः किलकिलाशब्दं निर्वमन्तः सहस्रशः ।
गच्छन्ति कौमुदीं द्रष्टुं सोऽनघः प्रीयते सदा ॥ १४७॥
तदनन्तर सहस्रों पुरवासी किलकारियाँ भरते और आश्चर्य प्रकट करते हुए श्रीकृष्णके मुखचन्द्रकी चन्द्रिकाका दर्शन करनेके लिये आने-जाने लगे। निष्पाप श्रीकृष्ण उनकी

७४६ श्रीमहाभारते खिलभाग [ हरिवंशे उस प्रेमभक्तिसे सदा प्रसन्न रहते थे ॥ १४७ ॥ द्वारकामें आकर उत्तम लक्ष्मीसे संयुक्त हुए भगवान् द्वारकां प्राप्य कृष्णस्तु रेमे यदुगणैः सह । श्रीकृष्ण नाना प्रकारके सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओंका सद्- विविधान् सर्वकामार्थांश्छ्रिया परमया युतः ॥ १४८॥ पयोग करते हुए यादवोंके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि द्वारकाप्रत्यागमने सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकामें पुनरागमनविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥ अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः द्वारकामें उत्सव, उषाका अन्तःपुरमें प्रवेश और सत्कार, श्रीकृष्ण और विष्णुपर्वकी महिमा तथा पर्वका उपसंहार वैशम्पायन उवाच वाद्यन्ति पुरे तत्र नार्यो मदवशं गताः । अथाहुको महाबाहुः कृष्णं प्राह महाद्युतिः । नृत्यन्ते चाप्सरास्तत्र गायन्ति च तथापराः॥ ७ ॥ हर्षोद्रुतफुल्लनयनः श्रूयतां यदुनन्दन ॥ १ ॥ वहाँ नगरकी नारियाँ मदमत्त होकर बाजे बजाने वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तदनन्तर लगीं, कुछ अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और दूसरी गीत महाबाहु महातेजस्वी उग्रसेनने, जिनके नेत्र हर्षसे खिल उठे गाने लगीं ॥ ७ ॥ थे, भगवान् श्रीकृष्णसे कहा-यदुनन्दन ! सुनिये ॥ १ ॥ काश्चित् प्रमुदितास्तत्र काश्चिदन्योन्यमब्रुवन् । एवं गतेऽनिरुद्धस्य क्रियतां महदुत्सवः । नानावर्णावरधराः क्रीडमानास्ततस्ततः ॥ ८ ॥ क्षेमात् प्रत्यागतं दृष्ट्वा सेव्यमाना महामते ॥ २ ॥ कुछ स्त्रियाँ वहाँ आनन्द-विनोदमें मग्न थीं, कुछ उषापि च महाभागा सखीभिः परिवारिता । आपसमें बातें कर रहीं थीं तथा बहुत-सी स्त्रियाँ नाना प्रकार- रमते परया प्रीत्या चानिरुद्धेन संगता ॥ ३ ॥ के वस्त्र धारण किये इधर-उधर भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करती 'महामते ! जब अनिरुद्ध कुशलपूर्वक द्वारका लौट थीं ॥ ८ ॥ आये और उन्हें देख लिया गया, ऐसी दशामें उनके लिये अभियान्ति ततोऽन्योन्यं काश्चिन्मदवशात् स्वयम्। कोई महान् उत्सव रचाया जाय-ऐसा मेरा विचार है। क्रीडन्ति काश्चिदक्षैस्तु हर्षोद्रुतफुल्ललोचनाः ॥ ९ ॥ महाभागा उषा भी सखियोंसे सेवित हो उनसे घिरी रहती है कितनी ही स्त्रियाँ यौवनमदके वशीभूत हो स्वयं ही और अनिरुद्धसे मिलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ आनन्दपूर्वक परस्पर आलिङ्गन करती थीं और कितनी द्यूतक्रीड़ामें लगी समय बिताती है ॥ २-३ ॥ हुई थीं, उन सबके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे ॥ ९ ॥ कुम्भाण्डदुहिता रामा उषायाः सखिमण्डले । मायूरं रथमारुह्य सखीभिः परिवारिता । प्रवेश्यतां महाभागा वैदर्भी वर्द्धयेत् पुनः ॥ ४ ॥ उषा सम्प्रेषिता देव्या रुद्राण्या प्रतिगृह्यताम् ॥ १० ॥ 'उषाकी सखियोंके समुदायमें जो कुम्भाण्डकी पुत्री इयं चैव कुलश्लाघ्या नाम्नोषा सुन्दरी वरा । रामा है, उसका अन्तःपुरमें प्रवेश कराया जाय और वाणपुत्री तव वधूः प्रतिगृह्णीष्व भामिनीम् ॥ ११ ॥ महाभागा विदर्भनन्दिनी रुक्मिणी पुनः अपनी पुत्रवधूके ( जब पहले-पहल उषाका रथ द्वारपर आया । उस रूपमें उसका अभिनन्दन करें ॥ ४ ॥ समय भगवान् श्रीकृष्णने रुक्मिणीसे कहा--) 'देवि ! रुद्र- साम्बाय दीयतां रामा कुम्भाण्डदुहिता शुभा । पत्नी पार्वतीदेवीने सखियोंसे घिरी हुई उषाको मयूरयुक्त शेषाश्च कन्या न्यस्यन्तां कुमाराणां यथाक्रमम् ॥ ५ ॥ रथपर चढ़ाकर यहाँ भेजा है। तुम इसे ग्रहण करो। 'कुम्भाण्डकी शुभलक्षणा कन्या रामा साम्बको विवाह उत्तम कुलकी दृष्टिसे यह हमारे लिये स्पृहणीय है। इस श्रेष्ठ दी जाय और शेष कन्याएँ भी क्रमशः अन्यान्य कुमारोंको एवं सुन्दरी कन्याका नाम उषा है । यह बाणासुरकी पुत्री सौंप दी जायें' ॥ ५ ॥ और तुम्हारी बहू है, तुम इस भामिनीको सादर ग्रहण वर्तते सोत्सवस्तत्र अनिरुद्धस्य वेश्मनि । करो' ॥ १०-११ ॥ गृहे श्रीधन्वनश्चैव शुभस्तत्र प्रवर्त्तते ॥ ६ ॥ ततः प्रतिगृहीता सा स्त्रीभिराचारमङ्गलैः । ( उग्रसेनके ऐसा कहनेपर) अनिरुद्ध और श्रीधन्वाके प्रवेशिता च सा वेश्म अनिरुद्धस्य शोभना ॥ १२ ॥ भवनमें उस शुभ उत्सवका आरम्भ हुआ ॥ ६ ॥ तत्र अन्तःपुरकी स्त्रियोंने मङ्गलाचारपूर्वक उस सुन्दरी

