विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
सप्तमोऽध्यायः
विष्णुपर्व ] सप्तमोऽध्यायः २२१
पूतना नाम शकुनी घोरा प्राणिभयंकारी । भाजगामार्ड्ढरात्रे वै पक्षौ क्रोधाद् विधुन्वती ॥ २३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कुछ कालके बाद ब्रजमें आधी रातके समय क्रोधपूर्वक अपने दोनों पंख हिलाती हुई पक्षिणीका वेष धारण किये एक राक्षसी आयी। वह भोजराज कंसकी धाय थी, उसका नाम पूतना था। पूतना नामवाली वह घोर पक्षिणी समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर थी ॥ २२-२३ ॥
ततोऽर्धरात्रसमये पूतना प्रत्यदृश्यत । व्याघ्रगम्भीरनिर्घोषं व्याहरन्ती पुनः पुनः ॥ २४ ॥
आधी रातके समय जब पूतना दिखायी दी, उस समय वह व्याघ्रके दहाड़नेके-से गम्भीर घोषमें बारंबार गर्जना कर रही थी ॥ २४ ॥
निलिल्ये शकटस्याक्षे प्रस्रवोत्पीडवर्षिणी । ददौ स्तनं च कृष्णाय तस्मिन् सुप्ते जने निशि ॥ २५ ॥
वह मानवी स्त्रीका वेष धारण करके छकड़ेके धुरेके नीचे छिप गयी। उस समय उसके स्तनोंमें इतना दूध बढ़ आया था कि उनमें पीड़ा होने लगी थी, इसीलिये वह दूधकी वर्षा सी करने लगी। उस निशीथ-कालमें जब सब लोग सो गये थे, उसने कृष्णके मुखमें अपना स्तन दे दिया ॥ २५ ॥
तस्याः स्तनं पपौ कृष्णः प्राणैः सह विनद्य च । छिन्नस्तनी तु सहसा पपात शकुनी भुवि ॥ २६ ॥
लाल कन्हैया उस स्तनको उसके प्राणोंके साथ ही पी गया, उसका स्तन कट गया और वह पक्षिणी घोर चीत्कार करके सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २६ ॥
तेन शब्देन वित्रस्तास्ततो बुबुधिरे भयात् । स नन्दगोपो गोपा वै यशोदा च सुविक्लवा ॥ २७ ॥
उसके उस शब्दसे संत्रस्त होकर नन्दगोप, दूसरे-दूसरे गोप तथा अत्यन्त व्याकुल हुई यशोदा—ये सब के-सब भयके मारे जाग उठे ॥ २७ ॥
ते तामपश्यन् पतितां विसंज्ञां विपयोधराम् । पूतनां पतितां भूमौ वज्रेणेव विदारिताम् ॥ २८ ॥
उन्होंने देखा, पूतना पृथ्वीपर अचेत होकर पड़ी है। उसका स्तन कट गया है और वह ऐसी प्रतीत होती है, मानो वज्रसे विदीर्ण कर दी गयी हो ॥ २८ ॥
इदं किं त्विति संत्रस्ताः कस्येदं कर्म चेत्यपि । नन्दगोपं पुरस्कृत्य गोपास्ते पर्यवारयन् ॥ २९ ॥
यह क्या है ? किसका यह कर्म है ? ऐसी बातें करते हुए वे गोप भयभीत हो गये और नन्दजीको आगे करके पूतनाको घेरकर खड़े हो गये ॥ २९ ॥
नाध्यगच्छन्त च तदा हेतुं तत्र कदाचन । आश्चर्यमाश्चर्यमिति ब्रुवन्तोऽनुययुर्गृहान् ॥ ३० ॥
वे उस समय उस घटनाके कारणका पता कदापि न लगा सके और आश्चर्य है ! आश्चर्य है !! ऐसा कहते हुए अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ३० ॥
गतेषु तेषु गोपेषु विस्मितेषु यथागृहम् । यशोदां नन्दगोपस्तु पप्रच्छ गतसम्भ्रमः ॥ ३१ ॥
उन विस्मित हुए गोपोंके अपने-अपने घर चले जानेपर सम्भ्रमरहित हुए नन्दगोपने यशोदासे पूछा—॥ ३१ ॥
कोऽयं विधिर्न जानामि विस्मयो मे महानयम् । पुत्रस्य मे भयं तीव्रं भीरुत्वं समुपागतम् ॥ ३२ ॥
'विधाताका यह कैसा विधान है, यह मेरी समझमें नहीं आता। इस घटनासे मुझे महान् विस्मय हो रहा है। यहाँ मेरे पुत्रके लिये तीव्र भय उपस्थित हुआ है, जिससे हमलोगोंमें भीरुता आ गयी है' ॥ ३२ ॥
यशोदा त्वब्रवीद् भीता नार्य जानामि किंत्विदम् । दारकेण सहानेन सुप्ता शब्देन बोधिता ॥ ३३ ॥
यह सुनकर यशोदाने भयभीत होकर कहा—'आर्य ! मैं भी नहीं जानती कि यह क्या है ? मैं तो इस बच्चेके साथ सोयी थी। इस राक्षसीके चीत्कारसे ही जग गयी हूँ' ॥
यशोदायामजानन्त्यां नन्दगोपः सबान्धवः । कंसाद् भयं चकारोग्रं विस्मयं च जगाम ह ॥ ३४ ॥
जब यशोदाने भी अपनी अनभिज्ञता प्रकट की, तब बन्धु-बान्धवोंसहित नन्दगोप कंससे अत्यन्त भय मानने लगे और मन-ही-मन विस्मयको प्राप्त हुए ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां शकटभङ्गपूतनावधे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णकी बाललीलाके प्रसङ्गमें शकट-भङ्ग और पूतनाका वधविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः
श्रीकृष्ण और बलरामका ब्रजमें घुटनोंके बल चलना तथा श्रीकृष्णका उलूखलमें बँधकर यमलार्जुन-भङ्गकी लीला करना
वैशम्पायन उवाच
कृष्णसंकर्षणौ चोभौ रिङ्गिणौ समपद्यताम् ॥ १ ॥
काले गच्छति तौ सौम्यौ शास्तौ रूढतनामको ।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! कुछ काल
२५२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
बीतनेपर वे दोनों सौम्य बालक, जिनके नामकरण-संस्कार हो चुके थे और जो कृष्ण और संकर्षण नामसे प्रसिद्ध थे, घुटनों-के बल चलने-फिरने लगे ॥ १ ॥
तावन््योन्यगतौ बालौ बाल्यादेवैकतां गतौ।
एकमूर्तिधरौ कान्तौ बालचन्द्रार्कवर्चसौ ॥ २ ॥
बचपनसे ही वे दोनों बच्चे एक दूसरेमें अन्तर्भूत-से होकर एकताको प्राप्त हो गये थे। ऐसा जान पड़ता था कि ये दोनों एक ही शरीर धारण करते हैं। वे दोनों भाई बालचन्द्र और बालसूर्यके समान कान्तिमान् थे ॥ २ ॥
एकनिर्माणनिर्मुक्तावेकशय्यासनाशनौ ।
एकवेषधरावेकं पुष्यमाणौ शिशुव्रतम् ॥ ३ ॥
वे दोनों मानो एक ही साँचेके ढले थे (अथवा अभिन्न और जन्मरहित थे)। एक-सी शय्या, आसन और भोजन-का उपभोग करते थे। एक समान वेष धारण करते थे और एक ही शिशुव्रतका पालन करनेवाले थे ॥ ३ ॥
एककार्यान्तरगतावेकदेहौ द्विधाकृतौ ।
एकचर्यौ महावीर्यावेकस्य शिशुतां गतौ ॥ ४ ॥
वे एक ही कार्यमें संलग्न थे और एक ही शरीरके दो भागसे प्रतीत होते थे। उनकी दिनचर्या एक-सी थी। वे महा-पराक्रमी बालक एक ही पिताके शिशु थे ॥ ४ ॥
एकप्रमाणौ लोकानां देववृत्तान्तमानुषौ ।
कृत्स्नस्य जगतो गोपौ संवृत्तौ गोपदारकौ ॥ ५ ॥
लोगोंकी दृष्टिमें वे एक-जैसे कदके थे। उन्होंने देवताओं-के 'दुष्टदमन और धर्मस्थापन' रूप सिद्धान्तके पालनके लिये मानव-शरीर ग्रहण किया था। वे सम्पूर्ण जगत्के संरक्षक हो-कर भी गोपबालक बन गये थे ॥ ५ ॥
अन्योन्यव्यतिषक्ताभिः क्रीडाभिरभिशोभितौ ।
अन्योन्यकिरणग्रस्तौ चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ॥ ६ ॥
वे दोनों भाई एक दूसरेसे मिली हुई क्रीड़ाओंद्वारा सुशोभित होते थे, जैसे आकाशमें चन्द्रमा और सूर्य एक दूसरेकी किरणोंसे बँधकर एक साथ हो गये हों ॥ ६ ॥
विसर्पन्तौ तु सर्वत्र सर्पभोगभुजावुभौ ।
रेजतुः पांसुदिग्धाङ्गौ दृप्तौ कलभकाविव ॥ ७ ॥
उन दोनोंकी भुजाएँ सर्पोंके शरीरके समान जान पड़ती थीं। वे उनके द्वारा सब ओर चलते-फिरते और सरकते थे। उस समय धूलसे भरे हुए शरीरवाले वे दोनों भाई दर्पभरे दो हस्ति-शावकोंके समान शोभा पाते थे ॥ ७ ॥
क्वचिद् भस्मप्रदीप्ताङ्गौ करीषप्रोक्षितौ क्वचित् ।
तौ तत्र पर्यधावेतां कुमाराविव पावकौ ॥ ८ ॥
कहीं तो उनके दीप्तिमान् अङ्गोंमें राख लिपट जाती और कहीं वे करसी (कंडोंके चूर्ण)से नहा उठते थे। वे वहाँ अग्नि-के दो कुमार शाख और विशाखके समान सुशोभित होते हुए सब ओर दौड़ लगाते थे ॥ ८ ॥
क्वचिज्जानुभिरुद्घृष्टैः सर्पमाणौ विरेजतुः ।
क्रीडन्तौ वत्सशालासु शकृद्दिग्धाङ्गमूर्धजौ ॥ ९ ॥
कभी घिसे हुए घुटनोंके बल सरकते हुए श्रीकृष्ण-बलराम बड़ी शोभा पाते थे। कभी वे बछड़ोंके स्थानोंमें जाकर खेलने लगते और सारे अङ्गों तथा सिरके बालोंमें गो-बर लपेट लेते थे ॥ ९ ॥
शुशुभाते श्रिया जुष्टावानन्दजननौ पितुः ।
जनं च विप्रकुर्वाणौ विहसन्तौ क्वचित् क्वचित् ॥ १० ॥
कान्तिरूपिणी श्रीसे सेवित होकर वे दोनों भाई अनुपम शोभा पाते और पिताको आनन्द प्रदान करते थे। कभी-कभी बालस्वभाववश किसी-किसीके विपरीत कार्य कर बैठते और जोर-जोरसे हँसने लगते थे ॥ १० ॥
तौ तत्र कौतूहलिनौ मूर्धजन्याकुलेक्षणौ ।
रेजतुश्चन्द्रवदनौ दारकौ सुकुमारकौ ॥ ११ ॥
वे सदा क्रीड़ा-कौतूहलमें ही लगे रहते थे। उनके सिरके घुँघराले बाल नेत्रोंपर लटककर उन्हें व्याकुल एवं चञ्चल कर देते थे। उन दोनोंके मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर थे; अतः वे सुकुमार बालक बड़े सुहावने लगते थे ॥ ११ ॥
अतिप्रसक्तौ तौ दृष्ट्वा सर्वव्रजविचारिणौ ।
नाशकत् तौ वारयितुं नन्दगोपः सुदुर्मदौ ॥ १२ ॥
वे क्रीडामें ही आसक्त हो सारे व्रजमें विचरते रहते थे। उन दोनों अत्यन्त मतवाले बालकोंको सर्वत्र जाते देखकर भी नन्दगोप रोक नहीं पाते थे ॥ १२ ॥
ततो यशोदा संक्रुद्धा कृष्णं कमलोचनम् ।
आनाय्य शकटीमूले भर्त्सयन्ती पुनः पुनः ॥ १३ ॥
दाम्ना चैवोदरे बद्ध्वा प्रत्यबन्धदुलूखले ।
यदि शक्नोषि गच्छेति तमुक्त्वा कर्म साकरोत् ॥ १४ ॥
तत्र एक दिन यशोदा मैया अत्यन्त कुपित हो कमल-नयन श्रीकृष्णको एक गाड़ीके पास ले जाकर वारंवार डांटने-फटकारने लगी। इतना ही नहीं, उसने उनके पेट और कमर-में रस्सी बाँधकर उस रस्सीको ओखलीमें कस दिया और कहा—'अब जा सको तो जाओ।' इतना कहकर वह घरके काम-धंधोंमें लग गयी ॥ १३-१४ ॥
व्यग्रायां तु यशोदायां निर्जगाम ततोऽङ्कणात् ।
शिशुलीलां ततः कुर्वन् कृष्णो विस्मापयन् व्रजम् ।
सोऽङ्कणात्रिःसृतः कृष्णः कर्षमाण उलूखलम् ॥ १५ ॥
यमलाभ्यां प्रवृद्धाभ्यामर्जुनाभ्यां चरन् वने ।
मध्यान्निष्चक्राम तयोः कर्षमाण उलूखलम् ॥ १६ ॥
विष्णुपर्व ] सप्तमोऽध्यायः [ २३३
यशोदाके कार्यमें तत्पर होते ही लाला कन्हैया बाल-लीला करता और ब्रजके लोगोंको विस्मयमें डालता हुआ आँगनसे निकला। वह ओखलीको घसीटता हुआ वनकी ओर चला। मार्गमें एक साथ उत्पन्न हुए दो अर्जुनके वृक्ष थे, जो बहुत बड़े हो गये थे। कन्हैया अपनी ओखलीको खींचता हुआ उन्हीं दोनों वृक्षोंके बीचसे होकर निकला ॥ १५-१६ ॥
तत् तस्य कर्षतो बद्धं तिर्यग्गतमुलूखलम्।
लग्नं ताभ्यां समूलाभ्यामर्जुनाभ्यां चकर्ष च ॥ १७॥
खींचते हुए कन्हैयाके उदरसे बँधी हुई वह ओखली टेढ़ी होकर उन दोनों अर्जुन-वृक्षोंकी जड़में जा लगी और वहीं अटक गयी। फिर तो उसने उन वृक्षोंसहित ओखलीको जोर-से खींचा ॥ १७ ॥
तावर्जुनौ कृष्यमाणौ तेन बालेन रंहसा ।
समूलविटपौ भग्नौ स तु मध्ये जहास वै ॥ १८ ॥
निदर्शनार्थं गोपानां दिव्यं स्वबलमास्थितः ।
बालक कन्हैयाद्वारा वेगसे खींचे गये वे दोनों अर्जुनवृक्ष जड़ और शाखाओंसहित टूटकर गिर पड़े और वह अपने दिव्य बलका आश्रय ले गोपोंको दिखानेके लिये उन दोनों वृक्षोंके बीचमें खड़ा-खड़ा हँसने लगा ॥ १८३ ॥
तद्दाम तस्य बालस्य प्रभावादभवद् दृढम् ॥ १९ ॥
यमुनातीरमार्गस्था गोप्यस्तं ददृशुः शिशुम् ।
क्रन्दन्त्यो विस्मयन्त्यश्च यशोदां ययुरङ्गनाः ॥ २० ॥
उस बालकके प्रभावसे वह रस्सी और भी दृढ़ हो गयी। यमुनातीरके मार्गपर खड़ी हुई गोपियोंने जब बालकृष्णको उस अवस्थामें देखा, तब वे आश्चर्यचकित हो करुणक्रन्दन करती हुई यशोदाजीके पास गयीं ॥ १९-२० ॥
तास्तु सम्भ्रान्तवदना यशोदामूचुरङ्गनाः ।
एह्यागच्छ यशोदे त्वं सम्भ्रमात् किं विलम्बसे ॥ २१॥
यौ तावर्जुनवृक्षौ तु व्रजे सत्योपयाचनौ ।
पुत्रस्योपरि तावेतौ पतितौ ते महीरुहौ ॥ २२ ॥
उन सबके मुखपर घबराहट छायी हुई थी। उन गोपाङ्गनाओंने यशोदासे कहा—'यशोदाजी ! वेगसे आओ ! आओ !! सम्भ्रमके कारण तुम विलम्ब क्यों करती हो। ब्रजमें वे जो दोनों अर्जुनवृक्ष थे, जहाँ हमारी प्रत्येक याचना और मनौती सफल होती थी, वे दोनों वृक्ष तुम्हारे पुत्रके ऊपर गिर पड़े ॥ २१-२२ ॥
