विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 258, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५३६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे.
और चारों ओरसे बाड़ लग गये हैं, जहाँ स्थायी घर बन गये और खेत कर लिये गये; ऐसे व्रज लोकमें अच्छे नहीं माने जाते । उन्मुक्त विचरनेवाले हंसोंके समान बन्धनरहित होकर विभिन्न स्थानोंमें घूमते रहनेवाले व्रज ही श्रेष्ठ हैं ॥ १९ ॥
शकृन्मूत्रेषु तेष्वेव जातक्षाररसायनम्।
न तृणं भुञ्जते गावो नापि तत् पयसे हितम् ॥ २० ॥
'उन्हीं गोबर-मूत्रोंके ढेरपर जो तृण पैदा होते हैं अथवा अन्यत्र पैदा हुए तृणोंपर जब गोबर-गोमूत्र पड़ जाते हैं, तब उनमें क्षार एवं रसायनके गुण आ जाते हैं; अतः गौएँ उन घासोंको चाहसे नहीं खाती हैं तथा वे तृण दूधके लिये भी हितकारी नहीं होते हैं ॥ २० ॥
स्थलीप्रायासु रथ्यासु नवांसु वनराजिषु ।
चरावः सहितौ गोभिः क्षिप्रं संवाह्यतां व्रजः ॥ २१ ॥
'आजकल इस वनकी सारी गलियाँ स्थल-सी हो गयी हैं। उनमें घास-फूँसका नाम भी नहीं रह गया है; अतः चलिये, हम दोनों गौओंके साथ नूतन वन-श्रेणियोंमें विचरें। अब शीघ्र ही यहाँसे व्रजको अन्यत्र ले जाना चाहिये ॥ २१ ॥
श्रूयते हि वनं रम्यं पर्याप्ततृणसंस्तरम्।
नाम्ना वृन्दावनं नाम स्वादुवृक्षफलोदकम् ॥ २२ ॥
'सुना जाता है कि वृन्दावन नामक वन बड़ा ही रमणीय है। वहाँ पर्याप्त घास फैली हुई है। वहाँके वृक्षोंमें स्वादिष्ट फल लगे हैं और वहाँका जल भी स्वादु है ॥ २२ ॥
अझिल्लिकण्टकवनं सर्वैर्वनगुणैर्युतम् ।
कदम्बपादपप्रायं यमुनातीरसंश्रितम् ॥ २३ ॥
'उस वनमें न झिल्लियाँ (झींगुर) हैं, न काँटे । उसमें सभी वनसम्बन्धी गुणोंका संयोग है । वहाँ अधिकतर कदम्बके वृक्ष हैं तथा वह वन यमुनाके तटपर ही स्थित है ॥
स्निग्धशीतानिलवनं सर्वर्तुनिलयं शुभम् ।
गोपीनां सुखसंचारं चारुचित्रवनान्तरम् ॥ २४ ॥
'उसमें सदा स्निग्ध एवं शीतल वायु चलती रहती है। वहाँ सभी ऋतुओंका निवास है। वह वन बड़ा सुन्दर एवं सुखद है। वहाँ गोपियाँ बड़े सुखसे सब ओर विचर सकती हैं । वृन्दावनके भीतरी भागमें और भी बहुत-से विचित्र एवं मनोहर वन हैं ॥ २४ ॥
तत्र गोवर्धनो नाम नातिदूरे गिरिर्महान् ।
भ्राजते दीर्घशिखरो नन्दनस्येव मन्दरः ॥ २५ ॥
'वहाँ गोवर्धन नामक महान् पर्वत है, जो उस वनसे अधिक दूर नहीं है। उसके बड़े-बड़े शिखर हैं। जैसे नन्दन-वनके पास मन्दराचलकी शोभा होती है, उसी प्रकार वृन्दावनके निकट गोवर्धन सुशोभित होता है ॥ २५ ॥