विष्णुपर्व ] अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७४७

बहूको ग्रहण किया और उसे अनिरुद्धके महलमें पहुँचाया ॥ १२ ॥
देवकी रोहिणी चैव रुक्मिण्यथ विदर्भजा ।
दृष्ट्वानिरुद्धं रोदन्त्यः स्नेहहर्षसमन्विताः ॥ १३ ॥
देवकी, रोहिणी, रुक्मिणी और शुभाङ्गी आदि स्त्रियाँ अनिरुद्धको देखकर स्नेह और हर्षसे विह्वल हो रोने लगीं ॥ १३ ॥
रेवती रुक्मिणी चैव गृहमुल्यं प्रवेशयत् ।
वधूर्वर्धसि दिष्ट्या त्वमनिरुद्धस्य दर्शनात् ॥ १४ ॥
रेवती और रुक्मिणीने अनिरुद्धको उनके श्रेष्ठ भवनमें पहुँचाया और प्रद्युम्नपत्नी शुभाङ्गीसे कहा—'बहू ! आज तुम अपने पुत्र अनिरुद्धको देखकर अभ्युदयशालिनी हुई हो। यह बड़े सौभाग्यकी बात है' ॥ १४ ॥
ततस्तूर्यप्रणादैस्ता वरनार्यः शुभाननाः ।
क्रियामारेभिरे कर्तुमुषा च गृहसंस्थिता ॥ १५ ॥
तदनन्तर सुन्दर मुखवाली वे सुन्दरी स्त्रियाँ नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिके साथ कुलाचारका सम्पादन करने लगीं और उषा घरके भीतर विराजमान हुई ॥ १५ ॥
ततो हर्म्यतलस्था सा वृष्णिपुङ्गवसंस्थिता ।
रमते सर्वसदृशैरुपभोगैर्वरानना ॥ १६ ॥
सुमुखी उषा अट्टालिकामें वृष्णिपुङ्गव अनिरुद्धके साथ रहकर अपने योग्य समस्त उपभोगोंके द्वारा आनन्दपूर्वक समय बिताने लगी ॥ १६ ॥
चित्रलेखा च सुश्रोणी अप्सरारूपधारिणी ।
आपृच्छथ च सखीवर्गमुषां च त्रिदिवं गता ॥ १७ ॥
सुन्दर कटिप्रदेशवाली अप्सरारूपधारिणी चित्रलेखा उषा तथा अन्य सखियोंसे विदा ले स्वर्गलोकको चली गयी ॥ १७ ॥
गतासु तासु सर्वासु सखीष्वसुरसुन्दरी ।
मायावत्या गृहं नीता प्रथमं सा निमन्त्रिता ॥ १८ ॥
उन सब सखियोंके चले जानेपर असुरसुन्दरी उषाको सबसे पहले मायावतीने निमन्त्रित किया और वह उसे अपने घरमें ले गयी ॥ १८ ॥
सा तु प्रद्युम्नगृहिणी स्नुषां दृष्ट्वा सुमध्यमा ।
वासोभिरन्नपानैश्च पूजयामास सुन्दरीम् ॥ १९ ॥
प्रद्युम्नरती सुमध्यमा मायावतीने उस सुन्दरी पुत्रवधू- को देखकर अन्न, पान और वस्त्र आदिके द्वारा उसका सत्कार किया ॥ १९ ॥
ततः क्रमेण सर्वास्ता वधूमूषां यदुस्त्रियः ।
आचारमनुपश्यन्त्यः स्वधर्ममुपचक्रिरे ॥ २० ॥
तदनन्तर यदुकुलकी सभी स्त्रियोने अपने कुलाचारपर दृष्टि रखकर क्रमशः बहू उषाको बुलाया और स्वधर्मका पालन किया ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच
एतत् ते सर्वमाख्यातं मया कुरुकुलोद्वह ।