दृढेन दाम्ना तत्रैव बद्धो वत्स इवोदरे ।
जहास वृक्षयोर्मध्ये तव पुत्रः स बालकः ॥ २३ ॥
'जैसे बँधा हुआ बछड़ा हो, उसी प्रकार उदरमें मजबूत रस्सीसे बँधा हुआ तुम्हारा वह बालक उन वृक्षोंके बीचमें खड़ा-खड़ा हँस रहा था ॥ २३ ॥
उत्तिष्ठ गच्छ दुर्मेधे मूढे पण्डितमानिनि ।
पुत्रमानय जीवन्तं मुक्तं मृत्युमुखादिव ॥ २४ ॥
'अपनेको पण्डित माननेवाली मूढ़ दुर्बुद्धि यशोदे ! उठो। चलो हमारे साथ और अपने जीवित पुत्रको, जो मानो मौतके मुखसे बचकर निकला है, घर ले आओ' ॥ २४ ॥
सा भीता सहसोत्थाय हाहाकारं प्रकुर्वती ।
तं देशमगमद् यत्र पतितौ तावुभौ द्रुमौ ॥ २५ ॥
यशोदा भयभीत हो सहसा उठी और हाहाकार करती हुई उस स्थानपर गयी, जहाँ उसके लालाने उन दोनों वृक्षोंको धराशायी कर दिया था ॥ २५ ॥
सा ददर्श तयोर्मध्ये द्रुमयोरात्मजं शिशुम् ।
दाम्ना निबद्धमुदरे कर्षमाणमुलूखलम् ॥ २६ ॥
उसने अपने पुत्रको उन दोनों वृक्षोंके बीचमें खड़ा देखा, जो रस्सीसे पेटमें बँधी हुई ओखलीको अपनी ओर खींच रहा था ॥ २६ ॥
सगोपीगोपवृद्धश्च समुवाच व्रजस्तदा ।
पर्यागच्छन्त ते द्रष्टुं गोषेषु महदद्भुतम् ॥ २७ ॥
गोपियों और बड़े-बूढ़े गोपोंसहित सारे ब्रजमें उस समय इसी घटनाकी चर्चा होने लगी। गोपोंके यहाँ जो यह महान् और अद्भुत घटना घटित हुई थी, इसे देखनेके लिये चारों ओरसे लोग आने लगे ॥ २७ ॥
जजल्पुस्ते यथाकामं गोपा वनविचारिणः ।
केनेमौ पातितौ वृक्षौ घोषस्यायतनोपमौ ॥ २८ ॥
वनमें विचरनेवाले वे गोप अपनी इच्छाके अनुसार वहाँ आकर कहने लगे—'अहो ! ब्रजके ये दोनों वृक्ष देवमन्दिरके समान थे, इनको किसने गिरा दिया ॥ २८ ॥
विना वातं विना वर्षं विद्युत्प्रपतनं विना ।
विना हस्तिकृतं दोषं केनेमौ पातितौ द्रुमौ ॥ २९ ॥
'न आँधी चली, न वर्षा हुई, न बिजली गिरी और न किसी हाथीने ही आकर टक्कर मारी, इन सब दोषोंके बिना ही ये दोनों वृक्ष किसके द्वारा गिराये गये ॥ २९ ॥
अहो बत न शोभेतां विमूलवार्जुनद्विमौ ।
भूमौ निपतितौ वृक्षौ वितोयौ जलदाविव ॥ ३० ॥
'अहो ! जड़से अलग हो जानेके कारण पृथ्वीपर गिरे हुए ये दोनों अर्जुन वृक्ष जलहीन बादलोंके समान शोभारहित हो गये हैं ॥ ३० ॥
यदीमौ घोषरचितौ घोषकल्याणकारिणौ ।
नन्दगोप प्रसङ्गो ते द्रुमावेवं गतावपि ।
यच्च ते दारको मुक्तो विपुलाभ्यामपि क्षितौ ॥ ३१ ॥
'नन्दगोप ! यदि ये दोनों वृक्ष इस गोष्ठमें लगाये गये थे और समस्त घोषवासियोंका कल्याण करते थे तो आज
| २३४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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इस अवस्था में पहुँचकर भी ये दोनों आपपर प्रसन्न ही हैं, जिससे विशाल होनेपर भी इन वृक्षोंने पृथ्वीपर गिरते समय तुम्हारे बालकको जीवित छोड़ दिया है ॥ ३१ ॥
औत्पातिकमिदं घोषे तृतीयं वर्तते त्विह ।
पूतनाया विनाशश्च द्रुमयोः शकटस्य च ॥ ३२ ॥
'इस व्रजमें यह तीसरी बार औत्पातिक घटना हुई है। पूतनाका विनाश, छकड़ेका उलटना और वृक्षोंका धराशायी होना—ये तीन उपद्रव यहाँ हो चुके ॥ ३२ ॥
अस्मिन् स्थाने च वासोऽयं घोषस्यास्य न युज्यते ।
उत्पाता ह्यत्र दृश्यन्ते कथयन्तो न शोभनम् ॥ ३३ ॥
'इस स्थानपर हमारे इस व्रजका रहना अब उचित नहीं जान पड़ता; क्योंकि यहाँ अशुभ परिणामकी सूचना देनेवाले उत्पात दिखायी देने लगे हैं' ॥ ३३ ॥
नन्दगोपस्तु सहसा मुक्त्वा कृष्णमुलूखलात् ।
निवेश्य चाङ्के सुचिरं मृतं पुनरिवागतम् ॥ ३४ ॥
नातृप्यत् प्रेक्षमाणो वै कृष्णं कमलोचनम् ।
इतनेहीमें नन्दगोपने सहसा बन्धन खोलकर श्रीकृष्णको ओखलीसे मुक्त कर दिया और मानो वह बालक मरकर पुनः जी उठा हो, ऐसा मानते हुए वे देरतक उसे अपनी गोदमें चिपकाये रहे । उस समय वे कमलनयन श्रीकृष्णकी ओर देखते-देखते तृप्त नहीं होते थे ॥ ३४ १/२ ॥
ततो यशोदां गर्हन् वै नन्दगोपो विवेश ह ॥ ३५ ॥
स च गोपजनः सर्वो व्रजमेव जगाम ह ।
तदनन्तर नन्दगोप यशोदाकी निन्दा करते हुए घरमें गये, साथ ही अन्य सब गोप भी व्रजमें ही पधारे ॥ ३५ १/२ ॥
स च तेनैव नाम्ना तु कृष्णो वैदामबन्धनात् ।
गोष्ठे दामोदर इति गोपीभिः परिगीयते ॥ ३६ ॥
उस दाम अर्थात् रस्सीसे उदरमें बाँधे जानेके कारण श्रीकृष्णका नाम दामोदर हो गया । व्रजमें गोपियाँ उसी नामसे उनकी लीलाओंका गान करने लगीं ॥ ३६ ॥
एतदाश्चर्यभूतं हि बालस्यासीद् विचेष्टितम् ।
कृष्णस्य भरतश्रेष्ठ घोषे निवसतस्तदा ॥ ३७ ॥
भरतश्रेष्ठ ! व्रजमें निवास करते समय बालक कृष्णकी ऐसी ही आश्चर्यमयी लीलाएँ होती रहती थीं ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां यमलार्जुनभङ्गो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाललीलाके प्रसङ्गमें यमलार्जुनभङ्गविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः
श्रीकृष्ण-बलरामकी बालचर्या, श्रीकृष्णके द्वारा व्रजको अन्यत्र ले जानेकी चेष्टा और अपने शरीरसे भेड़ियोंको उत्पन्न करके उनका समूचे व्रजको डराना
वैशम्पायन उवाच
एवं तौ बाल्यमुत्तीर्णौ कृष्णसंकर्षणावुभौ ।
तस्मिन्नेव व्रजस्थाने सप्तवर्षौ बभूवतुः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! इस प्रकार श्रीकृष्ण और संकर्षण दोनों भाई उसी व्रजमें बाल्यावस्थाको पार करके सात वर्षके हो गये ॥ १ ॥
नीलपीताम्बरधरौ पीतश्वेतानुलेपनौ ।
बभूवतुर्वत्सपालौ काकपक्षाधरावुभौ ॥ २ ॥
इनमेंसे एक (बलराम) तो नील वस्त्र धारण करते थे और दूसरे (श्रीकृष्ण) पीत वस्त्र । दोनोंके चन्दन और अङ्गराग भी क्रमशः पीले और श्वेत थे । दोनों ही काकपक्ष धारण करते थे। अब वे दोनों भाई बछड़े चराने लगे ॥ २ ॥
पर्णवाद्यं श्रुतिसुखं वादयन्तौ वराननौ ।
शुशुभाते वनगतौ त्रिशीर्षाविव पन्नगौ ॥ ३ ॥
उन दोनोंके मुख बड़े सुन्दर थे। वे वनमें जाकर कानोंको सुख देनेवाले पत्तोंके बाजे (पिपीहरी या सीटी)* बजाते हुए तीन सिरवाले सर्पोंके समान शोभा पाते थे* ॥ ३ ॥
मयूराङ्गदकर्णौ तु पल्लवापीडधारिणौ ।
वनमालाकुलोरस्कौ द्रुमपोताविवोद्गतौ ॥ ४ ॥
मोरपङ्खके ही बाजूबंद और कर्णभूषण पहने तथा पत्तोंके ही मुकुट धारण किये वे दोनों भाई वृक्षके निकले
* ताड़ आदिके पत्तेको मोड़कर उसके सिरेपर छोटा-सा छेद रखकर उसे दोनों हाथसे पकड़े हुए बच्चे मुँहमें डालकर फूँकते हैं, उसमेंसे सीटी, बिगुल या बाँसुरी-जैसी आवाज निकलती है। उसे बजाते समय दोनों हाथ और सिर ऊँचाईपर रहते हैं। इसीकी सर्पके तीन सिरोंसे उपमा दी गयी है।
B. K. Mitra
श्रीकृष्ण और बलरामका वन-विहार (पृष्ठ-संख्या २३४)
अष्टमोऽध्यायः
विष्णुपर्व ] अष्टमोऽध्यायः २३५
हुए-नये पौधोंके समान दिखायी देते थे। उनका वक्षःस्थल वनमालासे व्याप्त था ॥ ४ ॥
अरविन्दकृतापीडौ रज्जुयज्ञोपवीतिनौ ।
सशिक्यतुम्बकरकौ गोपवेणुप्रवादकौ ॥ ५ ॥
कमलपुष्पोंके शिरोभूषण और रस्सीके यज्ञोपवीत धारण करके ये दोनों ग्वालबालोंके समान मुरली बजाया करते थे। उनके साथ छींका, तुम्बी और करक (करुआ या पुरवा) भी थे ॥ ५ ॥
क्वचिद्धसन्तावन्योन्यं क्रीडमानौ क्वचित् क्वचित् ।
पर्णशय्यासु संसुप्तौ क्वचिन्निद्रान्तरेक्षणौ ॥ ६ ॥
कहीं एक दूसरेकी ओर देखकर हँसते-हँसते, कहीं भाँति-भाँतिके खेल खेलते और कहीं पत्तोंके बिछौनोंपर सोकर आँखोंमें नींद भर लेते थे ॥ ६ ॥
एवं वत्सान् पालयन्तौ शोभयन्तौ महावनम् ।
चञ्चूर्यन्तौ रमन्तौ स्म किशोराविव चञ्चलौ ॥ ७ ॥
इस प्रकार बछड़े चराते, महावनकी शोभा बढ़ाते, वारंबार सब ओर चक्कर लगाते और चञ्चल गतिवाले अश्वशावकोंके समान वनमें विहार करते थे ॥ ७ ॥
अथ दामोदरः श्रीमान् संकर्षणमुवाच ह ।
आर्य नास्मिन् वने शक्यं गोपालैः सह क्रीडितुम् ॥ ८॥
अवगीतमिदं सर्वमवाप्ताभ्यां भुक्तकाननम् ।
प्रक्षीणतृणकाष्ठं च गोपैर्मथितपादपम् ॥ ९ ॥
तदनन्तर एक दिन शोभासम्पन्न दामोदर श्रीकृष्णने अपने भाई संकर्षणसे कहा—'आर्य ! अब इस वनमें ग्वाल-बालोंके साथ खेलना सम्भव नहीं है। हमलोगोंने इस सारे वनको अपने उपभोगमें लाकर इसकी शोभा-सम्पत्ति नष्ट कर दी है। यहाँकी घास चर ली गयी और काठ भी तोड़ लिये गये हैं। गोपोंने यहाँके एक-एक वृक्षको मथ डाला है ॥ ८-९ ॥
घनीभूतानि यान्यासन् काननानि वनानि च ।
तान्याकाशनिकाशानि दृश्यन्तेऽद्य यथाऽसुखम् ॥ १०॥
'जो वन और कानन सघन थे, वे अब आकाशके समान सूने दिखायी देते हैं। इन्हें देखकर अब सुख नहीं मिलता ॥
गोवाटेष्वाप ये वृक्षाः परिवृत्तार्गलेषु च ।
सर्वे गोष्ठाग्निषु गताः क्षयमक्षयवर्चसः ॥ ११ ॥
'जिनके फाटकोंमें गोलाकार कुंडे लगे हैं, उन गो-शालाओंमें भी अमित शोभावाले जो वृक्ष थे, वे सब गोष्ठकी आगमें जलकर नष्ट हो गये ॥ ११ ॥
संनिकृष्टानि यान्यासन् काष्ठानि च तृणानि च ।
तानि दूरावकृष्टानि मार्गितव्यानि भूमिषु ॥ १२ ॥
'जो तृण और काष्ठ बहुत निकट थे, वे दूरतककी जोती हुई भूमियोंमें अब ढूँढ़नेके योग्य रह गये हैं ॥ १२ ॥
अरण्यमिदमल्पोदमल्पकक्षं निराश्रयम् ।
अन्वेषितव्यविश्रामं दारुणं विरलद्रुमम् ॥ १३ ॥
'इस वनमें जल बहुत थोड़ा है, सूखे काठ और तृण भी बहुत कम हैं, यहाँ आश्रय लेनेयोग्य कोई स्थान नहीं है, यहाँ विश्रामके लिये भूमि खोजनी पड़ती है, विरले ही वृक्ष बच गये हैं, अतः इसकी बड़ी दारुण अवस्था हो गयी है ॥
अकर्मण्येषु वृक्षेषु स्थितविप्रस्थितद्विजम् ।
संवासस्यास्य महतो जनेनोत्सादिद्रुमम् ॥ १४ ॥
'यहाँके वृक्ष अब कामके नहीं रहे (इनमें फल-फूलका अभाव हो गया है)। इनपर जो पक्षी रहते थे, वे अब अन्यत्र प्रस्थान कर चुके हैं। इस विशाल बस्तीके लोगोंने यहाँके वृक्षोंको उजाड़ कर दिया है ॥ १४ ॥'
निरानन्दं निरास्वादं निष्प्रयोजनमारुतम् ।
निर्विहङ्गममिदं शून्यं निर्व्यञ्जनमिवाशनम् ॥ १५ ॥
'यहाँ कोई आनन्द नहीं रहा, फलोंका आस्वाद दुर्लभ हो गया। यहाँ वायुका चलना भी निष्फल है (क्योंकि न तो वह सुगन्ध देती है और न फल ही गिराती है—इन दोनों वस्तुओंका यहाँ सर्वथा अभाव है)। पक्षियोंसे रहित यह सूना वन बिना व्यञ्जनके भोजनकी भाँति अच्छा नहीं लगता ॥
विक्रीयमाणैः काष्ठैश्च शाकैश्च वनसम्भवैः ।
उच्छिन्नसंचयतृणैर्घोषोऽयं नगरायते ॥ १६ ॥
'यहाँके सूखे काठ और इस वनमें होनेवाले शाक प्रति-दिन बेचे जा रहे हैं। यहाँ जो ढेर-के-ढेर तृण थे, उनका उच्छेद हो गया; इससे यह घोष (ब्रज) नगरके समान जान पड़ता है ॥ १६ ॥
शैलानां भूषणं घोषो घोषाणां भूषणं वनम् ।
वनानां भूषणं गावस्तास्वास्माकं परा गतिः ॥ १७ ॥
'पर्वतोंका भूषण है घोष (गोष्ठ), घोषोंका भूषण है वन और वनोंका आभूषण हैं गौएँ। वे गौएँ ही हमलोगोंकी परम गति (सबसे बड़ा सहारा) हैं ॥ १७ ॥
तस्मादन्यद् वनं यामः प्रत्यग्रतृणसेन्धनम् ।
इच्छन्त्यनुपभुक्तानि गावो भोक्तुं तृणानि च ॥ १८ ॥
'अतः अब हम दूसरे वनमें चलें, जहाँ नयी-नयी घास और ईंधनकी अधिकता हो। हमारी गौएँ उन नयी-नयी घासोंको चरना चाहती हैं, जो अबतक चरी नहीं गयी हैं ॥ १८ ॥
तस्माद् वनं नवतृणं गच्छन्तु धनिनो व्रजाः ।
न द्वारबन्धावरणा न गृहक्षेत्रिणस्तथा ।
प्रशस्ता वै व्रजा लोके यथा वै चक्रचारिणः ॥ १९ ॥
'अतः जो व्रज धनसे सम्पन्न हों, वे उस वनमें चलें जहाँ नयी-नयी घास उपलब्ध हो। जिनमें दरवाजे बँध गये हैं
५३६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे.
