भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 259

विष्णुपर्व ] नवमोऽध्यायः २३७


कृष्णस्य कृष्णवदना गोपानां भयवर्धनाः।
भक्षयद्भिश्च तैर्वत्सांस्त्रासयद्भिश्च गोव्रजान् ॥ ३५ ॥
निशि बालान् हरद्भिश्च वृकैरूत्साद्यते व्रजः।

श्रीकृष्णके अङ्गोसे प्रकट हुए वे काले मुखवाले वृक गोपोंका भय बढ़ा रहे थे। वे बछड़ोंको खा जाते, गौओंके झुंडोंको त्रास देते तथा रातमें बालकोंका अपहरण कर लेते थे। इस प्रकार भेड़ियोंद्वारा वह व्रज उजाड़ा जाने लगा ॥

न वने शक्यते गन्तुं न गाश्च परिरक्षितुम् ॥ ३६ ॥
न वनात् किंचिदाहर्तुं न च वा तरितुं नदीम् ।

उस समय वनमें जाना, गौओंकी रक्षा करना, वनसे कोई वस्तु ले आना अथवा नदीको पार करना असम्भव हो गया ॥ ३६३ ॥

त्रस्ता हृद्विग्नमनसो ऽगतास्तस्मिन् वने ऽवसन्॥ ३७॥
एवं वृकैरूदीर्णैस्तु व्याघ्रतुल्यपराक्रमैः।
व्रजो निष्पन्दचेष्टः स एकस्थानचरः कृतः ॥ ३८ ॥

वे सब-के-सब भयभीत थे, उनका चित्त उद्विग्न हो गया था। वे कहीं भी आ-जा न सके। डरके मारे केवल उस वनमें ही बैठे रहे। इस प्रकार बढ़े हुए व्याघ्रतुल्य पराक्रमी भेड़ियोंने सारे व्रजको निश्चेष्ट तथा एक स्थानमें ही सीमित रहनेवाला बना दिया ॥ ३७-३८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलेषु हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां वृकदर्शनेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाललीलाके प्रसङ्गमें वृकदर्शनविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥८॥


नवमोऽध्यायः

भेड़ियोंके उत्पातसे व्रजवासियोंका उस स्थानको छोड़कर श्रीवृन्दावनमें जाना

वैशम्पायन उवाच

एवं वृकांश्च तान् दृष्ट्वा वर्धमानान् दुरासदान् ।
सस्त्रीपुमान् स घोषो वै समस्तोऽमन्त्रयत् तदा ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! इस प्रकार उन दुर्जय भेड़ियोंको बढ़ते देख समस्त व्रजके स्त्री-पुरुष एकत्र हो उस समय इस प्रकार मन्त्रणा करने लगे—॥ १ ॥

स्थानेनेह न नः कार्यं व्रजामोऽन्यन्महद्वनम्।
यच्छिवं च सुखोष्यं च गवां चैव सुखावहम् ॥ २ ॥

'अब हमें इस स्थानपर रहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। हम लोग दूसरे किसी विशाल वनमें चले चलें, जो हमारे लिये कल्याणकारी, सुखपूर्वक रहने योग्य तथा गौओंके लिये भी सुखदायक हो ॥ २ ॥

अद्यैव किं चिरेण स्म व्रजामः सह गोधनैः।
यावद् वृकैर्वधं घोरं न नः सर्वो व्रजो व्रजेत् ॥ ३ ॥

'विलम्ब करनेसे क्या लाभ ? हम आज ही अपने गो-धनोंके साथ यहाँसे चल दें। भेड़ियोंसे हमारे सारे व्रजका भयंकर वध न हो जाय—इसके पहले ही हमें यहाँसे प्रस्थान कर देना चाहिये ॥ ३ ॥

एषां धूम्रारुणाङ्गानां दंष्ट्रिणां नखकर्षिणाम् ।
धृकाणां कृष्णवक्त्राणां बिभीमो निशि गर्जताम् ॥ ४ ॥

'इन भेड़ियोंके सारे अङ्ग धूमिल और लाल रंगके हैं, इनके बड़ी-बड़ी दाढ़ें हैं। ये नखोंसे ख्रकोट लेते हैं। इनके मुख काले हैं और रातके समय ये भीषण गर्जना करते हैं। हमें इनसे बड़ा भय लगता है ॥ ४ ॥

मम पुत्रो मम भ्राता मम वत्सोऽथ गौर्मम ।
वृकैर्व्यापादिता ह्येवं क्रन्दन्ति स्म गृहे गृहे ॥ ५ ॥

'घर-घरकी स्त्रियाँ करुणक्रन्दन करती हुई यों कहती हैं कि हाय ! इन भेड़ियोंने मेरे पुत्रको, मेरे भाईको, मेरे बछड़ेको और मेरी गायको मार डाला है' ॥ ५ ॥

तासां रुदितशब्देन गवां हुंभारवेण च ।
व्रजस्योत्थापनं चक्रुर्धोषवृद्धाः समागताः ॥ ६ ॥

उनके रोनेके शब्दसे और गायोंके रँभानेसे चिन्तित हो एकत्र हुए व्रजके वृद्ध पुरुषोंने व्रजको वहाँसे उठा देनेका ही निश्चय किया ॥ ६ ॥

तेषां मतमथाज्ञाय गन्तुं वृन्दावनं प्रति ।
व्रजस्य चिनिवेशाय गवां चैव हिताय च ॥ ७ ॥
वृन्दावननिवासाय ताञ्ज्ञात्वा कृतनिश्चयान् ।
नन्दगोपो वृहद्वाक्यं बृहस्पतिरिवाददे ॥ ८ ॥

जब नन्दजीने वृन्दावनमें जानेके लिये उनके मतको जान लिया तथा व्रजको नयी जगह बसाने एवं गौओंके हितके लिये वृन्दावनमें निवास करनेके निमित्त उन सबके दृढ़ निश्चयको समझ लिया, तब वे बृहस्पतिके समान यह महत्त्वपूर्ण वचन बोले—॥ ७-८ ॥

अद्यैव निश्चयप्राप्तिर्यदि गन्तव्यमेव नः।
शीघ्रमाज्ञाप्यतां घोषः सज्जीभवत मा चिरम् ॥ ९ ॥

'यदि यह बात निश्चित हो गयी और हमें जाना ही होगा तो आज ही यात्रा कर देनी चाहिये। शीघ्र ही सारे व्रजमें यह आदेश दे दिया जाय कि तुम सब लोग शीघ्र ही यहाँसे प्रस्थानके लिये तैयार हो जाओ, देर न करो' ॥९॥