यथा बाणो जितः संख्ये जीवन्मुक्तश्च विष्णुना ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुकुलधुरन्धर जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्णने युद्धमें जिस प्रकार बाणासुर- को जीता और जीवित छोड़ दिया, यह सब प्रसंग मैंने तुमसे कह सुनाया ॥ २१ ॥
द्वारकायां ततः कृष्णो रेमे यदुगणैर्वृतः ।
अन्वशासन्महीं कृत्स्नां परया संयुतो मुदा ॥ २२ ॥
तदनन्तर यादवोंसे घिरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकामें सुखपूर्वक रहने लगे। वे परमानन्दसे सम्पन्न होकर समस्त भूमण्डलका अनुशासन करते थे ॥ २२ ॥
एवमेषोऽवतीर्णो वै पृथिवीं पृथिवीपते ।
विष्णुर्यदुकुलश्रेष्ठो वासुदेवेति विश्रुतः ॥ २३ ॥
पृथिवीनाथ ! इस प्रकार ये भगवान् विष्णु पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर यदुकुलशिरोमणि वासुदेवके नामसे विख्यात हुए थे ॥ २३ ॥
एतैश्च कारणैः श्रीमान् वसुदेवकुले प्रभुः ।
जातो वृष्णिषु देवक्यां यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २४ ॥
इन्हीं सब कारणोंसे श्रीमान् भगवान् विष्णु वृष्णिवंशके अन्तर्गत वसुदेवकुलमें देवकीदेवीके गर्भसे प्रकट हुए । जिसके विषयमें तुमने मुझसे प्रश्न किया था ॥ २४ ॥
निवृत्ते नारदप्रश्ने यन्मयोक्तं समासतः ।
श्रुतास्ते विस्तराः सर्वे ये पूर्वं जनमेजय ॥ २५ ॥
जनमेजय ! नारदजीके प्रश्नका उत्तर मिल जानेसे जब वह प्रश्न निवृत्त हो गया, उस समय मैंने उसके विषयमें संक्षेपसे जो कुछ कहा था, वे सारी बातें तुम पहले विस्तार-पूर्वक सुन चुके हो * ॥ २५ ॥
विष्णोस्तु माथुरे कल्पे यन्न्र ते संशयो महान् ।
वासुदेवगतिश्चैव सा मया समुदाहृता ॥ २६ ॥
भगवान् विष्णुके मधुरामें होनेवाले अवतारके विषयमें तुम्हे महान् संदेह था, उसके समाधानके लिये मैंने वासुदेवके स्वरूपका एवं वासुदेव ही सबकी परम गति (आश्रय) हैं, इस सिद्धान्तका भलीभाँति प्रतिपादन कर दिया ॥ २६ ॥
आश्चर्यं चैव नान्यद् वै कृष्णश्चाश्चर्यसंनिधिः ।
सर्वेष्वाश्चर्यकल्पेषु नास्त्याश्चर्यमवैष्णवम् ॥ २७ ॥
श्रीकृष्णके सिवा दूसरी कोई आश्चर्यकी वस्तु नहीं है। श्रीकृष्ण ही आश्चर्यके अधिष्ठान या समुद्र हैं। समस्त आश्चर्य-


* विष्णुपर्वके एक सौ दसवें अध्यायमें धन्योपाख्यान आया है, उसमें सबसे बढकर धन्य कौन है ? यह नारदजीकी जिज्ञासा निवृत्त हुई है, उसीकी ओर यहां संकेत किया गया है।