और चारों ओरसे बाड़ लग गये हैं, जहाँ स्थायी घर बन गये और खेत कर लिये गये; ऐसे व्रज लोकमें अच्छे नहीं माने जाते । उन्मुक्त विचरनेवाले हंसोंके समान बन्धनरहित होकर विभिन्न स्थानोंमें घूमते रहनेवाले व्रज ही श्रेष्ठ हैं ॥ १९ ॥
शकृन्मूत्रेषु तेष्वेव जातक्षाररसायनम्।
न तृणं भुञ्जते गावो नापि तत् पयसे हितम् ॥ २० ॥
'उन्हीं गोबर-मूत्रोंके ढेरपर जो तृण पैदा होते हैं अथवा अन्यत्र पैदा हुए तृणोंपर जब गोबर-गोमूत्र पड़ जाते हैं, तब उनमें क्षार एवं रसायनके गुण आ जाते हैं; अतः गौएँ उन घासोंको चाहसे नहीं खाती हैं तथा वे तृण दूधके लिये भी हितकारी नहीं होते हैं ॥ २० ॥
स्थलीप्रायासु रथ्यासु नवांसु वनराजिषु ।
चरावः सहितौ गोभिः क्षिप्रं संवाह्यतां व्रजः ॥ २१ ॥
'आजकल इस वनकी सारी गलियाँ स्थल-सी हो गयी हैं। उनमें घास-फूँसका नाम भी नहीं रह गया है; अतः चलिये, हम दोनों गौओंके साथ नूतन वन-श्रेणियोंमें विचरें। अब शीघ्र ही यहाँसे व्रजको अन्यत्र ले जाना चाहिये ॥ २१ ॥
श्रूयते हि वनं रम्यं पर्याप्ततृणसंस्तरम्।
नाम्ना वृन्दावनं नाम स्वादुवृक्षफलोदकम् ॥ २२ ॥
'सुना जाता है कि वृन्दावन नामक वन बड़ा ही रमणीय है। वहाँ पर्याप्त घास फैली हुई है। वहाँके वृक्षोंमें स्वादिष्ट फल लगे हैं और वहाँका जल भी स्वादु है ॥ २२ ॥
अझिल्लिकण्टकवनं सर्वैर्वनगुणैर्युतम् ।
कदम्बपादपप्रायं यमुनातीरसंश्रितम् ॥ २३ ॥
'उस वनमें न झिल्लियाँ (झींगुर) हैं, न काँटे । उसमें सभी वनसम्बन्धी गुणोंका संयोग है । वहाँ अधिकतर कदम्बके वृक्ष हैं तथा वह वन यमुनाके तटपर ही स्थित है ॥
स्निग्धशीतानिलवनं सर्वर्तुनिलयं शुभम् ।
गोपीनां सुखसंचारं चारुचित्रवनान्तरम् ॥ २४ ॥
'उसमें सदा स्निग्ध एवं शीतल वायु चलती रहती है। वहाँ सभी ऋतुओंका निवास है। वह वन बड़ा सुन्दर एवं सुखद है। वहाँ गोपियाँ बड़े सुखसे सब ओर विचर सकती हैं । वृन्दावनके भीतरी भागमें और भी बहुत-से विचित्र एवं मनोहर वन हैं ॥ २४ ॥
तत्र गोवर्धनो नाम नातिदूरे गिरिर्महान् ।
भ्राजते दीर्घशिखरो नन्दनस्येव मन्दरः ॥ २५ ॥
'वहाँ गोवर्धन नामक महान् पर्वत है, जो उस वनसे अधिक दूर नहीं है। उसके बड़े-बड़े शिखर हैं। जैसे नन्दन-वनके पास मन्दराचलकी शोभा होती है, उसी प्रकार वृन्दावनके निकट गोवर्धन सुशोभित होता है ॥ २५ ॥
मध्ये चास्य महाशाखो न्यग्रोधो योजनोच्छ्रितः।
भाण्डीरो नाम शुशुभे नीलमेघ इवाम्बरे ॥ २६ ॥
'उस वनके मध्यभागमें विशाल शाखाओंसे सुशोभित एक बरगदका वृक्ष है, जो एक योजन ऊँचा है । उसका नाम है भाण्डीर वट । वह आकाशमें श्याम मेघके समान शोभा पाता है ॥ २६ ॥
मध्येन चास्य कालिन्दी सीमन्तमिव कुर्वती ।
प्रयाता नन्दनस्येव नलिनी सरितां वरा ॥ २७ ॥
'जैसे नन्दन वनके बीचमें सरिताओंमें श्रेष्ठ नलिनी प्रवाहित होती है, उसी प्रकार वृन्दावनके मध्यभागमें सीमन्त-सा बनाती हुई कालिन्दी बहती है ॥ २७ ॥
तत्र गोवर्धनं चैव भाण्डीरं च वनस्पतिम् ।
कालिन्दीं च नदीं रम्यां द्रक्ष्यावावश्चरतः सुखम् ॥ २८ ॥
'हमलोग वहाँ चलनेपर गोवर्धन पर्वत, भाण्डीर वट तथा रमणीय कालिन्दी नदीका सुखपूर्वक दर्शन करेंगे ॥ २८ ॥
तत्रायं कल्प्यतां घोषस्त्यज्यतां निर्गुणं वनम् ।
संत्रासयामो भद्रं ते किञ्चिदुत्पाद्य कारणम् ॥ २९ ॥
'वहीं चलकर इस व्रजको बसाया जाय और इस गुणहीन वनको छोड़ दिया जाय । मैया ! आपका भला हो, कोई नवीन कारण उत्पन्न करके हम इन व्रजवासियोंको डरावें' ॥
एवं कथयतस्तस्य वासुदेवस्य धीमतः ।
प्रादुर्बभूवुः शतशो रक्तमांसावसाशनाः ॥ ३० ॥
घोराश्चिन्तयतस्तस्य खतनूरूहजास्तदा ।
विनिष्पेतुर्भयकराः सर्वशः शतशो वृकाः ॥ ३१ ॥
बुद्धिमान् वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण ऐसा कह ही रहे थे कि उनके रोम-रोमसे सैकड़ों भयानक भेड़िये उत्पन्न होने लगे, जो रक्त, मांस और वसाका आहार करनेवाले थे । उनके चिन्तन करते ही सब ओर सैकड़ों भयंकर वृक निकल पड़े थे ॥ ३०-३१ ॥
निष्पतन्ति स्म बहवो व्रजस्योत्सादनाय वै ।
वृकान् निष्पतितान् दृष्ट्वा गोषु, वत्सेष्वथो नृषु ॥ ३२ ॥
गोपीषु च यथाकामं व्रजे त्रासोऽभवन्महान् ।
व्रजको वहाँसे उजाड़नेके लिये जब श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार बहुत-से भेड़िये प्रकट होने लगे, तब उन्हें देखकर गौओं, बछड़ों, मनुष्यों तथा गोपाङ्गनाओंमें अथवा यौं कहिये सम्पूर्ण व्रजमें महान् त्रास छा गया ॥ ३२॥
ते वृकाः पञ्चबद्धाश्च दशबद्धास्तथा परे ॥ ३३ ॥
त्रिंशद्विंशतिबद्धाश्च शतबद्धास्तथा परे ।
निश्चेरुरस्तस्य गात्रेभ्यः श्रीवत्सकृतलक्षणाः ॥ ३४ ॥
ये भेड़िये पाँच, दस, बीस, तीस तथा सौ-सौके झुंड बनाकर श्रीकृष्णके अङ्गोंसे निकल रहे थे । ये सभी श्रीवत्सके चिह्नसे सुशोभित थे ॥ ३३-३४ ॥
विष्णुपर्व ] नवमोऽध्यायः २३७
कृष्णस्य कृष्णवदना गोपानां भयवर्धनाः।
भक्षयद्भिश्च तैर्वत्सांस्त्रासयद्भिश्च गोव्रजान् ॥ ३५ ॥
निशि बालान् हरद्भिश्च वृकैरूत्साद्यते व्रजः।
श्रीकृष्णके अङ्गोसे प्रकट हुए वे काले मुखवाले वृक गोपोंका भय बढ़ा रहे थे। वे बछड़ोंको खा जाते, गौओंके झुंडोंको त्रास देते तथा रातमें बालकोंका अपहरण कर लेते थे। इस प्रकार भेड़ियोंद्वारा वह व्रज उजाड़ा जाने लगा ॥
न वने शक्यते गन्तुं न गाश्च परिरक्षितुम् ॥ ३६ ॥
न वनात् किंचिदाहर्तुं न च वा तरितुं नदीम् ।
उस समय वनमें जाना, गौओंकी रक्षा करना, वनसे कोई वस्तु ले आना अथवा नदीको पार करना असम्भव हो गया ॥ ३६३ ॥
त्रस्ता हृद्विग्नमनसो ऽगतास्तस्मिन् वने ऽवसन्॥ ३७॥
एवं वृकैरूदीर्णैस्तु व्याघ्रतुल्यपराक्रमैः।
व्रजो निष्पन्दचेष्टः स एकस्थानचरः कृतः ॥ ३८ ॥
वे सब-के-सब भयभीत थे, उनका चित्त उद्विग्न हो गया था। वे कहीं भी आ-जा न सके। डरके मारे केवल उस वनमें ही बैठे रहे। इस प्रकार बढ़े हुए व्याघ्रतुल्य पराक्रमी भेड़ियोंने सारे व्रजको निश्चेष्ट तथा एक स्थानमें ही सीमित रहनेवाला बना दिया ॥ ३७-३८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलेषु हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां वृकदर्शनेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाललीलाके प्रसङ्गमें वृकदर्शनविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥८॥
नवमोऽध्यायः
भेड़ियोंके उत्पातसे व्रजवासियोंका उस स्थानको छोड़कर श्रीवृन्दावनमें जाना
वैशम्पायन उवाच
एवं वृकांश्च तान् दृष्ट्वा वर्धमानान् दुरासदान् ।
सस्त्रीपुमान् स घोषो वै समस्तोऽमन्त्रयत् तदा ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! इस प्रकार उन दुर्जय भेड़ियोंको बढ़ते देख समस्त व्रजके स्त्री-पुरुष एकत्र हो उस समय इस प्रकार मन्त्रणा करने लगे—॥ १ ॥
स्थानेनेह न नः कार्यं व्रजामोऽन्यन्महद्वनम्।
यच्छिवं च सुखोष्यं च गवां चैव सुखावहम् ॥ २ ॥
'अब हमें इस स्थानपर रहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। हम लोग दूसरे किसी विशाल वनमें चले चलें, जो हमारे लिये कल्याणकारी, सुखपूर्वक रहने योग्य तथा गौओंके लिये भी सुखदायक हो ॥ २ ॥
अद्यैव किं चिरेण स्म व्रजामः सह गोधनैः।
यावद् वृकैर्वधं घोरं न नः सर्वो व्रजो व्रजेत् ॥ ३ ॥
'विलम्ब करनेसे क्या लाभ ? हम आज ही अपने गो-धनोंके साथ यहाँसे चल दें। भेड़ियोंसे हमारे सारे व्रजका भयंकर वध न हो जाय—इसके पहले ही हमें यहाँसे प्रस्थान कर देना चाहिये ॥ ३ ॥
एषां धूम्रारुणाङ्गानां दंष्ट्रिणां नखकर्षिणाम् ।
धृकाणां कृष्णवक्त्राणां बिभीमो निशि गर्जताम् ॥ ४ ॥
'इन भेड़ियोंके सारे अङ्ग धूमिल और लाल रंगके हैं, इनके बड़ी-बड़ी दाढ़ें हैं। ये नखोंसे ख्रकोट लेते हैं। इनके मुख काले हैं और रातके समय ये भीषण गर्जना करते हैं। हमें इनसे बड़ा भय लगता है ॥ ४ ॥
मम पुत्रो मम भ्राता मम वत्सोऽथ गौर्मम ।
वृकैर्व्यापादिता ह्येवं क्रन्दन्ति स्म गृहे गृहे ॥ ५ ॥
'घर-घरकी स्त्रियाँ करुणक्रन्दन करती हुई यों कहती हैं कि हाय ! इन भेड़ियोंने मेरे पुत्रको, मेरे भाईको, मेरे बछड़ेको और मेरी गायको मार डाला है' ॥ ५ ॥
तासां रुदितशब्देन गवां हुंभारवेण च ।
व्रजस्योत्थापनं चक्रुर्धोषवृद्धाः समागताः ॥ ६ ॥
उनके रोनेके शब्दसे और गायोंके रँभानेसे चिन्तित हो एकत्र हुए व्रजके वृद्ध पुरुषोंने व्रजको वहाँसे उठा देनेका ही निश्चय किया ॥ ६ ॥
तेषां मतमथाज्ञाय गन्तुं वृन्दावनं प्रति ।
व्रजस्य चिनिवेशाय गवां चैव हिताय च ॥ ७ ॥
वृन्दावननिवासाय ताञ्ज्ञात्वा कृतनिश्चयान् ।
नन्दगोपो वृहद्वाक्यं बृहस्पतिरिवाददे ॥ ८ ॥
जब नन्दजीने वृन्दावनमें जानेके लिये उनके मतको जान लिया तथा व्रजको नयी जगह बसाने एवं गौओंके हितके लिये वृन्दावनमें निवास करनेके निमित्त उन सबके दृढ़ निश्चयको समझ लिया, तब वे बृहस्पतिके समान यह महत्त्वपूर्ण वचन बोले—॥ ७-८ ॥
अद्यैव निश्चयप्राप्तिर्यदि गन्तव्यमेव नः।
शीघ्रमाज्ञाप्यतां घोषः सज्जीभवत मा चिरम् ॥ ९ ॥
'यदि यह बात निश्चित हो गयी और हमें जाना ही होगा तो आज ही यात्रा कर देनी चाहिये। शीघ्र ही सारे व्रजमें यह आदेश दे दिया जाय कि तुम सब लोग शीघ्र ही यहाँसे प्रस्थानके लिये तैयार हो जाओ, देर न करो' ॥९॥
२३८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
ततोऽवघुष्यत तदा घोषे तत् प्राकृतैर्जनैः। शीघ्रं गावः प्रकल्प्यन्तां भाण्डं समभिरोप्यताम्॥ १०॥ वत्सयूथानि काल्यन्तां युज्यन्तां शकटानि च। वृन्दावनमितः स्थानान्निवेशाय च गम्यताम्॥ ११॥ फिर तो प्राकृत जनोंद्वारा ब्रजमें यह घोषणा करा दी गयी कि 'ब्रजवासियो ! शीघ्र ही गौओंको तैयार कर लो। अपने बर्तन-भाँड़ोंको छकड़ोंपर लाद लो। बछड़ोंके समूहोंको अभी हाँक दो। गाड़ियाँ जोतो और यहाँसे वृन्दावनमें रहनेके लिये प्रस्थान करो' ॥ १०-११॥
तच्छ्रुत्वा नन्दगोपस्य वचनं साधु भाषितम्। उदतिष्ठद् व्रजः सर्वः शीघ्रं गमनलालसः॥ १२॥ नन्दगोपका कहा हुआ यह उत्तम वचन सुनकर सारे ब्रजके लोग जानेके लिये उत्सुक हो शीघ्र ही उठ खड़े हुए ॥ १२॥
प्रयाह्युत्तिष्ठ गच्छामः किं शेषे याहि योजय। उत्तिष्ठति व्रजे तस्मिन् गोपकोलाहलो ह्यभूत्॥ १३॥ इस प्रकार जब वह ब्रज वहाँसे उठने लगा, तब गोपोंका कोलाहल इस तरह सुनायी देने लगा—'अरे! चलो, उठो, हम सब लोग चल रहे हैं, क्या सो रहे हो, जाओ, छकड़ा जोतो' ॥ १३॥
उत्तिष्ठमानः शुशुभे शकटीशकटस्तु सः। व्याघ्रघोषमहाघोषो घोषः सागरघोषवान्॥ १४॥ गाड़ियों और छकड़ोंसे युक्त वह ब्रज जब वहाँसे उठकर चला, उस समय ऐसा भयंकर कोलाहल हुआ, मानो वहाँ व्याघ्रोंके दहाड़नेकी भारी आवाज हो रही हो अथवा समुद्रकी गर्जना सुनायी देती हो ॥ १४॥
