विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 268, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| २४६ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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था। साँपोंकी विषरूपी अरणिसे उत्पन्न हुई आगके धूमसे वह सारा कुण्ड व्याप्त रहता था ॥ ४४ ॥
अभोग्यं तत् पशूनां हि अपेयं च जलार्थिनाम् ।
उपभोगैः परित्यक्तं सुरैस्त्रिपवणार्थिभिः ॥ ४५ ॥
वह पशुओंके उपभोगमें आनेके योग्य नहीं रह गया था। जलार्थी प्राणियोंके लिये उसका जल अपेय हो गया था। तीनों समय स्नानकी इच्छा रखनेवाले देवताओंने भी उसे त्याग दिया था। वह हृद उनके उपभोगमें भी नहीं आता था ॥ ४५ ॥
आकाशादप्यसंचार्यं खगैराकाशगोचरैः ।
तृणेष्वपि पतत्स्वप्सु ज्वलन्तमिव तेजसा ॥ ४६ ॥
उस कुण्डके ऊपर-ऊपर आकाशचारी पक्षियोंके लिये आकाशमार्गसे भी जाना असम्भव था। उसके जलमें तिनके भी पड़ जायें तो वह कुण्ड अपनी विषाग्निके तेजसे प्रज्वलित हो उठता था ॥ ४६ ॥
समन्ताद् योजनं साग्रं देवैरपि दुरासदम् ।
विषानलेन घोरेण ज्वालाप्रज्वलितद्रुमम् ॥ ४७ ॥
उसके चारों ओर एक-एक योजनसे अधिक भूभाग ऐसा था, जिसपर चलना देवताओंके लिये भी बहुत कठिन था। वहाँ फैली हुई भयानक विषाग्निसे जो लपट उठती थी, उसने आस-पासके वृक्षोंको भी जलाकर भस्म कर दिया था ॥
व्रजस्योत्तरतस्तस्य क्रोशमात्रे निरामये ।
तं दृष्ट्वा चिन्तयामास कृष्णो वै विपुलं ह्रदम् ॥ ४८ ॥
अगाधं द्योतमानं च कस्यायं महतो ह्रदः ।
व्रजके उत्तर भागमें केवल एक कोसकी भूमि ऐसी रह गयी थी, जो उसकी विषाग्निके प्रभावसे बची रहनेके कारण रोग-शोकसे रहित थी। उस विशाल एवं अगाध कुण्डको, जो अपने तेजसे दीप्तिमान् था, देखकर श्रीकृष्णने मन-ही-मन सोचा, किस महान् प्राणीका यह कुण्ड है ॥ ४८$\frac{१}{२}$ ॥
अस्मिन् स कालियो नाम कालाञ्जनचयोपमः ॥ ४९ ॥
उरगाधिपतिः साक्षाद्ध्रदे वसति दारुणः ।
उत्सृज्य सागरावासं यो मया विदितः पुरा ॥ ५० ॥
भयात् पतगराजस्य सुपर्णस्योरगाशिनः ।
इस हृदमें काली अञ्जनराशिके समान काला तथा अत्यन्त दारुण वह साक्षात् नागराज कालिय निवास करता है, जो पूर्वकालमें मेरी जानकारीमें ही सर्पभोजी पक्षिराज गरुड़के भयसे समुद्रका निवास छोड़कर यहाँ आ गया था ॥
तेनेयं दूषिता सर्वा यमुना सागरङ्गमा ॥ ५१ ॥
भयात् तस्योरगपतेर्नायं देशो निषेव्यते ।
उसीने इस सारी समुद्रगामिनी यमुनाको विषसे दूषित किया है। उस नागराजके भयसे ही कोई प्राणी इस देशका सेवन नहीं करता ॥ ५१$\frac{१}{२}$ ॥
तदिदं दारुणाकारमरण्यं रूढशाद्वलम् ॥ ५२ ॥
सावरोहद्रुमं घोरं कीर्णं नानालताद्रुमैः ।
रक्षितं सर्पराजस्य सचिवैराप्तकारिभिः ॥ ५३ ॥
इसलिये बड़ी-बड़ी घासोंसे भरा हुआ यह वन भयानक हो गया है। वरोह और वृक्षोंसहित यह घोर वन नाना प्रकारकी लताओं तथा पादपोंसे परिपूर्ण है तथा सर्पराज कालियके विश्वासी मन्त्री इस भूभागकी रक्षा करते हैं ॥
वनं निर्विषयाकारं विपाचमिव दुःस्पृशम् ।
तैराप्तकारिभिर्नित्यं सर्वतः परिरक्षितम् ॥ ५४ ॥
यह वन आकाशकी भाँति अवलम्बनशून्य हो गया है। विषमिश्रित अन्नके समान इसका स्पर्श भी दुःखदायक है। कालियके उन विश्वसनीय सचिवोंद्वारा यह सदा सब ओरसे सुरक्षित है ॥ ५४ ॥
शैवालनलिनैश्चापि वृक्षैः क्षुद्रलताकुलैः ।
कर्तव्यमार्गो भ्राजेते ह्रदस्यास्य तटावुभौ ॥ ५५ ॥
इस हृदके दोनों तट सिवार, कमल तथा छोटी-छोटी लताओंसे भरे हुए वृक्षोंसे सुशोभित होते हैं। मुझे यहाँतक पहुँचनेके लिये मार्ग बनाना होगा ॥ ५५ ॥
तदस्य सर्पराजस्य कर्तव्यो निग्रहो मया ।
यथेयं सरिदम्भोदा भवेच्छिवजलाशया ॥ ५६ ॥
इसी दृष्टिसे मुझे इस नागराजका दमन करना है, जिससे जल देनेवाली यह नदी कल्याणकारी जलका आश्रय हो सके ॥ ५६ ॥
व्रजोपभोग्या च यथा नागे च दमिते मया ।
सर्वत्र सुखसंचारा सर्वतीर्थसुखाश्रया ॥ ५७ ॥
इस नागका मेरे द्वारा दमन हो जानेपर यहाँकी नदी समूचे ब्रजके उपभोगमें आने योग्य हो जायगी। यहाँ सब ओर सुखपूर्वक विचरण करना सम्भव हो जायगा तथा यह नदी समस्त तीर्थों और सुखोंका आश्रय हो जायगी ॥ ५७ ॥
एतदर्थं च वासोऽयं ब्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च ।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम् ॥ ५८ ॥
इसलिये ब्रजमें मेरा यह निवास हुआ है और इसीलिये मैंने गोपोंमें अवतार ग्रहण किया है। इन कुमार्गपर स्थित हुए दुरात्माओंका दमन करनेके लिये ही यहाँ मेरा अवतार हुआ है ॥ ५८ ॥
एनं कदम्बमारुह्य तदेव शिशुलीलया ।
विनिपत्य ह्रदे घोरे दमयिष्यामि कालियम् ॥ ५९ ॥
मैं बालकोंके खेल-खेलमें ही इस कदम्बपर चढ़कर उस घोर हृदमें कूद पहूँगा और कालियनागका दमन करूँगा ॥
एवं कृते बाहुवीर्यं लोके ख्यातिं गमिष्यति ॥ ६० ॥
ऐसा करनेपर संसारमें मेरे बाहुबलकी ख्याति होगी ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बालचरिते यमुनावर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाललीलाके प्रसंगमें यमुनावर्णननामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥११॥