७४८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

मय वस्तुओंमें ऐसा कोई आश्चर्य नहीं है, जो भगवान् विष्णुके अंशसे शून्य हो ॥ २७ ॥

एष धन्यो हि धन्यानां धन्यकृद् धन्यभावनः।
देवेषु तु सदैत्येषु नास्ति धन्यतरोऽच्युतात् ॥ २८ ॥
ये श्रीकृष्ण धन्य हैं, ये ही धन्योंको धन्य बनानेवाले और धन्यभावन हैं, देवताओं तथा दैत्योंमें इन भगवान् अच्युतसे बढ़कर धन्य दूसरा कोई नहीं है ॥ २८ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ मरुतस्तथा।
गगनं भूर्दिशश्चैव सलिलं ज्योतिरेव च ॥ २९ ॥
ये ही आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, आकाश, भूमि, दिशा, जल और तेज हैं ॥ २९ ॥

एष धाता विधाता च संहर्ता चैव नित्यशः।
सत्यं धर्मस्तपश्चैव ब्रह्मा चैव पितामहः ॥ ३० ॥
ये ही धाता, विधाता और नित्यसंहर्ता हैं, सत्य, धर्म, तपस्या तथा पितामह ब्रह्मा. भी ये ही हैं ॥ ३० ॥

अनन्तश्चैव नागानां रुद्राणां शंकरः स्मृतः।
जङ्गमाजङ्गमं चैव जगन्नारायणोद्भवम् ॥ ३१ ॥
ये नागोंमें अनन्त और रुद्रोंमें शङ्कर माने गये हैं। यह समस्त चराचर जगत् इन नारायणदेवसे ही प्रकट हुआ है ॥ ३१ ॥

एतस्माच्च जगत् सर्वं प्रसूयेत जनार्दनात्।
जगच्च सर्वं देवेशे तं नमस्कुरु भारत ॥ ३२ ॥
इन जनार्दनसे ही सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति होती है। भारत ! देवेश्वर श्रीकृष्णमें ही सम्पूर्ण जगत् विद्यमान है। तुम उन्हें नमस्कार करो ॥ ३२ ॥

पूज्यश्च सततं सर्वैर्देवैरेष सनातनः।
इत्युक्तं बाणयुद्धं ते माहात्म्यं केशवस्य तु ॥ ३३ ॥
ये सनातन पुरुष श्रीकृष्ण ही सदा सम्पूर्ण देवताओंके लिये पूजनीय हैं। इस प्रकार मैंने तुमसे बाणासुरके युद्ध और केशवके माहात्म्यका वर्णन किया ॥ ३३ ॥

वंशप्रतिष्ठामतुलां श्रवणादेव लप्स्यसे।
ये चेदं धारयिष्यन्ति बाणयुद्धमनुत्तमम् ॥ ३४ ॥
केशवस्य च माहात्म्यं नाधर्मस्तान् भजिष्यति ।
तुम इसके श्रवणमात्रसे अनुपम वंशप्रतिष्ठा प्राप्त करोगे। जो लोग बाणासुरके इस परम उत्तम युद्धप्रसंग और केशवके माहात्म्यको अपने मनमें धारण करेंगे, उनके पास अधर्मका प्रवेश नहीं होगा ॥ ३४३ ॥

एषा तु वैष्णवी चर्चा मया कात्स्न्येन कीर्तिता ॥ ३५॥
पृच्छतस्तात यज्ञेऽस्मिन् निवृत्ते जनमेजय ।
तात जनमेजय ! इस यज्ञकी समाप्तिपर तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने भगवान् विष्णुकी इस सम्पूर्ण लीलाका वर्णन किया है ॥ ३५३ ॥

आश्चर्यपर्व निखिलं यो हीदं धारयेन्नरः ॥ ३६ ॥
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ।
नरेश्वर ! जो इस सम्पूर्ण आश्चर्यमय पर्वको धारण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है ॥ ३६३ ॥

कल्य उत्थाय यो नित्यं कीर्तयेत् सुसमाहितः ॥ ३७ ॥
न तस्य दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च।
जो प्रतिदिन सबेरे उठकर एकाग्रचित्त हो इसका कीर्तन करता है, उसके लिये इहलोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ३७३ ॥

ब्राह्मणः सर्ववेदी स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत्॥ ३८॥
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः कामानवाप्नुयात् ।
नाशुभं प्राप्नुयात् किंचिद् दीर्घमायुर्लभेत सः ॥ ३९॥
इस प्रसंगका अपने अधिकारके अनुसार पाठ या श्रवण करनेसे ब्राह्मण सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता होता है, क्षत्रिय-को युद्धमें विजय प्राप्त होती है, वैश्य धनसे सम्पन्न होता है और शूद्र अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त कर लेता है। उसे किसी भी अशुभ या अमङ्गलकी प्राप्ति नहीं होती तथा वह दीर्घायु होता है ॥ ३८-३९ ॥