गोपीनां गर्गरीभिश्च मूर्ध्नि चोत्तम्भितैर्घटैः। निष्पपात व्रजात् पंक्तिस्तारापंक्तिरिवाम्बरात्॥ १५॥ सिरपर माट और घड़े उठाये गोपियोंकी पंक्ति जब ब्रज-से निकली, उस समय ऐसा जान पड़ा, मानो आकाशसे ताराओंकी पाँत उतर आयी हो ॥ १५॥
नीलपीतारुणैस्तासां वस्त्रैरग्रस्तनोच्छ्रितैः। शक्रचापायते पंक्तिर्गोपीनां मार्गगामिनी॥ १६॥ उनके नीले, पीले और लाल वस्त्र स्तनोंके अग्रभागपर ऊँचे दिखायी देते थे। उन वस्त्रोंसे सुशोभित हो मार्गपर चलती हुई गोपियोंकी पंक्ति इन्द्रधनुषके समान शोभा पाती थी॥ १६॥
दामनीदामभारैश्च केचित् कायावलम्बिभिः। गोपा मार्गगता भान्ति सावरोहा इव द्रुमाः॥ १७॥ कुछ गोप मोटी और पतली रस्सियोंके बोझ लिये मार्ग-में चल रहे थे। वे रस्सियाँ उनके अङ्गोंपर लटक रही थीं। उनसे उपलक्षित होनेवाले वे गोप, बरोहोंसे युक्त वटवृक्षके समान प्रतीत होते थे॥ १७॥
स व्रजो व्रजता भाति शकटौघेन भास्वता। पोतैः पवनविक्षिप्तैर्निष्पतद्भिरिवार्णवः॥ १८॥ आगे बढ़ते हुए शोभाशाली शकटोंके समूहसे उस ब्रज-की ऐसी शोभा हो रही थी, मानो पवनकी प्रेरणासे वेगपूर्वक चलते हुए असंख्य जलपोतों (जहाजों) से युक्त महासागर सुशोभित हो रहा हो ॥ १८॥
क्षणेन तद् व्रजस्थानमीरिणं समपद्यत। द्रव्यावयवनिर्धूतं कीर्णं वायसमण्डलैः॥ १९॥ एक ही क्षणमें ब्रजका वह स्थान ऊसरभूमिके समान सूना हो गया। वहाँ जो अन्न आदि द्रव्योंके कण बिखरे हुए थे, उनके कारण उस स्थानपर कौओंकी मण्डली छा गयी थी॥ १९॥
ततः क्रमेण घोषः स प्राप्तो वृन्दावनं वनम्। निवेशं विपुलं चक्रे गवां चैव हिताय च॥ २०॥ तदनन्तर क्रमशः आगे बढ़ता हुआ वह ब्रज वृन्दावन-में जा पहुँचा और गौओंके हितके लिये बहुत दूरतक फैलकर बस गया ॥ २०॥
शकटावर्त्तपर्यन्तं चन्द्राद्धाकारसंस्थितम्। मध्ये योजनविस्तीर्णं तावद्द्विगुणमायतम्॥ २१॥ सीमापर छकड़ोंके बाड़ लगा दिये गये। सारा ब्रज अर्धचन्द्रकी आकृतिमें स्थित हो गया। बीचके भूभागकी चौड़ाई एक योजन और लंबाई दो योजनकी थी॥ २१॥
कण्टकीभिः प्रवृद्धाभिस्तथा कण्टकिद्रुमैः। निखातोच्छ्रितशाखाग्रैरभिगुप्तं समन्ततः॥ २२॥ बढ़ी हुई कण्टकी (नीलकौंटे आदि) तथा शाखाग्रभाग-को ऊँचे रखकर गाड़े गये काँटेदार वृक्षोंके द्वारा वह ब्रज चारों ओरसे सुरक्षित था ॥ २२॥
मन्थैरारोप्यमाणैश्च मन्थबन्धानुकर्षणैः। अद्भिः प्रक्षाल्यमानाभिर्गर्गरीभिरितस्ततः॥ २३॥ कीलैरारोप्यमाणैश्च दामनीपाशपाशितैः। स्तम्भनीभिर्धृताभिश्च शकटैः परिवर्तितैः॥ २४॥ नियोगपाशैरासक्तैर्गर्गरीस्तम्भमूर्धसु। छादनार्थं प्रकीर्णैश्च कटकैस्तृणसंकटैः॥ २५॥ शाखाविटङ्कैर्वृक्षाणां क्रियमाणैरितस्ततः। शोध्यमानैर्गवां स्थानैः स्थाप्यमानैरुलूखलैः॥ २६॥ प्राङ्मुखैः सिच्यमानैश्च संदीप्त्यद्भिश्च पावकैः। सवत्सचर्मास्तरणैः पर्यङ्कैश्चावरोपितैः॥ २७॥ तोयमुत्तारयन्तीभिः प्रेक्षन्तीभिश्च तद् वनम्। शाखाश्चाकर्षमाणाभिर्गोपीभिश्च समन्ततः॥ २८॥
विष्णुपर्व ] दशमोऽध्यायः २३९
युवभिः स्थविरैश्च गोपैर्व्यग्रकरैर्भृशम् ।
विशसद्भिः कुठारैश्च काष्ठान्यपि तरूनपि ॥ २९ ॥
तद् व्रजस्थानमधिकं शुशुभे काननावृतम् ।
रम्यं वननिवेशं वै स्वादुमूलफलोदकम् ॥ ३० ॥
कहीं दही-दूधके माटोंमें मथानी डाली जा रही थी, कहीं मथानीमें बँधी हुई रस्सी खींची जाती थी, कहीं इधर-उधर गगरियों या माटोंको जलसे धोया जाता था, कहीं कील या खूँटे गाड़े जाते थे, जिनमें मोटी-पतली रस्सियाँ बँधी होती थीं; कहीं बहुत-से खम्भे खड़े किये जा रहे थे, कहीं छकड़े घुमाये जाते थे, कहीं मन्थनपात्र या माटमें डाले गये थम्भके सिरेपर रस्सियाँ बाँधी जाती थीं, कहीं घर छानेके लिये संचित चटाइयाँ तथा तिनकोंके समूह बिखरे पड़े थे, कहीं यत्र-तत्र वृक्षोंकी शाखाओंपर पक्षियोंके रहने योग्य स्थान बनाये जाते थे, कहीं गौओंके रहनेयोग्य स्थानोंकी शोध हो रही थी, कहीं ओखलियाँ रखी जाती थीं, उन्हें पूर्वाभिमुख करके धोया जा रहा था, कहीं आग जलायी जाती थी, कहीं छकड़ोंपरसे (अपनी मौतसे मरे हुए) बछड़ोंके चर्मसे निर्मित बिछौनोंसहित पलंग उतारे जा रहे थे, कहीं गोपियाँ अपने सिरसे जलका घड़ा उतारती हुई उस वनकी शोभा देखती थीं, कुछ गोपाङ्गनाएँ सब ओर घूम-घूमकर वृक्षोंकी डालियाँ खींच रही थीं, क्या बूढ़े, क्या जवान, सभी गोपोंके हाथ कार्यमें अत्यन्त व्यस्त थे, वे कुठारोंसे काठ और वृक्षोंको भी काट रहे थे। इन सबके कारण वनसे घिरा हुआ वह व्रजका स्थान अधिक शोभा पा रहा था। वृन्दावनका वह रमणीय प्रदेश स्वादिष्ट फल, मूल और जलसे सम्पन्न था ॥ २३-३० ॥
तास्तु कामदुघा गावः सर्वपक्षिरुतं वनम् ।
वृन्दावनमनुप्राप्ता नन्दनोपमकाननम् ॥ ३१ ॥
व्रजकी वे सभी कामधेनु गौएँ समस्त पक्षियोंके कलरवोंसे मुखरित और नन्दन-सदृश काननोंसे युक्त वृन्दावनमें पहुँच गयीं ॥ ३१ ॥
पूर्वमेव तु कृष्णेन गवां वै हितकारिणा ।
शिवेन मनसा दृष्टं तद् वनं वनचारिणा ॥ ३२ ॥
वनमें विचरनेवाले, गौओंके हितकारी श्रीकृष्णने पहले ही अपने मनसे कल्याणचिन्तनपूर्वक उस वनको देखा था ॥ ३२ ॥
पश्चिमे तु ततो रूक्षे घर्मे मासे निरामये ।
वर्षतीवामृतं देवे तृणं तत्र व्यवर्धत ॥ ३३ ॥
अतः यद्यपि उस समय बहुत ही रूखे गर्मीके महीनेका अन्तिम भाग (आषाढ़) बीत रहा था, तो भी वहाँ घास-पात बहुत बढ़ने लगा, मानो इन्द्रदेव वहाँ अमृतकी वर्षा कर रहे हों ॥ ३३ ॥
न तत्र वत्साः सीदन्ति न गावो नेतरे जनाः ।
यत्र तिष्ठति लोकानां भवाय मधुसूदनः ॥ ३४ ॥
जहाँ भगवान् मधुसूदन सम्पूर्ण विश्वके हितके लिये विराजमान थे, उस वृन्दावनमे न तो बछड़े कभी शिथिल होते थे, न गौएँ कष्ट पाती थीं और न दूसरे ही लोगोंको कभी दुःखका अनुभव होता था ॥ ३४ ॥
ताश्च गावः स घोषस्तु स च संकर्षणो युवा ।
कृष्णेन विहितं वासं तमध्यासत निर्वृताः ॥ ३५ ॥
वे गौएँ, वह व्रज तथा वे तरुण वीर बलरामजी सब-के-सब श्रीकृष्णद्वारा विहित उस निवासस्थानमें बड़े आनन्दसे रहने लगे ॥ ३५ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वृन्दावनप्रवेशे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीवृन्दावन-प्रवेशविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
दशमोऽध्यायः
वर्षा ऋतुका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
तौ तु वृन्दावनं प्राप्तौ वसुदेवसुतावुभौ ।
चेरतुर्वत्सयूथानि चारयन्तौ सुरूपिणौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वृन्दावनमें पहुँचकर वसुदेवजीके वे दोनों पुत्र, जो बहुत ही सुन्दर थे, बछड़ोंके झुंडोंको चराते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे ॥ १ ॥
पूर्णस्तु घर्मसमयस्तयोस्तत्र वने सुखम् ।
क्रीडतोः सह गोपालैर्यमुनां चावगाहतोः ॥ २ ॥
वृन्दावनमे रहकर ग्वाल-बालोंके साथ क्रीडा और यमुना-स्नान करते हुए उन दोनों भाइयोंका ग्रीष्म-मास सुखपूर्वक बीत गया ॥ २ ॥
ततः प्रावृडनुप्राप्ता मनसः कामदीपिनी ।
प्रववर्षुर्महामेघाः शक्रचापाङ्कितोदराः ॥ ३ ॥
तदनन्तर मनकी कामनाको उद्दीपित करनेवाली वर्षा ऋतु आ पहुँची। मेघोंकी भारी घटा घिर आयी और वर्षा करने लगी। उन मेघोंके मध्यभाग इन्द्रधनुषसे अङ्कित दिखायी देते थे ॥ ३ ॥
२४० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
बभूवादर्शनः सूर्यो भूमिश्चादर्शना तृणैः ।
पतता मेघवातेन नवतोयानुकर्षिणा ॥ ४ ॥
सम्प्रमार्जिततला भूमियोंवनस्थेव लक्ष्यते ॥ ५ ॥
(मेघोंकी आड़में छिपे हुए) सूर्यका दर्शन नहीं हो पाता था। घास इतनी बढ़ गयी कि धरती भी अदृश्य हो गयी। नूतन जलराशिको खींच लानेवाले मेघरूपी वायुने भूतलको झाड़-बुहार और धोकर साफ कर दिया। उस समय भूमि ऐसी दिखायी देती थी, मानो उसकी युवावस्था आ गयी हो ॥ ४-५ ॥
नववर्षावसिकानि शक्रगोपकुलानि च ।
नष्टदावाग्निधूमानि वनानि प्रचकाशिरे ॥ ६ ॥
इन्द्रगोप नामक कीट नूतन वर्षाके जलसे भींग रहे थे। वनप्रान्तके दावानल और धूम नष्ट हो गये थे, इससे उन वनोंकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ६ ॥
नृत्यव्यापारकालश्च मयूराणां कलापिनाम् ।
मदरक्ताः प्रवृत्ताश्च केकाः पटुरवास्तथा ॥ ७ ॥
बड़े-बड़े पंखों (कलापों) से विभूषित मयूरोंके नृत्य-व्यापारका समय आ पहुँचा था; अतः उनकी मदमत्त दशाकी मधुर वाणी बड़ी पटुताके साथ श्रवणगोचर होती थी ॥ ७ ॥
नवप्रावृषि कान्तानां षट्पदाहारदायिनाम् ।
यौवनस्थकदम्बानां नवाभ्रैर्भ्राजते वपुः ॥ ८ ॥
नूतन वर्षा में जिनकी कमनीयता बढ़ गयी है, जो भ्रमरोंको आहार प्रदान करते तथा युवावस्थामें आ पहुँचे हैं, उन कदम्ब-वृक्षोंका आकार नये बादलोंके आनेसे अधिक शोभा पाने लगा ॥ ८ ॥
हासितं कुटजैर्वृक्षैः कदम्बैर्वासितं वनम् ।
नाशितं जलदैरुष्णं तोषिता वसुधा जलैः ॥ ९ ॥
कुटजके वृक्षोंने अपने फूलोंसे वहाँ सब ओर हास्यकी छटा छिटका दी। कदम्बोंने उस वनमें सुगन्ध भर दी। बादलोंने गर्मी मिटा दी और जलकी धाराओंने वसुधाको पूर्णतः तृप्त कर दिया ॥ ९ ॥
संतप्ता भास्करकरैरभितप्ता दवाग्निभिः ।
जलैर्वलाहकोत्सृष्टैरुच्छ्वसन्तीव पर्वताः ॥ १० ॥
जो सूर्यकी किरणोंसे संतप्त तथा दावानलसे दग्ध हो गये थे, वे पर्वत मेघोंके बरसाये हुए जलसे अभिषिक्त हो पुनः साँस-सी लेने लगे ॥ १० ॥
महावातसमुद्धूतं महामेघगणार्पितम् ।
महीमहाराजपुरैस्तुल्यमापद्यते नभः ॥ ११ ॥
उठी हुई प्रचण्ड वायु पताकाके समान फहरा रही थी। बड़े-बड़े मेघोंके समुदाय प्रासादों (महलों) के समान प्रतीत होते थे। इस प्रकार आकाश भूतलके महाराजोंके नगरके समान स्वरूप धारण किये था ॥ ११ ॥
क्वचित् कदम्बहासाढ्यं शिलीन्ध्राभरणं क्वचित् ।
सम्पदीप्तमिवाभाति फुल्लनीपद्रुमं वनम् ॥ १२ ॥
कहीं कदम्बका विकास हासकी-सी छटा बिखेर रहा था। कहीं भुँइफोड़ या गोबर-छत्ता आभूषणके समान शोभा देता था। जगह-जगह नीपके वृक्ष खिले हुए थे। इन सबके कारण वृन्दावन अत्यन्त दीप्तिमान्-सा प्रतीत होता था ॥ १२ ॥
ऐन्द्रेण पयसा सिक्तं मारुतेन च विस्तृतम् ।
पार्थिवं गन्धमाघ्राय लोकः क्षुभितमानसः ॥ १३ ॥
इन्द्रदेवके बरसाये हुए जलसे अभिषिक्त तथा वायुसे विस्तारको प्राप्त हुई पृथ्वीकी सोंधी सुगन्ध सूँघकर लोगोंका मन क्षुब्ध (कामविकारसे युक्त) हो उठता था ॥ १३ ॥
दृप्तसारङ्गनादेन दर्दुरव्याहृतेन च ।
नैवैश्च शिखिविक्षुब्धैरवकीर्णा वसुन्धरा ॥ १४ ॥
मत्तवाले भ्रमरोंके गुंजारव, मेढकोंकी ध्वनि तथा मोरोंकी नूतन केकावाणीसे वहाँकी भूमि गूँज रही थी ॥ १४ ॥
भ्रमतूर्णमहावर्ता वर्षप्राप्तमहारयाः ।
हरन्त्यस्तीरजान् वृक्षान् विस्तारं यान्ति निम्नगाः ॥ १५ ॥