मध्ये चास्य महाशाखो न्यग्रोधो योजनोच्छ्रितः।
भाण्डीरो नाम शुशुभे नीलमेघ इवाम्बरे ॥ २६ ॥
'उस वनके मध्यभागमें विशाल शाखाओंसे सुशोभित एक बरगदका वृक्ष है, जो एक योजन ऊँचा है । उसका नाम है भाण्डीर वट । वह आकाशमें श्याम मेघके समान शोभा पाता है ॥ २६ ॥
मध्येन चास्य कालिन्दी सीमन्तमिव कुर्वती ।
प्रयाता नन्दनस्येव नलिनी सरितां वरा ॥ २७ ॥
'जैसे नन्दन वनके बीचमें सरिताओंमें श्रेष्ठ नलिनी प्रवाहित होती है, उसी प्रकार वृन्दावनके मध्यभागमें सीमन्त-सा बनाती हुई कालिन्दी बहती है ॥ २७ ॥
तत्र गोवर्धनं चैव भाण्डीरं च वनस्पतिम् ।
कालिन्दीं च नदीं रम्यां द्रक्ष्यावावश्चरतः सुखम् ॥ २८ ॥
'हमलोग वहाँ चलनेपर गोवर्धन पर्वत, भाण्डीर वट तथा रमणीय कालिन्दी नदीका सुखपूर्वक दर्शन करेंगे ॥ २८ ॥
तत्रायं कल्प्यतां घोषस्त्यज्यतां निर्गुणं वनम् ।
संत्रासयामो भद्रं ते किञ्चिदुत्पाद्य कारणम् ॥ २९ ॥
'वहीं चलकर इस व्रजको बसाया जाय और इस गुणहीन वनको छोड़ दिया जाय । मैया ! आपका भला हो, कोई नवीन कारण उत्पन्न करके हम इन व्रजवासियोंको डरावें' ॥
एवं कथयतस्तस्य वासुदेवस्य धीमतः ।
प्रादुर्बभूवुः शतशो रक्तमांसावसाशनाः ॥ ३० ॥
घोराश्चिन्तयतस्तस्य खतनूरूहजास्तदा ।
विनिष्पेतुर्भयकराः सर्वशः शतशो वृकाः ॥ ३१ ॥
बुद्धिमान् वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण ऐसा कह ही रहे थे कि उनके रोम-रोमसे सैकड़ों भयानक भेड़िये उत्पन्न होने लगे, जो रक्त, मांस और वसाका आहार करनेवाले थे । उनके चिन्तन करते ही सब ओर सैकड़ों भयंकर वृक निकल पड़े थे ॥ ३०-३१ ॥
निष्पतन्ति स्म बहवो व्रजस्योत्सादनाय वै ।
वृकान् निष्पतितान् दृष्ट्वा गोषु, वत्सेष्वथो नृषु ॥ ३२ ॥
गोपीषु च यथाकामं व्रजे त्रासोऽभवन्महान् ।
व्रजको वहाँसे उजाड़नेके लिये जब श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार बहुत-से भेड़िये प्रकट होने लगे, तब उन्हें देखकर गौओं, बछड़ों, मनुष्यों तथा गोपाङ्गनाओंमें अथवा यौं कहिये सम्पूर्ण व्रजमें महान् त्रास छा गया ॥ ३२॥
ते वृकाः पञ्चबद्धाश्च दशबद्धास्तथा परे ॥ ३३ ॥
त्रिंशद्विंशतिबद्धाश्च शतबद्धास्तथा परे ।
निश्चेरुरस्तस्य गात्रेभ्यः श्रीवत्सकृतलक्षणाः ॥ ३४ ॥
ये भेड़िये पाँच, दस, बीस, तीस तथा सौ-सौके झुंड बनाकर श्रीकृष्णके अङ्गोंसे निकल रहे थे । ये सभी श्रीवत्सके चिह्नसे सुशोभित थे ॥ ३३-३४ ॥