सौतिरुवाच
इति पारिक्षितो राजा वैशम्पायनभाषितम् ।
श्रुतवानचलो भूत्वा हरिवंशं द्विजोत्तमाः ॥ ४० ॥
विप्रवरो ! इस प्रकार परीक्षित्‌के पुत्र राजा जनमेजय-ने स्थिरचित्त होकर वैशम्पायनके द्वारा कहे गये हरिवंशका श्रवण किया ॥ ४० ॥

एवं शौनक संक्षेपाद् विस्तरेण तथैव च।
प्रोक्ता वै सर्ववंशास्ते किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ४१ ॥
शौनक ! इस प्रकार मैंने संक्षेप और विस्तारके साथ सभी वंशोंका वर्णन किया है, अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ॥ ४१ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उदाहरणसमाप्तौ अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उदाहरणके प्रसंगकी समाप्तिविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२८ ॥

विष्णुपर्व सम्पूर्ण ॥ २ ॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

श्रीमहाभारतम्

तस्य खिलभागो हरिवंशः

( तत्र भविष्यपर्व )

प्रथमोऽध्यायः

जनमेजयकी संतति एवं पौरव तथा पाण्डववंशकी प्रतिष्ठाका वर्णन

नारायणं नमस्कृत्यं नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥

बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि श्रीनारायण (अथवा अन्तर्यामी नारायण), नर (नारायणसखा अर्जुन अथवा आदिजीव हिरण्यगर्भ) तथा नरोत्तम (इन हिरण्यगर्भ एवं अन्तर्यामीसे भी श्रेष्ठ शुद्ध सच्चिदानन्दघन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण) को और (इन नरनारायण तथा नरोत्तमके तत्त्वको प्रकट करनेवाली) देवी सरस्वतीको एवं (देवी सरस्वतीने संसारपर अनुग्रह करनेके लिये जिनके शरीरमें प्रवेश किया है, उन) व्यासजीको प्रणाम करके अविद्यारूपी अज्ञानान्धकारको जीतनेवाले इतिहास-पुराण आदि ग्रन्थोंका पाठ आरम्भ करे ॥

शौनक उवाच
जनमेजयस्य के पुत्राः पठ्यन्ते लोमहर्षणे ।
कस्मिन् प्रतिष्ठितो वंशः पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १ ॥

**शौनकजीने पूछा—**लोमहर्षणकुमार ! जनमेजयके पुत्र कौन और कितने कहे जाते हैं ? महात्मा पाण्डवोंका वंश किसपर प्रतिष्ठित हुआ ? ॥ १ ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ।
त्वत्तः कथयतः सर्वं वेद्म्यहं तत् परिस्रफुटम् ॥ २ ॥

मैं इसे सुनना चाहता हूँ, इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है। आपके बतानेसे मैं इन सब बातोंको स्पष्टरूपसे जान लूँगा ॥ २ ॥

सौतिरुवाच
पारीक्षितस्य काश्यायां द्वौ पुत्रौ सम्बभूवतुः ।
चन्द्रापीडश्च नृपतिः सूर्यापीडश्च मोक्षवित् ॥ ३ ॥

**सौतिने कहा—**शौनकजी ! परीक्षित्कुमार जनमेजयकी पत्नी काशिराजकन्या वपुष्टमाके गर्भसे दो पुत्र हुए। उनमेंसे एक थे चन्द्रापीड़, जो राजा हुए और दूसरेका नाम था सूर्यापीड़, जो मोक्षधर्मके ज्ञाता थे ॥ ३ ॥

चन्द्रापीडस्य पुत्राणां शतमुत्तमधन्विनाम् ।
जनमेजय इत्येतं क्षात्रं भुवि परिश्रुतम् ॥ ४ ॥

चन्द्रापीड़के सौ पुत्र हुए, जो उत्तम धनुर्धर थे। क्षत्रियोंका वह समुदाय जनमेजय (अथवा जानमेजय) के नामसे भूमण्डलमें विख्यात हुआ ॥ ४ ॥

तेषां श्रेष्ठस्तु राजासीत् पुरे वारणसाह्वये ।
सत्यकर्णो महाबाहुर्यज्वा विपुलदक्षिणः ॥ ५ ॥

उनमें सबसे बड़ा महाबाहु सत्यकर्ण था, जो हस्तिनापुरमें राजा हुआ। वह यज्ञ करनेवाला और उन यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाला था ॥ ५ ॥

सत्यकर्णस्य दायादः श्वेतकर्णः प्रतापवान् ।
अपुत्रः स तु धर्मात्मा प्रविवेश तपोवनम् ॥ ६ ॥

सत्यकर्णका पुत्र प्रतापी श्वेतकर्ण था, वह धर्मात्मा राजा श्वेतकर्ण पुत्रहीन होनेके कारण तपोवनमें चला गया ॥ ६ ॥

तस्माद् वनगताद् गर्भं यादवी प्रत्यपद्यत ।
सुचारोर्दुहिता सुभ्रूर्मानिनी भ्रातृमालिनी ॥ ७ ॥

