भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

विष्णुपर्व ] एकादशोऽध्यायः २४५ हंसों और कारण्डवोंके उद्घोष तथा सारसोंके कलनादसे वहाँ सदा कोलाहल होता रहता था। अपने जोड़ेके साथ विचरनेवाले चक्रवाक आदि पक्षी परस्पर मैथुनमें प्रवृत्त हो यमुनातटका सेवन करते थे ॥ ३१ ॥ जलजैः प्राणिभिः कीर्णा जलजैर्भूषितां गुणैः । जलजैः कुसुमैश्चित्रां जलजैर्हरितोदकाम् ॥ ३२ ॥ जलमें उत्पन्न होनेवाले प्राणी (मत्स्य आदि) यमुना- जीमें भरे हुए थे। वे जलजनित शीतलता आदि गुणोंसे विभूषित थीं। जलमें होनेवाले कमल आदि पुष्प उनमें विचित्र शोभाका आधान करते थे तथा जलजनित सेवार आदिके कारण उनका जल हरा दिखायी देता था ॥ ३२ ॥ प्रसृतस्रोतचरणां पुलिनश्रोणिमण्डलाम् । आवर्तनाभिगम्भीरां पद्मरोगानुरञ्जिताम् ॥ ३३ ॥ फैले हुए स्रोत ही उनके चरण थे। दोनों तट नितम्ब- मण्डलकी शोभा धारण करते थे। उठती हुई भँवरें उनकी गम्भीर नाभि थी। वे कमलरूपी रोमावलिसे अनुरञ्जित थीं ॥ तटच्छेदोदरां कान्तां त्रितरङ्गवलीधराम् । फेनप्रहृष्टवदनां प्रसन्नां हंसहासिनीम् ॥ ३४ ॥ तटके निकट जो प्रवाहकी कृशता थी, वही उनका सूक्ष्म उदर अथवा कृश कटिभाग थी। वे अपनी मनोहर कान्तिसे कमनीय प्रतीत होतो थीं। वे तरङ्गमयी त्रिवली धारण करती थीं। फेन ही उनका हर्षोत्फुल्ल मुख था। वे सदा प्रसन्न (स्वच्छ) रहती थीं और हंस ही उनके हास थे ॥ ३४ ॥ रुचिरोत्पलरकोष्ठौ नतभ्रू जलजेक्षणाम् । हृददीर्घललाटान्तां कान्तां शैवलमूर्द्धजाम् ॥ ३५ ॥ सुन्दर लाल कमल. उनके लाल-लाल ओष्ठोंकी झाँकी कराते थे। जलका नीचेकी ओर जाता हुआ प्रवाह ही उनकी झुकी हुई भौंहें थीं। नील कमल ही उनके नेत्र थे। जलका कुण्ड ही उनका विस्तृत ललाट-प्रान्त था तथा सेवार ही उनके सुन्दर केश थे। उनकी कान्ति बड़ी ही कमनीय थी ॥ ३५ ॥ चक्रवाकस्तनतटीं तीरपार्श्वायताननाम् । दीर्घस्रोतायतभुजामाभोगश्रवणायताम् ॥ ३६ ॥ चकवा-चकईके जोड़े उनके मानो युगल उरोज थे। उनका विस्तृत मुख दोनों तटोंपर फैला हुआ था। लंबे स्रोत ही उनकी विशाल भुजाओंके समान थे। दोनों तटोंकी पूर्णता ही उनके विस्तृत कान थे ॥ ३६ ॥ कारण्डवाकुण्डलिनीं श्रीमत्पङ्कजलोचनाम् । तटजाभरणोपेतां मीननिर्मलमेखलाम् ॥ ३७ ॥ वारिप्लवप्लवक्षौमां सारसारावनूपुराम् । काशचामीकरं वासो वसानां हंसलक्षणम् ॥ ३८ ॥ वे कारण्डवोंके कुण्डल पहिने हुए थीं। उनके नील- कमलरूपी लोचन अनुपम शोभासे सम्पन्न थे । तटपर उत्पन्न हुए वृक्ष आदि ही उनके आभरण थे। मछलियोंकी पंक्ति उनकी उज्ज्वल मेखला (करधनी) -सी प्रतीत होती थी। उनके जलका फैला हुआ पाट ही पाटम्बरका काम देता था। सारसोंकी मीठी बोली ही उनके नूपुरोंकी मधुर ध्वनि थी। वे काशपुष्प, हंस एवं सुवर्णके समान सुन्दर स्वच्छ जलमय वस्त्र धारण करती थीं ॥ ३७-३८ ॥ भीमनक्रानुसिक्ताङ्गीं कूर्मलक्षणभूषिताम् । निपानश्वापदापीडां नृभिः पीतपयोधराम् ॥ ३९ ॥ भयंकर नाके उनके अङ्गोंमें लगे हुए चन्दन-से प्रतीत होते थे। वे कच्छपरूपी लक्षणों (हाथ-पैरोंकी रेखाओं) से विभूषित थीं। पशुओंके पानी पीनेके घाटपर आये हुए श्वापद (हिंसक जन्तु) उनके शीशफूल थे। मनुष्य आदि प्राणी इनके पयोधर (जलपूर्ण स्तन) का पान करते थे ॥ ३९ ॥ श्वापदोच्छिष्टसलिलामाश्रमस्थानसंकुलाम् । तां समुद्रस्य महिषीमीक्षमाणः समन्ततः ॥ ४० ॥ चचार रुचिरं कृष्णो यमुनामुपशोभयन । यमुनाके जलको हिंसक जन्तुओने पीकर जूठा कर दिया था और उनके दोनों तट विभिन्न आश्रमोंसे भरे हुए थे। ऐसी समुद्रकी पटरानी यमुनाकी शोभा निहारते और बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण अपनी मनोहर गतिसे वहाँ चारों ओर विचर रहे थे ॥ ४०३ ॥ तां चरन्स नदीं श्रेष्ठां ददर्श हृदमुत्तमम् ॥ ४१ ॥ दीर्घं योजनविस्तारं दुस्तरं त्रिदशैरपि । गम्भीरमक्षोभ्यजलं निष्कम्पमिव सागरम् ॥ ४२ ॥ नदियोंमें श्रेष्ठ यमुनाके तटपर विचरते हुए श्रीकृष्णने एक उत्तम हृद (जलकुण्ड) देखा, जो बहुत बड़ा था। उसका विस्तार एक योजनका था। देवताओंके लिये भी उसे पार करना कठिन था। वह बहुत ही गहरा, क्षोभरहित जलसे परिपूर्ण , तथा प्रशान्त समुद्रके समान हलचलसे शून्य था ॥ ४१-४२ ॥ तोयजैः श्वापदैस्त्यक्तं शून्यं तोयचरैः खगैः । अगाधेनाम्भसा पूर्णं मेघपूर्णमिवाम्बरम् ॥ ४३ ॥ जलमे पैदा होनेवाले मगर आदि हिंसक जन्तुओंने भी उस हृदको त्याग दिया था। जलचर पक्षियोंसे भी वह सूना ही था तथा मेघोंसे आच्छादित हुए आकाशकी भाँति वह अगाध जलसे पूर्ण दिखायी देता था ॥ ४३ ॥ दुःखाेपसर्प्यं तीरेषु ससर्पेर्विपुलैर्बिलैः । विषारणिभवस्याग्नेर्धूमेन परिवेष्टितम् ॥ ४४ ॥ उसके तटोंपर बड़े-बड़े बिल थे, जिनमें सर्प रहते थे। उनके कारण उस कुण्डतक पहुँचना बहुत ही कष्टदायक