नदियोंमें तीव्र गतिसे बड़ी-बड़ी भँवरें उठ रही थीं। वर्षाके कारण उनका वेग महान् हो गया था। वे तटवर्ती वृक्षोंको बहा ले जाती थीं और क्रमशः विस्तारको प्राप्त हो रही थीं ॥ १५ ॥
संततासारनिर्यत्नाः क्लिन्नयलोत्तरच्छदाः ।
न त्यजन्ति नगाग्राणि श्रान्ता इव पतत्रिणः ॥ १६ ॥
निरन्तर जलकी धारा बरसनेके कारण जो उड़नेके प्रयत्नमें असफल हो गये थे, जिनके ऊपरी पंख शिथिल-प्रयास होकर काम नहीं दे पाते थे, वे पक्षी थके-माँदेके समान वृक्षोंकी शाखाओंको छोड़ नहीं रहे थे ॥ १६ ॥
तोयगम्भीरलम्बेषु स्रवत्सु च नदत्सु च ।
उदरेषु नवाभ्राणां मज्जतीव दिवाकरः ॥ १७ ॥
सूर्यदेव नूतन जलधारोंके उदरोंमें, जो जलके कारण सघन और फैले हुए थे तथा वर्षाके साथ गर्जना भी करते थे, डूबते-से जा रहे थे ॥ १७ ॥
महीरुहैरूत्पतितैः सलिलोत्पीडसंकुला ।
अन्विष्यमार्गा वसुधा भाति शाद्वलमालिनी ॥ १८ ॥
भूमि एक तो घाससे ढकी हुई थी, दूसरे जलके प्रवाहमें डूब गयी थी, रास्तोंका पता चलना कठिन हो गया था, मगोंके किनारे उगे हुए वृक्षोंसे ही उन मार्गोंको ढूँढ़ा या पाया जा सकता था ॥ १८ ॥
विष्णुपर्व ] दशमोऽध्यायः २४१
वज्रेणेवावरुग्णानां नगानां नगशालिनाम् ।
स्रोतोभिः परिकृत्तानि पतन्ति शिखराण्युधः ॥ १९ ॥
वृक्षोंसे सुशोभित होनेवाले पर्वतोंके शिखर जलके स्रोतोंसे कटकर नीचे गिर रहे थे; ऐसा जान पड़ता था, मानो वे पर्वत वज्रके प्रहारसे विदीर्ण हो गये हों ॥ १९ ॥
पतता मेघवर्षेण यथा निम्नानुसारिणा ।
पल्वलोत्कीर्णमुक्तेन पूर्यन्ते वनराजयः ॥ २० ॥
मेघोंकी वर्षाका जल नीचे गिरकर नीची भूमिका अनुसरण करता हुआ गड्ढेमें जाता था । उसके भर जानेपर उससे निकलकर बाहर फैलता था और सारी वन-श्रेणियोंको आप्लावित कर देता था ॥ २० ॥
हस्तोच्छ्रितमुखा वन्या मेघनादानुसारिणः ।
भ्रान्तातिवृष्ट्या मातङ्गा गां गता इव तोयदाः ॥ २१ ॥
अत्यन्त वर्षासे भ्रान्त हुए जंगली हाथी सूँड और मुँहको ऊपर उठाये मेघकी गर्जनाका अनुकरण करते (गर्जते ) थे । उस समय वे पृथ्वीपर उतरे हुए मूर्तिमान् मेघके समान जान पड़ते थे ॥ २१ ॥
प्रावृट्प्रवृत्तिं संदृश्य दृष्ट्वा चाम्बुधरान् घनान् ।
रौहिणेयो मिथः काले कृष्णं वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥
वर्षा ऋतु आ गयी और आकाशमें बादल घिर आये; यह देखकर रोहिणीनन्दन बलरामजीने श्रीकृष्णसे यह सामयिक बात कही--॥ २२ ॥
पश्य कृष्ण घनान् कृष्णान् बकाकोज्ज्वलभूषणान् ।
गगने तव गात्रस्य वर्णचोरान् समुच्छ्रितान् ॥ २३ ॥
‘श्रीकृष्ण ! आकाशमें उन ऊँचे उठे हुए काले बादलों-को तो देखो, जो बकपङ्क्तिरूपी उज्ज्वल हारोंसे विभूषित हैं। वे तुम्हारी अङ्गकान्ति चुराये लेते हैं ॥ २३ ॥
तव निद्राकरः कालस्तव गात्रोपमं नभः ।
त्वमिवाज्ञातवसतिं चन्द्रो वसति वार्षिकीम् ॥ २४ ॥
‘यह तुम्हारे नींद लेनेका समय है*। काले मेघोंके कारण आकाश तुम्हारे अङ्गोंके समान श्यामवर्णका दिखायी देता है तथा वर्षा ऋतुमें चन्द्रमा भी तुम्हारी तरह अज्ञात-वास कर रहे हैं ॥ २४ ॥
एतन्नीलाम्बुदश्यामं नीलोत्पलदलप्रभम् ।
सम्प्राप्ते दुर्दिने काले दुर्दिनं भाति वै नभः ॥ २५ ॥
‘जो काले मेघोंके छा जानेसे श्याम दिखायी देता है तथा जिसकी आभा नील कमलदलके समान हो गयी है, वह आकाश दुर्दिन (वर्षाका समय ) आनेपर स्वयं भी दुर्दिन (मेघाच्छन्न दिवस ) सा प्रतीत होता है ॥ २५ ॥
पश्य कृष्ण जलोद्ग्रैः कृष्णैरुद्ग्रथितैर्घनैः ।
गोवर्धनो यथा रम्यो भाति गोवर्धनो गिरिः ॥ २६ ॥
‘श्रीकृष्ण ! देखो, जलसे भरकर परस्पर गुँथे हुए इन काले बादलोंसे गौओंकी वृद्धि करनेवाला गोवर्धन पर्वत कैसा रमणीय प्रतीत होता है ! ॥ २६ ॥
पतितेनाम्भसा ह्येते समन्तान्मददर्पिताः ।
भ्राजन्ते कृष्णसारङ्गाः काननेषु मुदान्विताः ॥ २७ ॥
‘ये कृष्णमृग चारों ओर जल गिरनेसे मदमत्त हो उठे हैं और आनन्दमग्न होकर काननोंमें विचरते हुए शोभा पा रहे हैं ॥ २७ ॥
एतान्यम्बुप्रहृष्टानि हरितानि मृदूनि च ।
तृणानि शतपत्राक्ष पत्रैर्गूहन्ति मेदिनीम् ॥ २८ ॥
‘कमलनयन ! जलसे अभिषिक्त होकर हर्षोल्लासमें भरे हुए ये कोमल हरित तृण अपने पत्तोंसे पृथ्वीको ढकते जा रहे हैं ॥ २८ ॥
क्षरज्जलानां शैलानां वनानां जलदागमे ।
ससस्यानां च सीमानां न लक्ष्मीर्व्यतिरिच्यते ॥ २९॥
‘मेघोंके आनेपर जलके झरने बहानेवाले पर्वतोंकी, वनोंकी तथा सस्य (हरी-भरी खेती) से सम्पन्न खेतोंकी लक्ष्मी (शोभा) एक-सी हो रही है । कहीं न्यून या अधिक नहीं है (अथवा इन तीनोंकी शोभा इनसे पृथक् नहीं होती है) ॥ २९ ॥
शीघ्रवातसमुद्धूताः प्रोषितोत्सुक्यकारिणः ।
दामोदरोद्दामरवाः प्रागल्भ्यं यान्ति तोयदाः ॥ ३० ॥
‘दामोदर ! शीघ्रगामी वायुसे प्रेरित हो ऊपर उठे हुए तथा परदेशमें रहनेवाले पुरुषोंको घर आनेके लिये उत्सुक बनानेवाले ये बादल प्रचण्ड गर्जना करते हुए अपनी प्रगल्भताका परिचय देते हैं ॥ ३० ॥
हरे हर्यश्वचापेन त्रिवर्णेन त्रिविक्रम ।
विबाणज्येन रचितं तवेदं मध्यमं पदम् ॥ ३१ ॥
‘त्रिविक्रमरूप धारण करनेवाले हरे ! बाण और प्रत्यञ्चा-से रहित तिरंगे इन्द्रधनुषसे तुम्हारे मध्यम पद (अन्तरिक्ष) का शृङ्गार-सा किया गया है ॥ ३१ ॥
नभस्येष नभश्चक्षुर्न भात्येव चरन्नभः ।
मेघैः शीतातपकरो विरश्मिरिव रश्मिवान् ॥ ३२ ॥
‘श्रावण मासमें आकाशके नेत्रस्वरूप ये अंशुमाली सूर्य प्रभाहीन-से होकर आकाशमें विचरते हुए अधिक शोभा नहीं पा रहे हैं तथा बादलोंसे आच्छन्न होनेके कारण इनकी तापदायिनी किरणें शीतल हो गयी हैं ॥ ३२ ॥
* वर्षाके चार महीनोंमें भगवान् विष्णु शयन करते हैं—यह पुराणप्रसिद्ध बात है तथा इस हरिवंशमें भी इसकी चर्चा आ चुकी है ।
| २४२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
| द्यावापृथिव्योः संसर्गः सततं विततैः कृतः।<br>अव्यवच्छिन्नधारौघैः समुद्रौघसमैर्घनैः॥ ३३ ॥<br>‘आकाशमें फैलकर समुद्रके जलप्रवाह-से प्रतीत होनेवाले इन बादलोंने अविच्छिन्नरूपसे जलकी धाराएँ गिराकर आकाश और पृथ्वीको मानो सदाके लिये एक दूसरेके साथ जोड़ दिया है ॥ ३३ ॥ | समुद्रोद्धूतजनिता लोलशाद्वलकम्पिनः।<br>शीताः सपृषतोद्दामः कर्कशा वान्ति मारुताः॥ ३९ ॥<br>‘समुद्रके हिलोरे लेनेसे उत्पन्न हो चञ्चल घासोंको कम्पित करती हुई जलविन्दुओंसहित उद्दाम गतिसे चलनेवाली शीतल एवं कर्कश वायु बह रही है ॥ ३९ ॥ |
| नीपार्जुनकदम्बानां पृथिव्यां चातिवृष्टिभिः।<br>गन्धैः कोलाहला वान्ति वाता मदनदीपनाः॥ ३४ ॥<br>‘पृथ्वीपर अत्यन्त वर्षा होनेके कारण नीप, अर्जुन और कदम्बोंकी गन्धसे वासित हुई कोलाहलयुक्त वायु कामियोंका कामोद्दीपन करती हुई बह रही है ॥ ३४ ॥ | निशासु सुप्तचन्द्रासु मुक्ततोयासु तोयदैः।<br>मग्नसूर्यस्य नभसो न विभान्ति दिशो दश ॥ ४० ॥<br>‘जिनमें चन्द्रमा भी सोये हुएके समान अदृश्य हो गये हैं, बादलोंनें पानी बरसाना आरम्भ कर दिया है और आकाशके सूर्य भी डूब चुके हैं, ऐसी बरसाती रातोंमें दसों दिशाओंका कुछ पता नहीं चलता है ॥ ४० ॥ |
| सप्रवृत्तमहावर्षे लम्बमानमहाम्बुदम्।<br>भात्यगाधमपर्यन्तं ससागरमिवाम्बरम्॥ ३५ ॥<br>‘बड़े जोरसे वर्षा आरम्भ हो गयी है। बड़े-बड़े मेघ बरसनेके लिये नीचेको झुक आये हैं, जिनसे यह आकाश अथाह अनन्त महासागरसे संयुक्त-सा प्रतीत होता है ॥३५॥ | चेतनं पुष्करं कोशैः क्षुधाध्मातैः समन्ततः।<br>न घृणीनां न रम्याणां विवेकं यान्ति कृष्टयः॥ ४१ ॥<br>‘सब ओर वायुसे मेघोंद्वारा उपलक्षित आकाश चेतन-सा प्रतीत होता है, किसानोंको न दिनका पता चलता है न रातका ॥ ४१ ॥ |
| धारानिर्मलनाराचं विद्युत्कवचवर्मिणम्।<br>शक्रचापायुधधरं युद्धसज्जमिवाम्बरम्॥ ३६ ॥<br>‘जलकी धाराओंका निर्मल नाराच, विद्युतरूपी कवच तथा इन्द्रधनुषरूपी आयुधको धारण किये हुए यह आकाश युद्धके लिये सुसज्जित हुआ-सा जान पड़ता है ॥ ३६ ॥ | घर्मदोषपरित्यक्तं मेघतोयविभूषितम्।<br>पश्य वृन्दावनं कृष्ण वनं चैत्ररथं यथा ॥ ४२ ॥<br>‘श्रीकृष्ण ! देखो, घामरूपी दोषसे रहित और मेघोंके बरसाये हुए जलसे विभूषित हुआ वृन्दावन चैत्ररथ वनके समान शोभा पा रहा है’ ॥ ४२ ॥ |
| शैलानां च वनानां च द्रुमाणां च वरानन।<br>प्रतिच्छन्नानि भासन्ते शिखराणि घनैर्घनैः॥ ३७ ॥<br>‘सुमुख श्रीकृष्ण ! पर्वतोंके शिखर तथा वनों और वहाँके वृक्षोंकी शिखाएँ घने बादलोंसे आच्छादित होकर कैसी शोभा पा रही हैं ॥ ३७ ॥ | एवं प्रावृड्गुणान् सर्वाञ्छ्रीमान् कृष्णस्य पूर्वजः।<br>कथयन्नेव वलवान् व्रजमेव जगाम ह ॥ ४३ ॥<br>इस प्रकार श्रीकृष्णके बड़े भ्राता महाबली श्रीमान् बलराम वर्षाकालके गुणोंका वर्णन करते हुए ही उनके साथ व्रजमें चले गये ॥ ४३ ॥ |
| गजानीकैरिवाकीर्णं सलिलोद्गारिभिर्घनैः।<br>वर्णसारूप्यतां याति गगनं सागरस्य च ॥ ३८ ॥<br>‘अपनी सूँड़ोंसे जल छोड़नेवाले गजसमूहोंकी भाँति इन काले घने बादलोंसे आच्छादित हुआ आकाश रंग-रूपमें समुद्रके समान हो गया है ॥ ३८ ॥ | अन्योन्यं रममाणौ तु कृष्णसंकर्षणावुभौ।<br>तत्कालज्ञातिभिः सार्द्धं चेरतुस्तद् वनं महत् ॥ ४४ ॥<br>एक दूसरेके साथ खेलते और घूमते हुए दोनों भाई श्रीकृष्ण और संकर्षण उस समयके भाई-बन्धुओंके साथ उस विशाल वनमें विचरने लगे ॥ ४४ ॥ |
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि प्रावृड्वर्णने दशमोऽध्यायः॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वर्षाका वर्णनविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
एकादशोऽध्यायः
श्रीकृष्णकी अङ्गच्छटा, भाण्डीर वट, यमुना और कालियदहका वर्णन तथा श्रीकृष्णद्वारा कालियनागके निग्रहका विचार
वैशम्पायन उवाच
कदाचित् तु तदा कृष्णो विना संकर्षणेन वै।
बभार तद् वनं रम्यं कामरूपी वराननः॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! एक दिन इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुमुख श्रीकृष्ण अपने भाई संकर्षणके बिना ही उस रमणीय वृन्दावनमें विचरने लगे ॥१॥
विष्णुपर्व ] एकादशोऽध्यायः [ २४३
काकपक्षधरः श्रीमाञ्छ्यामः पङ्कजलेक्षणः।
श्रीवत्सेनोरसा युक्तः शशाङ्क इव लक्ष्मणा ॥ २ ॥
उन्होंने मस्तकके पिछले भागमें काकपक्ष (बड़े-बड़े केश) धारण कर रखे थे। उनके नेत्र कमलदलके समान सुन्दर एवं विशाल थे। वे श्यामसुन्दर छविसे युक्त एवं श्रीसम्पन्न थे तथा वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न धारण करके शशचिह्नसे संयुक्त चन्द्रमाके समान शोभा पाते थे ॥ २ ॥
साङ्गदेनाग्रहस्तेन पङ्कजोद्भिन्नवर्चसा।
सुकुमाराभिताम्रेण क्रान्तविक्रान्तगामिना ॥ ३ ॥