वनमें जानेपर उनसे उनकी पत्नी मानिनीने, जो यदुकुलकी कन्या, सुचारुकी पुत्री, सुन्दर भौंहोंवाली तथा अनेक भ्राताओंकी बहिन थी, गर्भ धारण किया ॥ ७ ॥

स तु जन्मनि गर्भस्य श्वेतकर्णः प्रजेश्वरः ।
अन्वगच्छद् गतं पूर्वैर्महाप्रस्थानमच्युतम् ॥ ८ ॥

उस गर्भके जन्मकालमें राजा श्वेतकर्णने उस अच्युत महाप्रस्थानकी यात्रा की, जहाँ उनके पूर्वज पाण्डव जा चुके थे ॥ ८ ॥

सा दृष्ट्वा सम्प्रयातं तं मानिनी पृष्ठतोऽन्वयात् ।
पथि सा सुषुवे सुभ्रूवने राजीवलोचनम् ॥ ९ ॥

७५०श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

उन्हें जाते देख मानिनी भी गर्भिणी अवस्थामें ही उनके पीछे-पीछे चल दी। उस सुन्दर भौंहोंवाली रानीने मार्गमें ही एक वनके भीतर बालकको जन्म दिया, जिसके नेत्र कमलके समान सुन्दर थे ॥ ९ ॥

कुमारं तं परित्यज्य भर्तारं चान्वगच्छत ।
पतिव्रता महाभागा द्रौपदीव पुरा पतीन् ॥ १० ॥

जैसे पूर्वकालमें पतिव्रता महाभागा द्रौपदीने सब कुछ छोड़कर महाप्रस्थानके पथपर पाँचों पतियोंका अनुसरण किया था, उसी प्रकार मानिनी उस नवजात शिशुको छोड़कर पतिके पीछे चली गयी ॥ १० ॥

स तु राजकुमारोऽसौ गिरिकुञ्जे रुरोद ह ।
छायार्थं तस्य मेघास्तु प्रादुरासन् समन्ततः ॥ ११ ॥

वह राजकुमार पर्वतके कुञ्जमें पड़ा-पड़ा रोने लगा। उस समय उसपर छाया करनेके लिये चारों ओर मेघ प्रकट हो गये ॥ ११ ॥

अविष्ठायाश्च पुत्रौ द्वौपिप्पलादश्च कौशिकः ।
दृष्ट्वा कृपान्वितौ गृह्य तं प्रक्षालयतां जलैः ।
निघृष्टौ तस्य तौ पार्श्वौ शिलायां रुधिरप्लुतौ ॥ १२ ॥

अविष्ठाके दो पुत्र पिप्पलाद और कौशिकने उसे देखकर दयासे द्रवित हो उठा लिया और जलसे नहलाया। उस समय उस बालकके दोनों पार्श्वभाग पत्थरपर घिस जानेसे लहूलुहान हो रहे थे ॥ १२ ॥

अजश्यामौ तु पार्श्वौ तावुभावपि समाहितौ ।
तथैव तु समारूढौ अजपार्श्वस्ततोऽभवत् ॥ १३ ॥

उस बालकके वे दोनों पार्श्व बकरेके समान काले हो गये थे और उसी रूपमें वे हृष्टपुष्ट हो गये, इसलिये वह बालक अजपार्श्व नामसे विख्यात हुआ ॥ १३ ॥

ततोऽजपार्श्व इति तौ चक्राते तस्य नाम ह ।
स तु वेमकशालायां द्विजाभ्यामभिवर्धितः ॥ १४ ॥

इसीलिये पिप्पलाद और कौशिकने उसका नाम अजपार्श्व रखा और वेमकमुनिके घरमें उन दोनों ब्राह्मणोंने उसका पालन-पोषण किया ॥ १४ ॥

वेमकस्य तु भार्या तमुद्वहत् पुत्रकारणात् ।
वेमक्याः स तु पुत्रोऽभूद् ब्राह्मणौ सचिवौ च तौ ॥ १५ ॥

वेमककी पत्नी वेमकीने पुत्रके लिये उस बालकका विवाह कर दिया। वह बालक तथा उसके सहायक वे दोनों ब्राह्मण वेमकीके पुत्ररूपमें प्रसिद्ध हुए ॥ १५ ॥

तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च युगपत्‌तुल्यजीविनः ।
स एष पौरवो वंशः पाण्डवानां प्रतिष्ठितः ॥ १६ ॥

उन तीनोंके पुत्र और पौत्र एक ही कालमें हुए और समान कालतक जीवित रहे, इस प्रकार यह पौरव तथा पाण्डववंश भूतलमें प्रतिष्ठित हुआ ॥ १६ ॥

श्लोकोऽपि चात्र गीतोऽयं नाहुषेण ययातिना ।
जरासंक्रमणे पूर्वे भृशं प्रीतेन धीमता ॥ १७ ॥

पूर्वकालमें पुरूके शरीरमें अपनी वृद्धावस्थाका संचार करते समय अत्यन्त प्रसन्न हुए बुद्धिमान् नहुषकुमार ययातिने इस पौरववंशके विषयमें यह श्लोक भी गाया था—॥ १७ ॥

अचन्द्रार्कग्रहा भूमिर्भवेद्वापि न संशयः ।
अपौरवा न तु मही भविष्यति कदाचन ॥ १८ ॥

'यह सम्भव है कि कभी भूमि चन्द्रमा, सूर्य और ग्रहोंके प्रकाश एवं प्रभावसे रहित हो जाय, परंतु वह पौरववंशसे शून्य कभी नहीं होगी; इसमें संशय नहीं है' ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पाण्डववंशप्रतिष्ठाकीर्तने प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पाण्डववंशकी प्रतिष्ठाके कथनविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥


द्वितीयोऽध्यायः

राजा जनमेजयका अश्वमेध यज्ञ करनेका विचार, व्यासजीका आगमन और राजाद्वारा उनका सत्कार, आपने पाण्डवोंको राजसूय यज्ञ करनेसे क्यों नहीं रोका—यह जनमेजयका प्रश्न और उसके उत्तरमें व्यासजीद्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन

शौनक उवाच

उक्तोऽयं हरिवंशस्ते पर्वाणि निखिलानि च ।<br>यथा पुरोक्तानि तथा व्यासशिष्येण धीमता ॥ १ ॥तत् कथ्यमानममितमितिहाससमन्वितम् ।<br>प्रीणात्यस्मानमृतवत् सर्वपापविनाशनम् ॥ २ ॥
**शौनकने पूछा—**सूतनन्दन ! पूर्वकालमें व्यासजीके बुद्धिमान् शिष्य वैशम्पायनजीने जैसा वर्णन किया था, उसके अनुसार आपने यह हरिवंश और इसके सारे पर्व कह सुनाये ॥ १ ॥आपके मुखसे कहा जाता हुआ यह अनुपम ग्रन्थ, जो इतिहाससे युक्त और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है, हम लोगोंको अमृतके समान तृप्ति प्रदान करता है ॥ २ ॥

सुश्रूषाद्यतया धीर मनो ह्लादयतीव नः ।
जनमेजयस्तु नृपतिः श्रुत्वा चाख्यानमुत्तमम् ।

[ भविष्यपर्व ] द्वितीयोऽध्यायः ७५१


सौते किमकरोत् पश्चात् सर्पसत्रादनन्तरम् ॥ ३ ॥
धीर सूतकुमार ! सुखपूर्वक सुनने-सुनानेके योग्य होनेके कारण यह कथा हमारे मनको परम आह्लाद प्रदान करती है। इस। उत्तम आख्यानको सुनकर राजा जनमेजयने सर्पसत्रके पश्चात् कौन-सा कार्य किया ? ॥ ३ ॥

सौतिरुवाच
जनमेजयस्तु स नृपः श्रुत्वा चाख्यानमुत्तमम् ।
यदारभत् तदाख्यास्ये सर्पसत्रादनन्तरम् ॥ ४ ॥
सूतपुत्र उग्रश्रवाने कहा—शौनकजी ! यह उत्तम कथा सुनकर राजा जनमेजयने सर्पसत्रके पश्चात् जो कार्य आरम्भ किया, उसका वर्णन करता हूँ ॥ ४ ॥

तस्मिन् सत्रे समाप्तेऽथ राजा पारिक्षितस्तदा ।
यष्टुं स वाजिमेधेन सम्भारानुपचक्रमे ॥ ५ ॥
सर्पसत्र समाप्त होनेपर राजा जनमेजयने अश्वमेध यज्ञ करनेके लिये आवश्यक सामग्री जुटानी आरम्भ की ॥ ५ ॥

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यानाहूयेदमुवाच ह।
यक्ष्येऽहं वाजिमेधेन हय उत्सृज्यतामिति ॥ ६ ॥
फिर उन्होंने ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्यको बुलाकर इस प्रकार कहा—'मैं अश्वमेध यज्ञ करूँगा, आपलोग अश्व छोड़िये' ॥ ६ ॥

ततोऽस्य विज्ञाय चिकीर्षितं तदा
कृष्णो महात्मा सहसाऽऽजगाम ।
पारिक्षितं द्रष्टुमदीनसत्त्वं
द्वैपायनः सर्वपरावरज्ञः ॥ ७ ॥
जनमेजय क्या करना चाहते हैं, इस बातको जानकर उस समय सबके भूत और भविष्यको जाननेवाले महात्मा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, उदारचेता परीक्षित्कुमार जनमेजयसे मिलनेके लिये सहसा वहाँ आये ॥ ७ ॥