बाजुबन्दसे विभूषित हुए उनके हाथोंका अग्रभाग विकसित कमलके समान कान्तिमान् था; उनके पैर सुकुमार, लाल और क्रान्त-विक्रान्त गतिसे चलनेवाले थे, जिनसे उनकी अनुपम शोभा होती थी ॥ ३ ॥
पीते प्रीतिकरे नृणां पद्मकिञ्जल्कसप्रभे।
सूक्ष्मे वसानो वसने ससंध्य इव तोयदः ॥ ४ ॥
वे कमल-केसरके समान पीले रंगके दो महीन वस्त्र पहने हुए थे, जो मनुष्योंके आनन्दको बढ़ानेवाले थे। उन वस्त्रोंको धारण करनेवाले श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण संध्याकालकी स्वर्णिम आभासे युक्त मेघके समान सुशोभित होते थे ॥ ४ ॥
वत्सव्यापारयुक्ताभ्यां व्यग्राभ्यां गण्डरज्जुभिः।
भुजाभ्यां साधुवृत्ताभ्यां पूजिताभ्यां दिवौकसैः ॥ ५ ॥
उनकी दोनों भुजाएँ सुन्दर, गोल तथा देवताओंद्वारा पूजित थीं। वे बछड़ोंके व्यापारमें संलग्न थीं और उनके गलेमें घुँघरू बाँधनेकी रस्सियोंसे उलझी हुई थीं, ऐसी भुजाओंसे श्रीकृष्णकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ५ ॥
सदृशं पुण्डरीकस्य गन्धेन कमलस्य च।
रराज चास्य तद् बाल्ये रुचिरौष्ठपुटं मुखम् ॥ ६ ॥
बाल्य (पौगण्ड) अवस्थामें सुन्दर ओठोंसे सुशोभित उनका मुख कमलके सदृश सुन्दर और उसीके समान गन्धसे सुवासित होकर अपनी अद्भुत शोभा फैला रहा था ॥ ६ ॥
शिखाभिस्तस्य मुक्ताभी रराज मुखपङ्कजम्।
वृतं षट्पदपंक्तीभिर्यथा स्यात् पद्ममण्डलम् ॥ ७ ॥
उनका मुखारविन्द खुले अलकोंसे आवृत होकर ऐसी शोभा पा रहा था, मानो भ्रमरावलियोंसे युक्त कमलमण्डल सुशोभित हो रहा हो ॥ ७ ॥
तस्यार्जुनकदम्बाढ्या नीपकन्दलमालिनी।
रराज माला शिरसि नक्षत्राणां यथा दिवि ॥ ८ ॥
उनके मस्तकपर अर्जुन और कदम्बके फूलोंसे युक्त एक माला शोभा पा रही थी, जो नीपके पुष्पों तथा नूतन अंकुरोंसे सुशोभित थी। वह आकाशमें तारिकाओंकी भाँति अपनी छटा छिटका रही थी ॥ ८ ॥
स तया मालया वीरः शुशुभे कण्ठसक्तया।
मेघमालाम्बुदश्यामो नभस्य इव मूर्तिमान् ॥ ९ ॥
वैसी ही माला उनके कण्ठमें भी पड़ी हुई थी, जिससे वीरवर घनश्याम श्रीकृष्ण मेघमालाओंकी श्यामकन्तिसे सम्पन्न मूर्तिमान् भाद्रपद मासकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ९ ॥
एकेनामलपत्रेण कण्ठसूत्रावलम्बिनां।
रराज बर्हिपत्रेण मन्दमारुतकम्पिना ॥ १० ॥
उनके कण्ठगत सूत्रमें एक निर्मल मोरपङ्ख लटक रहा था, जो मन्दगतिसे बहनेवाली वायुके हलके आघातसे हिल रहा था। उस मोरपङ्खसे भी उनके श्रीअङ्गोंकी शोभावृद्धि हो रही थी ॥ १० ॥
क्वचिद् गायन् क्वचित् क्रीडंश्चञ्चूर्यैश्च क्वचित् क्वचित्।
पर्णवाद्यं श्रुतिसुखं वादयँश्च क्वचिद् वने ॥ ११ ॥
वे वनमें कहीं गाते, कहीं खेलते, कहीं भ्रमण करते और कहीं कानोंको सुख देनेवाला पत्तोंका बाजा बजाते थे ॥
गोपवेणुं सुमधुरं कामात् तमपि वादयन्।
प्रह्लादनार्थं च गवां क्वचिद् वनगतो युवा ॥ १२ ॥
किसी समय वनमें जाकर तरुणरूप धारण करके गौओंको आनन्दित करनेके लिये इच्छानुसार अत्यन्त मधुर स्वरमें मुरली बजाया करते थे, जो उस समयके गोपोंका प्रमुख वाद्य थी ॥ १२ ॥
गोकुलेऽभ्युदरश्यामश्चचार द्युतिमान् प्रभुः।
रेमे च तत्र रम्यासु चित्रासु वनराजिषु ॥ १३ ॥
नूतन जलधरके समान श्याम एवं कान्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण गोकुलके आसपास विचरने तथा रमणीय एवं विचित्र वनश्रेणियोंमें विहार करने लगे ॥ १३ ॥
मयूररवघुष्टासु मदनोद्दीपनीषु च।
मेघनादप्रतिव्यूहेर्नादितासु समन्ततः ॥ १४ ॥
वहाँ मयूरोंकी केकाध्वनि गूँजती रहती थी। वे वन-पंक्तियाँ कामी पुरुषोंके मनमे कामभावका उद्दीपन करनेवाली थीं। मेघोंकी गर्जनाकी प्रतिध्वनियोंसे वहाँ सब ओर कोलाहल मचा रहता था ॥ १४ ॥
शाद्वलच्छन्नमार्गासु शिलीन्ध्राभरणासु च।
कन्दलामलपत्रासु स्रवन्तीषु नवं जलम् ॥ १५ ॥
उनके मार्ग घासोंसे ढक गये थे। जगह-जगह उगे हुए छत्रक उनके आभूषण-से प्रतीत होते थे। उनमें नये-नये पल्लव अंकुरित हो रहे थे तथा वे नूतन जल टपका रही थीं ॥
केसराणां नवैर्गन्धैर्मदनिःश्वसितोपमैः।
अभीक्ष्णं निःश्वसन्तीषु कामिनीष्विव नित्यशः ॥ १६ ॥
मदजनित निःश्वासके समान केसरोंकी नूतन गन्धसे वे
२४४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
वनश्रेणियाँ कामिनियोंकी भाँति प्रतिदिन बारंबार उच्छ्वास ले रही थीं ॥ १६ ॥
सेव्यमानो नवैर्वातैर्द्रुमसंघातनिःसृतैः ।
तासु कृष्णो मुदं लेभे सौम्यासु वनराजिषु ॥ १७ ॥
वृक्षोंके समूहसे निकली हुई नूतन वायुसे सेवित हुए श्रीकृष्ण उन सौम्य वनराजियोंमें बड़े आनन्दका अनुभव करने लगे ॥ १७ ॥
स कदाचिद् वने तस्मिन् गोभिः सह परिभ्रमन् ।
ददर्श विपुलोदग्रं शाखिनं शाखिनां वरम् ॥ १८ ॥
एक दिन उस वनमें गौओंके साथ भ्रमण करते हुए श्रीकृष्णने वहाँ एक वृक्षको देखा, जो बहुत ही ऊँचा तथा सभी वृक्षोंमें बड़ा था ॥ १८ ॥
स्थितं धरण्यां मेघाभं निविडं पत्रसंचयैः ।
गगनार्धोच्छ्रिताकारं पर्वताभोगधारिणम् ॥ १९ ॥
अपने पत्तोंके संचयसे अत्यन्त घना प्रतीत होनेवाला वह वृक्ष पृथ्वीपर मूर्तिमान् मेघके समान खड़ा था । अपनी ऊँचाईसे उसने आकाशके आधे भागको रोक लिया था और वह पर्वतके समान विस्तृत आकार धारण करता था ॥ १९ ॥
नीलचित्राङ्गवर्णैश्च सेवितं बहुभिः खगैः ।
फलैः प्रवालैश्च घनैः सेन्द्रचापघनोपमम् ॥ २० ॥
नीले एवं चितकबरे रंगवाले बहुत-से मोर उस वृक्षका सेवन करते थे । वह मूँगोंके समान लाल-लाल घने फलोंके द्वारा इन्द्रधनुषसहित मेघके समान जान पड़ता था ॥ २० ॥
भवनाकारविटपं लतापुष्पसुमण्डितम् ।
विशालमूलावनतं पवनाम्भोदधारिणम् ॥ २१ ॥
उसकी एक-एक शाखा विशाल गृहके समान प्रतीत होती थी । लताओं और फूलोंसे वह अच्छी तरह अलंकृत था । उसकी विशाल जड़ें बहुत दूरतक फैली हुई थीं । वह अपने ऊपर वायु और मेघको भी धारण करता था ॥ २१ ॥
आधिपत्यमिवाम्येषां तस्य देशस्य शाखिनाम् ।
कुर्वाणं शुभकर्माणं निरावर्षमनातपम् ॥ २२ ॥
ऐसा जान पड़ता था कि वह वृक्ष उस प्रदेशके दूसरे सभी वृक्षोंका आधिपत्य-सा कर रहा है । उसके कर्म बड़े शुभ थे । वह वर्षा और धूपका निवारण करता था ॥ २२ ॥
न्यग्रोधं पर्वताग्राभं भाण्डीरं नाम नामतः ।
दृष्ट्वा तत्र मतिं चक्रे निवासाय ततः प्रभुः ॥ २३ ॥
वह बरगदका वृक्ष था और पर्वत-शिखरके समान प्रतीत होता था । उसका नाम था भाण्डीर वट । उसे देखकर भगवान्ने वहीं निवास करनेका विचार किया ॥ २३ ॥
स तत्र वयसा तुल्यैर्वत्सपालैः सहानघ ।
रेमे वै वासरं कृष्णः पुरा स्वर्गगतो यथा ॥ २४ ॥
निष्पाप जनमेजय ! उस वटके नीचे समान अवस्थावाले वत्सपालक मित्रोंके साथ श्रीकृष्ण दिनभर बड़े सुखसे रहे । पहले अपने धाममें रहते समय उन्हें जैसे सुखका अनुभव होता था, वैसा ही वहाँ भी हुआ ॥ २४ ॥
तं क्रीडमानं गोपालाः कृष्णं भाण्डीरवासिनम् ।
रमयन्ति स्म बहवो वन्यैः क्रीडनकैस्तदा ॥ २५ ॥
वहाँ खेलते हुए भाण्डीरवासी श्रीकृष्णको उस समय बहुत-से ग्वालबाल जंगली खिलौने देकर प्रसन्न करनेकी चेष्टा करते थे ॥ २५ ॥
अन्ये स्म परिगायन्ति गोपा मुदितमानसाः ।
गोपालाः कृष्णमेवान्ये गायन्ति स्म रतिप्रियाः ॥ २६ ॥
दूसरे ग्वालबाल मन-ही-मन प्रसन्न हो अनेक प्रकारके गीत गाते थे । अन्य गोप-बालक जिन्हें श्रीकृष्णकी वह मधुर क्रीडा बहुत ही प्रिय थी अथवा जो श्रीकृष्णविषयक अनुरागको ही अपनी प्रिय वस्तु मानते थे, वे श्रीकृष्णका ही यशोगान करने लगे ॥ २६ ॥
तेषां स गायतामेव वादयामास वीर्यवान् ।
पर्णवाद्यान्तरे वेणुं तुम्बीं वीणां च तत्र ह ॥ २७ ॥
उन ग्वालबालोंके गाते समय बलवान् श्रीकृष्ण पत्तोंके बनाये हुए वाद्योंके बीच-बीचमें मुरली, तुम्बी (तँबूरा) तथा बीन बजाते थे ॥ २७ ॥
कदाचिच्चारयन्नेव गाः स गोवृषभेक्षणः ।
जगाम यमुनातीरं लतालंकृतपादपम् ॥ २८ ॥
गाय-बैलोंके समान विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्ण किसी समय अपनी गौओंको चराते हुए ही यमुनाजीके तटपर जा पहुँचे । जहाँका प्रत्येक वृक्ष लताओंसे अलंकृत था ॥ २८ ॥
तरङ्गापाङ्गकुटिलां वारिस्पर्शसुखानिलाम् ।
तां च पद्मोत्पलवतीं ददर्श यमुनां नदीम् ॥ २९ ॥
जो अपनी चञ्चल तरङ्गरूपी कुटिल कटाक्षोंसे कुछ वक्र दिखायी देती थी, जिसके जलका स्पर्श करके सुखदायिनी हवा चल रही थी तथा जिसमे कमल और उत्पल खिले हुए थे, उस यमुना नदीको श्रीकृष्णने देखा ॥ २९ ॥
सुतीर्थां स्वादुसलिलां ह्रदिनीं वेगगामिनीम् ।
तोयवातोद्गतैर्वेगैरवनामितपादपाम् ॥ ३० ॥
उसमे उतरनेके लिये उत्तम मार्ग थे । उसका जल स्वादिष्ट था । उसके भीतर कई कुण्ड थे तथा वह बड़े वेगसे प्रवाहित हो रही थी । जल और वायुके द्वारा प्रकट हुए वेगसे उसने किनारेके वृक्षोंको झुका दिया था ॥ ३० ॥
हंसकारण्डवोद्घुष्टां सारसैश्च निनादिताम् ।
अन्योन्यमिथुनैश्चैव सेवितां मिथुनैश्चरैः ॥ ३१ ॥
विष्णुपर्व ] एकादशोऽध्यायः २४५ हंसों और कारण्डवोंके उद्घोष तथा सारसोंके कलनादसे वहाँ सदा कोलाहल होता रहता था। अपने जोड़ेके साथ विचरनेवाले चक्रवाक आदि पक्षी परस्पर मैथुनमें प्रवृत्त हो यमुनातटका सेवन करते थे ॥ ३१ ॥ जलजैः प्राणिभिः कीर्णा जलजैर्भूषितां गुणैः । जलजैः कुसुमैश्चित्रां जलजैर्हरितोदकाम् ॥ ३२ ॥ जलमें उत्पन्न होनेवाले प्राणी (मत्स्य आदि) यमुना- जीमें भरे हुए थे। वे जलजनित शीतलता आदि गुणोंसे विभूषित थीं। जलमें होनेवाले कमल आदि पुष्प उनमें विचित्र शोभाका आधान करते थे तथा जलजनित सेवार आदिके कारण उनका जल हरा दिखायी देता था ॥ ३२ ॥ प्रसृतस्रोतचरणां पुलिनश्रोणिमण्डलाम् । आवर्तनाभिगम्भीरां पद्मरोगानुरञ्जिताम् ॥ ३३ ॥ फैले हुए स्रोत ही उनके चरण थे। दोनों तट नितम्ब- मण्डलकी शोभा धारण करते थे। उठती हुई भँवरें उनकी गम्भीर नाभि थी। वे कमलरूपी रोमावलिसे अनुरञ्जित थीं ॥ तटच्छेदोदरां कान्तां त्रितरङ्गवलीधराम् । फेनप्रहृष्टवदनां प्रसन्नां हंसहासिनीम् ॥ ३४ ॥ तटके निकट जो प्रवाहकी कृशता थी, वही उनका सूक्ष्म उदर अथवा कृश कटिभाग थी। वे अपनी मनोहर कान्तिसे कमनीय प्रतीत होतो थीं। वे तरङ्गमयी त्रिवली धारण करती थीं। फेन ही उनका हर्षोत्फुल्ल मुख था। वे सदा प्रसन्न (स्वच्छ) रहती थीं और हंस ही उनके हास थे ॥ ३४ ॥ रुचिरोत्पलरकोष्ठौ नतभ्रू जलजेक्षणाम् । हृददीर्घललाटान्तां कान्तां शैवलमूर्द्धजाम् ॥ ३५ ॥ सुन्दर लाल कमल. उनके लाल-लाल ओष्ठोंकी झाँकी कराते थे। जलका नीचेकी ओर जाता हुआ प्रवाह ही उनकी झुकी हुई भौंहें थीं। नील कमल ही उनके नेत्र थे। जलका कुण्ड ही उनका विस्तृत ललाट-प्रान्त था तथा सेवार ही उनके सुन्दर केश थे। उनकी कान्ति बड़ी ही कमनीय थी ॥ ३५ ॥ चक्रवाकस्तनतटीं तीरपार्श्वायताननाम् । दीर्घस्रोतायतभुजामाभोगश्रवणायताम् ॥ ३६ ॥ चकवा-चकईके जोड़े उनके मानो युगल उरोज थे। उनका विस्तृत मुख दोनों तटोंपर फैला हुआ था। लंबे स्रोत ही उनकी विशाल भुजाओंके समान थे। दोनों तटोंकी पूर्णता ही उनके विस्तृत कान थे ॥ ३६ ॥ कारण्डवाकुण्डलिनीं श्रीमत्पङ्कजलोचनाम् । तटजाभरणोपेतां मीननिर्मलमेखलाम् ॥ ३७ ॥ वारिप्लवप्लवक्षौमां सारसारावनूपुराम् । काशचामीकरं वासो वसानां हंसलक्षणम् ॥ ३८ ॥ वे कारण्डवोंके कुण्डल पहिने हुए थीं। उनके नील- कमलरूपी लोचन अनुपम शोभासे सम्पन्न थे । तटपर उत्पन्न हुए वृक्ष आदि ही उनके आभरण थे। मछलियोंकी पंक्ति उनकी उज्ज्वल मेखला (करधनी) -सी प्रतीत होती थी। उनके जलका फैला हुआ पाट ही पाटम्बरका काम देता था। सारसोंकी मीठी बोली ही उनके नूपुरोंकी मधुर ध्वनि थी। वे काशपुष्प, हंस एवं सुवर्णके समान सुन्दर स्वच्छ जलमय वस्त्र धारण करती थीं ॥ ३७-३८ ॥ भीमनक्रानुसिक्ताङ्गीं कूर्मलक्षणभूषिताम् । निपानश्वापदापीडां नृभिः पीतपयोधराम् ॥ ३९ ॥ भयंकर नाके उनके अङ्गोंमें लगे हुए चन्दन-से प्रतीत होते थे। वे कच्छपरूपी लक्षणों (हाथ-पैरोंकी रेखाओं) से विभूषित थीं। पशुओंके पानी पीनेके घाटपर आये हुए श्वापद (हिंसक जन्तु) उनके शीशफूल थे। मनुष्य आदि प्राणी इनके पयोधर (जलपूर्ण स्तन) का पान करते थे ॥ ३९ ॥ श्वापदोच्छिष्टसलिलामाश्रमस्थानसंकुलाम् । तां समुद्रस्य महिषीमीक्षमाणः समन्ततः ॥ ४० ॥ चचार रुचिरं कृष्णो यमुनामुपशोभयन । यमुनाके जलको हिंसक जन्तुओने पीकर जूठा कर दिया था और उनके दोनों तट विभिन्न आश्रमोंसे भरे हुए थे। ऐसी समुद्रकी पटरानी यमुनाकी शोभा निहारते और बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण अपनी मनोहर गतिसे वहाँ चारों ओर विचर रहे थे ॥ ४०३ ॥ तां चरन्स नदीं श्रेष्ठां ददर्श हृदमुत्तमम् ॥ ४१ ॥ दीर्घं योजनविस्तारं दुस्तरं त्रिदशैरपि । गम्भीरमक्षोभ्यजलं निष्कम्पमिव सागरम् ॥ ४२ ॥ नदियोंमें श्रेष्ठ यमुनाके तटपर विचरते हुए श्रीकृष्णने एक उत्तम हृद (जलकुण्ड) देखा, जो बहुत बड़ा था। उसका विस्तार एक योजनका था। देवताओंके लिये भी उसे पार करना कठिन था। वह बहुत ही गहरा, क्षोभरहित जलसे परिपूर्ण , तथा प्रशान्त समुद्रके समान हलचलसे शून्य था ॥ ४१-४२ ॥ तोयजैः श्वापदैस्त्यक्तं शून्यं तोयचरैः खगैः । अगाधेनाम्भसा पूर्णं मेघपूर्णमिवाम्बरम् ॥ ४३ ॥ जलमे पैदा होनेवाले मगर आदि हिंसक जन्तुओंने भी उस हृदको त्याग दिया था। जलचर पक्षियोंसे भी वह सूना ही था तथा मेघोंसे आच्छादित हुए आकाशकी भाँति वह अगाध जलसे पूर्ण दिखायी देता था ॥ ४३ ॥ दुःखाेपसर्प्यं तीरेषु ससर्पेर्विपुलैर्बिलैः । विषारणिभवस्याग्नेर्धूमेन परिवेष्टितम् ॥ ४४ ॥ उसके तटोंपर बड़े-बड़े बिल थे, जिनमें सर्प रहते थे। उनके कारण उस कुण्डतक पहुँचना बहुत ही कष्टदायक
| २४६ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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था। साँपोंकी विषरूपी अरणिसे उत्पन्न हुई आगके धूमसे वह सारा कुण्ड व्याप्त रहता था ॥ ४४ ॥
अभोग्यं तत् पशूनां हि अपेयं च जलार्थिनाम् ।
उपभोगैः परित्यक्तं सुरैस्त्रिपवणार्थिभिः ॥ ४५ ॥
वह पशुओंके उपभोगमें आनेके योग्य नहीं रह गया था। जलार्थी प्राणियोंके लिये उसका जल अपेय हो गया था। तीनों समय स्नानकी इच्छा रखनेवाले देवताओंने भी उसे त्याग दिया था। वह हृद उनके उपभोगमें भी नहीं आता था ॥ ४५ ॥
आकाशादप्यसंचार्यं खगैराकाशगोचरैः ।
तृणेष्वपि पतत्स्वप्सु ज्वलन्तमिव तेजसा ॥ ४६ ॥
उस कुण्डके ऊपर-ऊपर आकाशचारी पक्षियोंके लिये आकाशमार्गसे भी जाना असम्भव था। उसके जलमें तिनके भी पड़ जायें तो वह कुण्ड अपनी विषाग्निके तेजसे प्रज्वलित हो उठता था ॥ ४६ ॥
समन्ताद् योजनं साग्रं देवैरपि दुरासदम् ।
विषानलेन घोरेण ज्वालाप्रज्वलितद्रुमम् ॥ ४७ ॥
उसके चारों ओर एक-एक योजनसे अधिक भूभाग ऐसा था, जिसपर चलना देवताओंके लिये भी बहुत कठिन था। वहाँ फैली हुई भयानक विषाग्निसे जो लपट उठती थी, उसने आस-पासके वृक्षोंको भी जलाकर भस्म कर दिया था ॥
व्रजस्योत्तरतस्तस्य क्रोशमात्रे निरामये ।
तं दृष्ट्वा चिन्तयामास कृष्णो वै विपुलं ह्रदम् ॥ ४८ ॥
अगाधं द्योतमानं च कस्यायं महतो ह्रदः ।
व्रजके उत्तर भागमें केवल एक कोसकी भूमि ऐसी रह गयी थी, जो उसकी विषाग्निके प्रभावसे बची रहनेके कारण रोग-शोकसे रहित थी। उस विशाल एवं अगाध कुण्डको, जो अपने तेजसे दीप्तिमान् था, देखकर श्रीकृष्णने मन-ही-मन सोचा, किस महान् प्राणीका यह कुण्ड है ॥ ४८$\frac{१}{२}$ ॥
अस्मिन् स कालियो नाम कालाञ्जनचयोपमः ॥ ४९ ॥
उरगाधिपतिः साक्षाद्ध्रदे वसति दारुणः ।
उत्सृज्य सागरावासं यो मया विदितः पुरा ॥ ५० ॥
भयात् पतगराजस्य सुपर्णस्योरगाशिनः ।
इस हृदमें काली अञ्जनराशिके समान काला तथा अत्यन्त दारुण वह साक्षात् नागराज कालिय निवास करता है, जो पूर्वकालमें मेरी जानकारीमें ही सर्पभोजी पक्षिराज गरुड़के भयसे समुद्रका निवास छोड़कर यहाँ आ गया था ॥
तेनेयं दूषिता सर्वा यमुना सागरङ्गमा ॥ ५१ ॥
भयात् तस्योरगपतेर्नायं देशो निषेव्यते ।
उसीने इस सारी समुद्रगामिनी यमुनाको विषसे दूषित किया है। उस नागराजके भयसे ही कोई प्राणी इस देशका सेवन नहीं करता ॥ ५१$\frac{१}{२}$ ॥
तदिदं दारुणाकारमरण्यं रूढशाद्वलम् ॥ ५२ ॥
सावरोहद्रुमं घोरं कीर्णं नानालताद्रुमैः ।
रक्षितं सर्पराजस्य सचिवैराप्तकारिभिः ॥ ५३ ॥
इसलिये बड़ी-बड़ी घासोंसे भरा हुआ यह वन भयानक हो गया है। वरोह और वृक्षोंसहित यह घोर वन नाना प्रकारकी लताओं तथा पादपोंसे परिपूर्ण है तथा सर्पराज कालियके विश्वासी मन्त्री इस भूभागकी रक्षा करते हैं ॥
वनं निर्विषयाकारं विपाचमिव दुःस्पृशम् ।
तैराप्तकारिभिर्नित्यं सर्वतः परिरक्षितम् ॥ ५४ ॥
यह वन आकाशकी भाँति अवलम्बनशून्य हो गया है। विषमिश्रित अन्नके समान इसका स्पर्श भी दुःखदायक है। कालियके उन विश्वसनीय सचिवोंद्वारा यह सदा सब ओरसे सुरक्षित है ॥ ५४ ॥
शैवालनलिनैश्चापि वृक्षैः क्षुद्रलताकुलैः ।
कर्तव्यमार्गो भ्राजेते ह्रदस्यास्य तटावुभौ ॥ ५५ ॥
इस हृदके दोनों तट सिवार, कमल तथा छोटी-छोटी लताओंसे भरे हुए वृक्षोंसे सुशोभित होते हैं। मुझे यहाँतक पहुँचनेके लिये मार्ग बनाना होगा ॥ ५५ ॥
तदस्य सर्पराजस्य कर्तव्यो निग्रहो मया ।
यथेयं सरिदम्भोदा भवेच्छिवजलाशया ॥ ५६ ॥
इसी दृष्टिसे मुझे इस नागराजका दमन करना है, जिससे जल देनेवाली यह नदी कल्याणकारी जलका आश्रय हो सके ॥ ५६ ॥
व्रजोपभोग्या च यथा नागे च दमिते मया ।
सर्वत्र सुखसंचारा सर्वतीर्थसुखाश्रया ॥ ५७ ॥
इस नागका मेरे द्वारा दमन हो जानेपर यहाँकी नदी समूचे ब्रजके उपभोगमें आने योग्य हो जायगी। यहाँ सब ओर सुखपूर्वक विचरण करना सम्भव हो जायगा तथा यह नदी समस्त तीर्थों और सुखोंका आश्रय हो जायगी ॥ ५७ ॥
एतदर्थं च वासोऽयं ब्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च ।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम् ॥ ५८ ॥
इसलिये ब्रजमें मेरा यह निवास हुआ है और इसीलिये मैंने गोपोंमें अवतार ग्रहण किया है। इन कुमार्गपर स्थित हुए दुरात्माओंका दमन करनेके लिये ही यहाँ मेरा अवतार हुआ है ॥ ५८ ॥
एनं कदम्बमारुह्य तदेव शिशुलीलया ।
विनिपत्य ह्रदे घोरे दमयिष्यामि कालियम् ॥ ५९ ॥
मैं बालकोंके खेल-खेलमें ही इस कदम्बपर चढ़कर उस घोर हृदमें कूद पहूँगा और कालियनागका दमन करूँगा ॥
एवं कृते बाहुवीर्यं लोके ख्यातिं गमिष्यति ॥ ६० ॥
ऐसा करनेपर संसारमें मेरे बाहुबलकी ख्याति होगी ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बालचरिते यमुनावर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाललीलाके प्रसंगमें यमुनावर्णननामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥११॥
[विष्णुपर्व ] द्वादशोऽध्यायः २४७
द्वादशोऽध्यायः
श्रीकृष्णद्वारा कालियानागका दमन, उसका समुद्रको प्रस्थान तथा गोपोंको श्रीकृष्णकी महत्ताका अनुभव
वैशम्पायन उवाच
सोपसृत्य नदीतीरं बद्ध्वा परिकरं दृढम्।
आरोहच्चपलः कृष्णः कदम्बशिखरं मुदा ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! चञ्चल श्रीकृष्णने नदीके तटपर पहुँचकर दृढ़तापूर्वक अपनी कमर कस ली। फिर प्रसन्नतापूर्वक वे कदम्बकी शाखापर चढ़ गये ॥ १ ॥
कृष्णः कदम्बशिखराल्लम्बमानो घनाकृतिः।
ह्रदमध्येऽकरोच्छब्दं निपतन्नम्बुजेक्षणः ॥ २ ॥
मेघके समान श्याम शरीरवाले कमलनयन श्रीकृष्णने कदम्बकी शाखासे लटककर कालियदहके बीचमें कूदते समय बड़े जोरका शब्द किया ॥ २ ॥
कृष्णेन तत्र पतता क्षुभितो यमुनाह्रदः।
सम्प्रासिच्यत वेगेन भिद्यमान इवाम्बुदः ॥ ३ ॥
श्रीकृष्णके वहाँ कूदनेसे यमुनाके उस कुण्डमें हलचल पैदा हो गयी। वह बड़े वेगसे जल उछालकर तट भूमिसहित सिंच उठा। ऐसा जान पड़ा, मानो वहाँ जलसे भरा हुआ मेघ फट पड़ा हो ॥ ३ ॥
तेन शब्देन संक्षुब्धं सर्पस्य भवनं महत्।
उदतिष्ठज्जलत् सर्पो रोषपर्याकुलेक्षणः ॥ ४ ॥
उस शब्दसे नागराजका विशाल भवन क्षुब्ध हो उठा और वह सर्प जलसे ऊपरको उठा। उस समय उसके नेत्र क्रोधसे भरे हुए थे ॥ ४ ॥
स चोरगपतिः क्रुद्धो मेघराशिसमप्रभः।
ततो रक्तान्तनयनः कालियः समदृश्यत ॥ ५ ॥
मेघोंकी घटाके समान काले रंगवाला वह नागराज कालिय जब कुपित होकर उठा, उस समय उसके नेत्रप्रान्त रक्तवर्णके दिखायी दे रहे थे ॥ ५ ॥
पञ्चास्यः पावकोच्छ्वासश्चलजिह्वोऽनलाननः।
पृथुभिः पञ्चभिर्घोरैः शिरोभिः परिवारितः ॥ ६ ॥
उसके पाँच मुख थे और उनके उच्छ्वासके साथ आगकी लपट उठती थी। उसकी जीभ चञ्चल गतिसे लपलपा रही थी और मुखमें आग भरी थी। वह पाँच भयंकर एवं स्थूल सिरसे घिरा रहता था ॥ ६ ॥
पूरयित्वा ह्रदं सर्वं भोगेनानलबर्चसा।
स्फुरन्निव च रोषेण ज्वलन्निव च तेजसा ॥ ७ ॥
अपने अग्निके समान तेजस्वी विशाल शरीरके द्वारा सारे ह्रदको पूर्ण करके वह क्रोधसे काँपता तथा तेजसे जलता हुआ-सा प्रतीत होता था ॥ ७ ॥
क्रोधेन ज्वलतस्तस्य जलं श्रुतमिवाभवत्।
प्रतिस्रोताश्च भीतेव जगाम यमुना नदी ॥ ८ ॥
क्रोधसे जलते हुए उस सर्पकी विषाग्निसे कालियकुण्डका जल खौलने-सा लगा तथा यमुनाका प्रवाह पीछेकी ओर लौट पड़ा। मानो वह नदी भयभीत-सी होकर पीछे भाग रही हो ॥ ८ ॥
तस्य क्रोधाग्निपूर्णेभ्यो वक्त्रेभ्योऽभूच्च मारुतः।
दृष्ट्वा कृष्णं ह्रदगतं क्रीडन्तं शिशुलीलया ॥ ९ ॥
सधूमः पन्नगेन्द्रस्य मुखाग्निश्वरुरर्चिषः।
श्रीकृष्णको अपने ह्रदमें आकर बालकोंके समान खेलते देख कालिय नागके क्रोधाग्निपूर्ण मुखोंसे उच्छ्वास वायु प्रकट हुई। उस नागराजके मुखसे धूमसहित आगकी लपटें निकलने लगीं ॥ ९ १/२ ॥
सृजता तेन रोषाग्निं समीपे तीरजा द्रुमाः ॥ १० ॥