पारिक्षितस्तु नृपतिर्दृष्ट्वा तमृषिमागतम् ।
अर्घ्यपाद्यासनं दत्त्वा पूजयामास शास्त्रतः ॥ ८ ॥
उन महर्षिको आया देख राजा जनमेजयने अर्घ्य, पाद्य और आसन देकर शास्त्रविधिके अनुसार उनका पूजन किया॥

तौ चोपविष्टावभितः सदस्यास्तस्य शौनक ।
कथा बहुविधाश्चित्राश्चक्राते वेदसंहिताः ॥ ९ ॥
शौनक ! फिर वे दोनों यथायोग्य आसनोंपर बैठे। उनके आस-पास राजाके दूसरे सदस्य भी बैठ गये। तत्पश्चात् उन दोनोंने नाना प्रकारकी विचित्र कथाएँ एक दूसरेके प्रति कहीं, जो वेदोंमे वर्णित हैं ॥ ९ ॥

ततः कथान्ते नृपतिर्नोदयामास तं मुनिम् ।
पितामहं पाण्डवानामात्मनः प्रपितामहम् ॥ १० ॥
कथा वार्ताके अन्तमें राजा जनमेजयने पाण्डवोंके पितामह और अपने प्रपितामह मुनिवर व्याससे कहा—॥ १० ॥

महाभारतमाख्यानं बह्वर्थं श्रुतिविस्तरम् ।
निमेषमात्रमपि मे सुखश्राव्यतया गतम् ॥ ११ ॥
'महर्षे ! महाभारत नामक इतिहास अनेक अर्थोंसे भरा हुआ है; इसमें श्रुतियोंके अर्थका विस्तार है, फिर भी यह सुनने-सुनानेमें इतना सुखद है कि मेरा कई दिनोंका समय एक निमेषके समान बीत गया है ॥ ११ ॥

विभूतिविस्तारकरं सर्वेषां वै यशस्करम् ।
त्वया सुविहितं ब्रह्मञ्छङ्खे क्षीरमिवार्हितम् ॥ १२ ॥
'ब्रह्मन् ! यह इतिहास सबके लिये ऐश्वर्यका विस्तार करनेवाला और यशस्कर है, आपने इसकी इतनी सुन्दर रचना की है, मानो क्षीरसमुद्रको शङ्खमें भर दिया हो ॥ १२ ॥

अमृतेन तु तृप्तिः स्याद् यथा स्वर्गसुखेन च ।
तथा तृप्तिं न गच्छामि शृण्वेमां भारतीं कथाम् ॥ १३ ॥
'जैसे अमृत पीनेसे तृप्ति नहीं होती तथा जैसे स्वर्गीय सुखसे जी नहीं भरता है, उसी प्रकार इस भारती कथाको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ( अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ रही है ) ॥ १३ ॥

अनुमान्य तु सर्वज्ञं पृच्छामि भगवन्नहम् ।
हेतुः कुरूणां नाशस्य राजसूयो मतो मम ॥ १४ ॥
'भगवन् ! आप सर्वज्ञ हैं, मैं आपकी अनुमति लेकर कुछ पूछ रहा हूँ, मुझे ऐसा मालूम होता है कि-राजसूय यज्ञ ही कौरवोंके विनाशका कारण हुआ है ॥ १४ ॥

दुःसहानां यथा ध्वंसो राजन्यानामुपप्लवे ।
राजसूयं तथा मन्ये युद्धार्थमुपकल्पितम् ॥ १५॥
'महाभारतयुद्धमे जिस प्रकार दुःसह ( अजेय ) राजाओंका विनाश हुआ है, उसे देखते हुए मै यही मानता हूँ, राजसूयकी कल्पना युद्धके लिये ही हुई है ॥ १५ ॥

राजसूयस्तु सोमेन श्रूयते पूर्वमाहृतः ।
तस्यान्ते सुममहद् युद्धमभवत् तारकामयम् ॥ १६ ॥
'सुना जाता है कि पूर्वकालमे सोमने राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया था, उनके उस यज्ञके अन्तमें तारकामय नामक महान् युद्ध हुआ था ॥ १६ ॥

आहृतो वरुणेनाथ तस्यान्ते सुमहाक्रतोः ।
देव।सुरं महायुद्धं सर्वभूतक्षयावहम् ॥ १७ ॥
'तदनन्तर वरुणने वह यज्ञ किया, उनके उस महायज्ञके अन्तमें देवताओं और असुरोंके बीच बड़ा भारी संग्राम हुआ, जो सम्पूर्ण भूतोंका विनाश करनेवाला था ॥ १७ ॥

हरिश्चन्द्रश्च राजर्षिः क्रतुमेनमुपाहरत् ।
तत्राप्याडीवकं नाम युद्धं क्षत्रियनाशनम् ॥ १८ ॥