क्षणेन भस्मसान्नीता युगान्तप्रतिमैन वै।
अपनी क्रोधाग्नि प्रकट करते हुए उस प्रलयंकर-जैसे सर्पने उस कुण्डके आस-पास उगे हुए तीरवर्ती वृक्षोंको क्षणभरमें जलाकर भस्म कर दिया ॥ १० १/२ ॥
तस्य पुत्राश्च दाराश्च भृत्याश्चान्ये महोरगाः ॥ ११ ॥
वमन्तः पावकं घोरं वक्त्रेभ्यो विषसम्भवम्।
सधूमं पन्नगेन्द्रास्ते निपेतुर्मितौजसः ॥ १२ ॥
उसके स्त्री, पुत्र, सेवक तथा अन्य बड़े-बड़े नाग एवं नागराज, जो अनन्त बलशाली थे, अपने मुखोंसे विषजनित, धूममिश्रित भयंकर आग उगलते हुए उनपर टूट पड़े ॥
प्रवेशितश्च तैः सर्पैः स कृष्णो भोगबन्धनम्।
निर्यत्नचरणाकारस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ १३ ॥
उन सभी सर्पोंने श्रीकृष्णको अपने शरीरोंके बन्धनमें बाँध लिया। उनके हाथ-पैर एवं सारे अङ्ग निश्चेष्ट हो गये। वे पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े रह गये ॥ १३ ॥
अदशन् दशनैस्तीक्ष्णैर्विषोत्पीडजलाविलैः।
ते कृष्णं सर्पपतयो न ममार च वीर्यवान् ॥ १४ ॥
उन समस्त नागराजोंने विषके प्रवाहसे मिश्रित जलके द्वारा मलिन हुए अपने तीखे दाँतोंसे श्रीकृष्णको डँसना आरम्भ किया; परंतु शक्तिशाली श्रीकृष्ण मर न सके ॥ १४॥
| २४८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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एतस्मिन्नन्तरे भीता गोपालाः सर्व एव ते।
क्रन्दमाना व्रजं जग्मुर्बाष्पगद्गदया गिरा ॥ १५ ॥
इसी बीचमें समस्त ग्वालबाल भयभीत हो रोते हुए व्रजमें गये और अश्रुगद्गद वाणीमे इस प्रकार बोले ॥ १५ ॥
गोपा ऊचुः
एष मोहं गतः कृष्णो मग्नो वै कालिये हृदे।
भक्ष्यते सर्पराजेन तदागच्छत मा चिरम् ॥ १६ ॥
गोपोंने कहा—ये श्रीकृष्ण कालीदहमें डूबकर मूर्च्छित हो गये हैं और नागराज इन्हें खाये जाता है; अतः जल्दी आओ, देर न करो ॥ १६ ॥
नन्दगोपाय वै क्षिप्रं सबलाय निवेद्यताम्।
एष ते कृष्यते कृष्णः सर्पेणेति महाह्रदे ॥ १७ ॥
बल-बलसहित नन्दगोपसे कोई शीघ्र जाकर कह दो कि 'तुम्हारे कृष्णको सर्प महान् कुण्डमें खींचे लिये जाता है' ॥
नन्दगोपस्तु तच्छ्रुत्वा वज्रपातोपमं वचः।
आर्तः स्खलितविक्रान्तस्तं जगाम ह्रदोत्तमम् ॥ १८ ॥
वह वज्रपातके समान दारुण वचन सुनकर नन्दगोप शोकसे व्याकुल हो लड़खड़ाते हुए उस विशाल ह्रदके पास जा पहुँचे ॥ १८ ॥
सबालयुवतीवृद्धः स च संकर्षणो युवा।
आक्रीडं पन्नगेन्द्रस्य जलस्थं समुपागमत् ॥ १९ ॥
उनके साथ व्रजके बहुत-से बालक, वृद्ध और युवतियाँ भी थीं। रोहिणीके युवक पुत्र संकर्षण भी आ पहुँचे थे। ये सब-के-सब नागराजकी जलस्थ क्रीड़ाभूमिके पास आये ॥
नन्दगोपमुखा गोपास्ते सर्वे साश्रुलोचनाः।
हाहाकारं प्रकुर्वन्तस्तस्थुस्तीरे ह्रदस्य वै ॥ २० ॥
नन्द आदि वे सभी गोप नेत्रोंसे आँसू बहाते और हाहाकार करते हुए कालियदहके तटपर खड़े हो गये ॥२०॥
व्रीडिता विस्मिताश्चैव शोकार्ताश्च पुनः पुनः।
केचित् तु पुत्र हा हेति हा धिगित्यपरे पुनः ॥ २१ ॥
वे अपनी विवशतापर लज्जित थे। श्रीकृष्णका साहस देख-सुनकर आश्चर्यमें पड़े थे और उनके जीवनकी आशंकासे बारंबार शोकार्त हो जाते थे। कोई 'हाय बेटा ! हाय !' कहकर रो देते और दूसरे 'हाय ! धिक्कार है हम सबके जीवनको' ऐसा कहते हुए चिन्तामग्न हो जाते थे ॥ २१ ॥
अपरे हा हताः स्मेति रुरुदुर्भृशदुःखिताः।
स्त्रियश्चैव यशोदां तां हा हतासीति चुक्रुशुः ॥ २२ ॥
या पश्यसि प्रियं पुत्रं सर्पराजवशं गतम्।
स्पन्दितं सर्पभोगेन कृष्यमाणं यथा मृतम् ॥ २३ ॥
दूसरे लोग अत्यन्त दुखी हो 'हाय ! हम मारे गये।' ऐसा कहते हुए जोर-जोरसे रोते थे। व्रजकी स्त्रियाँ यशोदाकी ओर देख चिल्ला-चिल्लाकर कहती थीं—'हाय यशोदे ! तू बेमौत मारी गयी, क्योंकि अपने प्यारे लालाको आज इस नागराजके वशमें पड़ा हुआ देख रही हो। हाय ! वह सर्पके शरीरसे आबद्ध हो मृतककी भाँति घसीटा जा रहा है॥
अश्मसारमयं नूनं हृदयं ते विलक्ष्यते।
पुत्रं कथमिमं दृष्ट्वा यशोदे नावदीर्यसे ॥ २४ ॥
'यशोदे ! निश्चय ही तुम्हारा हृदय लोहेका बना हुआ दिखायी देता है। अरी ! पुत्रको इस दशामें देखकर तुम्हारी छाती फट क्यों नहीं जाती ? ॥ २४ ॥
दुःखितं बत पश्यामो नन्दगोपं ह्रदान्तिके।
न्यस्य पुत्रमुखे दृष्टिं निश्चेतनमवस्थितम् ॥ २५ ॥
'हाय ! हम देखते हैं, नन्दबाबा अत्यन्त दुखी हो कालियदहके निकट लाला कन्हैयाके मुखपर अपनी दृष्टि जमाये अचेत-से खड़े हैं ॥ २५ ॥
यशोदामनुगच्छन्त्यः सर्पावासमिमं ह्रदम्।
प्रविशामो न यास्यामो विना दामोदरं व्रजम् ॥ २६ ॥
'हम सब-की-सब यशोदाजीके पीछे-पीछे सर्पोंके निवास-स्थान इस ह्रदमें प्रवेश कर जायँगी, किंतु दामोदर (श्रीकृष्ण) को साथ लिये बिना व्रजको नहीं लौटेंगी ॥२६॥
दिवसः को विना सूर्ये विना चन्द्रेण का निशा।
विना वृषेण का गावो विना कृष्णेन को व्रजः।
विना कृष्णं न यास्यामो विवत्सा इव धेनवः ॥ २७ ॥
'सूर्यके बिना दिन कैसा ? चन्द्रमाके बिना रात्रि कैसी ? साँड़के बिना गौएँ क्या ? तथा श्रीकृष्णके बिना व्रज कैसा ? बिना बछड़ेकी धेनुओके समान हम श्रीकृष्णके बिना व्रजको नहीं लौटेंगी' ॥ २७ ॥
तासां विलपितं श्रुत्वा तेषां च व्रजवासिनाम्।
विलापं नन्दगोपस्य यशोदारुदितं तथा ॥ २८ ॥
एकभावशरीरज्ञ एकदेहो द्विधा कृतः।
संकर्षणस्तु संक्रुद्धो बभाषे कृष्णमव्ययम् ॥ २९ ॥
उन गोपियोंका, व्रजवासियोंका तथा नन्दबाबाका विलाप और यशोदाजीका करुणापूर्ण रोदन सुनकर श्रीकृष्णके साथ अपने एक भाव और एक शरीरके सम्बन्धको जाननेवाले संकर्षण, जो वास्तवमे एक ही देहके दो भागोमेसे एक थे, कुपित हो अविनाशी श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले—॥२८-२९॥
कृष्ण कृष्ण महाबाहो गोपानां नन्दवर्धन।
दम्यतामेष वै क्षिप्रं सर्पराजो विषायुधः ॥ ३० ॥
'गोपोंका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण ! कृष्ण ! विष ही जिसका अस्त्र-शस्त्र है, उस सर्पराजका अब शीघ्र दमन करो ॥ ३० ॥
विष्णुपर्व ] द्वादशोऽध्यायः २४९
इमे नो बान्धवास्तात त्वां मत्वा मानुषं विभो।
परिदेवन्ति करुणं सर्वे मानुषबुद्धयः ॥ ३१ ॥
'तात ! प्रभो ! ये हमारे समस्त बन्धु-बान्धव तुममें मानव-बुद्धि ही रखते हैं और तुम्हे मनुष्य मानकर ही करुणाजनक विलाप करते हैं' ॥ ३१ ॥
तच्छ्रुत्वा रौहिणेयस्य वाक्यं संज्ञासमीरितम्।
विक्रम्यास्फोटयद् बाहू भित्त्वा तन्नागबन्धनम् ॥ ३२ ॥
रोहिणीनन्दन संकर्षणका यह सांकेतिक वचन सुनकर श्रीकृष्णने सर्पोंके उस बन्धनको तोड़ डाला और पराक्रम दिखाते हुए अपनी बाँहोंपर ताल ठोका ॥ ३२ ॥
तस्य पद्ध्यामाक्रम्य भोगराशिं जलोत्थितम्।
शिरस्तु कृष्णो जग्राह स्वहस्तेनावनाम्य च ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् जलके ऊपर उठे हुए उस सर्पके भारी शरीर-को अपने दोनों पैरोंसे दबाकर श्रीकृष्णने अपने हाथसे ही उसके मस्तकको झुकाकर पकड़ लिया ॥ ३३ ॥
तस्यारुरोह सहसा मध्यमं तन्महच्छिरः।
सोऽस्य मूर्ध्नि स्थितः कृष्णो ननर्त रुचिराङ्गदः ॥ ३४ ॥
फिर श्रीकृष्ण सहसा उसके विचले विशाल सिरपर चढ़ गये और उसीपर खड़े हो नृत्य करने लगे। उस समय उनकी भुजाओंमें सुन्दर बाजूबंद शोभा पा रहे थे ॥ ३४ ॥
मृद्यमानः स कृष्णेन शान्तमूर्धा भुजङ्गमः।
आस्यैः सरुधिरोद्गारैः कातरो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३५ ॥
श्रीकृष्णके द्वारा मस्तकके कुचल दिये जानेपर उस सर्पका दिमाग ठंडा हो गया—उसके मस्तिष्ककी गर्मी शान्त हो गयी। वह अपने मुखोंसे खून उगलता हुआ कातर भावसे बोला—॥ ३५ ॥
अविज्ञानान्मया कृष्ण रोषोऽयं सम्प्रदर्शितः।
दमितोऽहं हतविषो वशगस्ते वरानन ॥ ३६ ॥
'सुमुख श्रीकृष्ण ! मैंने अज्ञानवश आपके सामने इस क्रोधका प्रदर्शन किया है। आपने मेरा दमन कर दिया। मेरा सारा विष नष्ट हो गया। अब मैं आपके अधीन हूँ ॥
तदाज्ञापय किं कुर्यां सदा सापत्यबान्धवः।
कस्य वा वशतां यामि जीवितं मे प्रदीयताम् ॥ ३७ ॥
'अतः आज्ञा दीजिये, मैं सदा ही अपने पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित आपकी क्या सेवा करूँ ? अथवा किसके अधीन हो जाऊँ ? मुझे जीवन-दान दीजिये' ॥ ३७ ॥
पञ्चमूर्द्धानतं दृष्ट्वा सर्पं सर्पारिकेतनः।
अक्रुद्ध एव भगवान् प्रत्युवाचोरगेश्वरम् ॥ ३८ ॥
उस सर्पको अपने पाँचों मस्तकोंसे प्रणत हुआ देख भगवान् गरुडध्वजने क्रोध न करके नागराज कालियसे इस प्रकार कहा—॥ ३८ ॥
तवास्मिन् यमुनातोये नैव स्थानं ददाम्यहम्।
गच्छार्णवजलं सर्प सभार्यः सहबान्धवः ॥ ३९ ॥
'ओ सर्प ! मैं तुम्हे इस यमुनाजीके जलमे नहीं रहने दूँगा। तुम अपनी पत्नी तथा भाई-बन्धुओंके साथ समुद्रके जलमे चले जाओ ॥ ३९ ॥
यश्चेह भूयो दृश्येत स्थाने वा यदि वा जले।
तव भृत्यस्तनूजो वा क्षिप्रं वध्यः स मे भवेत् ॥ ४० ॥
'अब फिर यहाँ इस स्थानपर या जलमे यदि कोई भी सर्प दिखायी देगा तो वह तुम्हारा भृत्य हो या पुत्र, मेरे हाथसे शीघ्र मार डाला जायगा ॥ ४० ॥
शिवं चास्य जलस्यास्तु त्वं च गच्छ महार्णवम्।
स्थाने त्विह भवेद् दोषस्तवान्तकरणो महान् ॥ ४१ ॥
'इस जलकी शुद्धि हो जाय—यह लोगोंके लिये मङ्गल-कारी हो, इसलिये तुम महासागरमें चले जाओ। यहाँ रहनेपर तुम्हारे जीवनका अन्त कर देनेवाला महान् दोष प्राप्त होगा ॥
मत्पदानि च ते सर्प दृष्ट्वा मूर्धसु सागरे।
गरुडः पन्नगरिपुस्त्वयि न प्रहरिष्यति ॥ ४२ ॥
'सर्प ! समुद्रमें रहते समय भी तुम्हारे पाँचों मस्तकोंपर मेरे चरण-चिह्न देखकर सर्पोंके शत्रु गरुड़ तुमपर प्रहार नहीं करेंगे' ॥ ४२ ॥
गृह्य मूर्ध्ना तु चरणौ कृष्णयोरगपुङ्गवः।
पश्यतामेव गोपानां जगामादर्शनं ह्रदात् ॥ ४३ ॥
तब नागप्रवर कालिय भगवान् श्रीकृष्णके दोनों चरणोंमें मस्तक झुकाकर गोपोंके देखते-देखते उस कुण्डसे अदृश्य हो गया ॥ ४३ ॥
निर्जिते तु गते सर्पे कृष्णसुत्तीर्य धिष्ठितम्।
विस्मितास्तुष्टुवुर्गोपाश्चक्रुश्चैव प्रदक्षिणम् ॥ ४४ ॥
जब वह सर्प हार मानकर चला गया और श्रीकृष्ण जलसे निकलकर किनारे खड़े हो गये, तब सब गोप आश्चर्यसे चकित हो उनकी स्तुति और परिक्रमा करने लगे ॥ ४४ ॥
ऊचुः सर्वे च सम्प्रीता नन्दगोपं वनेचराः।
धन्योऽस्यनुगृहीतोऽसि यस्य ते पुत्र ईदृशः ॥ ४५ ॥
समस्त वनचारी गोपोंने अत्यन्त प्रसन्न होकर नन्दगोपसे कहा—'गोपराज ! आप धन्य हैं, आपपर भगवान्की बड़ी भारी कृपा है, जिससे आपको ऐसा पुत्र मिला ॥ ४५ ॥
अद्यप्रभृति गोपानां गवां गोष्ठस्य चानघ।
आपत्सु शरणं कृष्णः प्रभुश्चायतलोचनः ॥ ४६ ॥
'निष्पाप नन्द ! आजसे सभी आपदाओके समय गोपों, गौओं और गोष्ठ (व्रज) के लिये ये विशाललोचन भगवान् श्रीकृष्ण ही शरणदाता और स्वामी हैं ॥ ४६ ॥