विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 261, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] दशमोऽध्यायः २३९
युवभिः स्थविरैश्च गोपैर्व्यग्रकरैर्भृशम् ।
विशसद्भिः कुठारैश्च काष्ठान्यपि तरूनपि ॥ २९ ॥
तद् व्रजस्थानमधिकं शुशुभे काननावृतम् ।
रम्यं वननिवेशं वै स्वादुमूलफलोदकम् ॥ ३० ॥
कहीं दही-दूधके माटोंमें मथानी डाली जा रही थी, कहीं मथानीमें बँधी हुई रस्सी खींची जाती थी, कहीं इधर-उधर गगरियों या माटोंको जलसे धोया जाता था, कहीं कील या खूँटे गाड़े जाते थे, जिनमें मोटी-पतली रस्सियाँ बँधी होती थीं; कहीं बहुत-से खम्भे खड़े किये जा रहे थे, कहीं छकड़े घुमाये जाते थे, कहीं मन्थनपात्र या माटमें डाले गये थम्भके सिरेपर रस्सियाँ बाँधी जाती थीं, कहीं घर छानेके लिये संचित चटाइयाँ तथा तिनकोंके समूह बिखरे पड़े थे, कहीं यत्र-तत्र वृक्षोंकी शाखाओंपर पक्षियोंके रहने योग्य स्थान बनाये जाते थे, कहीं गौओंके रहनेयोग्य स्थानोंकी शोध हो रही थी, कहीं ओखलियाँ रखी जाती थीं, उन्हें पूर्वाभिमुख करके धोया जा रहा था, कहीं आग जलायी जाती थी, कहीं छकड़ोंपरसे (अपनी मौतसे मरे हुए) बछड़ोंके चर्मसे निर्मित बिछौनोंसहित पलंग उतारे जा रहे थे, कहीं गोपियाँ अपने सिरसे जलका घड़ा उतारती हुई उस वनकी शोभा देखती थीं, कुछ गोपाङ्गनाएँ सब ओर घूम-घूमकर वृक्षोंकी डालियाँ खींच रही थीं, क्या बूढ़े, क्या जवान, सभी गोपोंके हाथ कार्यमें अत्यन्त व्यस्त थे, वे कुठारोंसे काठ और वृक्षोंको भी काट रहे थे। इन सबके कारण वनसे घिरा हुआ वह व्रजका स्थान अधिक शोभा पा रहा था। वृन्दावनका वह रमणीय प्रदेश स्वादिष्ट फल, मूल और जलसे सम्पन्न था ॥ २३-३० ॥
तास्तु कामदुघा गावः सर्वपक्षिरुतं वनम् ।
वृन्दावनमनुप्राप्ता नन्दनोपमकाननम् ॥ ३१ ॥
व्रजकी वे सभी कामधेनु गौएँ समस्त पक्षियोंके कलरवोंसे मुखरित और नन्दन-सदृश काननोंसे युक्त वृन्दावनमें पहुँच गयीं ॥ ३१ ॥
पूर्वमेव तु कृष्णेन गवां वै हितकारिणा ।
शिवेन मनसा दृष्टं तद् वनं वनचारिणा ॥ ३२ ॥
वनमें विचरनेवाले, गौओंके हितकारी श्रीकृष्णने पहले ही अपने मनसे कल्याणचिन्तनपूर्वक उस वनको देखा था ॥ ३२ ॥
पश्चिमे तु ततो रूक्षे घर्मे मासे निरामये ।
वर्षतीवामृतं देवे तृणं तत्र व्यवर्धत ॥ ३३ ॥
अतः यद्यपि उस समय बहुत ही रूखे गर्मीके महीनेका अन्तिम भाग (आषाढ़) बीत रहा था, तो भी वहाँ घास-पात बहुत बढ़ने लगा, मानो इन्द्रदेव वहाँ अमृतकी वर्षा कर रहे हों ॥ ३३ ॥
न तत्र वत्साः सीदन्ति न गावो नेतरे जनाः ।
यत्र तिष्ठति लोकानां भवाय मधुसूदनः ॥ ३४ ॥
जहाँ भगवान् मधुसूदन सम्पूर्ण विश्वके हितके लिये विराजमान थे, उस वृन्दावनमे न तो बछड़े कभी शिथिल होते थे, न गौएँ कष्ट पाती थीं और न दूसरे ही लोगोंको कभी दुःखका अनुभव होता था ॥ ३४ ॥
ताश्च गावः स घोषस्तु स च संकर्षणो युवा ।
कृष्णेन विहितं वासं तमध्यासत निर्वृताः ॥ ३५ ॥
वे गौएँ, वह व्रज तथा वे तरुण वीर बलरामजी सब-के-सब श्रीकृष्णद्वारा विहित उस निवासस्थानमें बड़े आनन्दसे रहने लगे ॥ ३५ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वृन्दावनप्रवेशे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीवृन्दावन-प्रवेशविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
दशमोऽध्यायः
वर्षा ऋतुका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
तौ तु वृन्दावनं प्राप्तौ वसुदेवसुतावुभौ ।
चेरतुर्वत्सयूथानि चारयन्तौ सुरूपिणौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वृन्दावनमें पहुँचकर वसुदेवजीके वे दोनों पुत्र, जो बहुत ही सुन्दर थे, बछड़ोंके झुंडोंको चराते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे ॥ १ ॥
पूर्णस्तु घर्मसमयस्तयोस्तत्र वने सुखम् ।
क्रीडतोः सह गोपालैर्यमुनां चावगाहतोः ॥ २ ॥
वृन्दावनमे रहकर ग्वाल-बालोंके साथ क्रीडा और यमुना-स्नान करते हुए उन दोनों भाइयोंका ग्रीष्म-मास सुखपूर्वक बीत गया ॥ २ ॥
ततः प्रावृडनुप्राप्ता मनसः कामदीपिनी ।
प्रववर्षुर्महामेघाः शक्रचापाङ्कितोदराः ॥ ३ ॥
तदनन्तर मनकी कामनाको उद्दीपित करनेवाली वर्षा ऋतु आ पहुँची। मेघोंकी भारी घटा घिर आयी और वर्षा करने लगी। उन मेघोंके मध्यभाग इन्द्रधनुषसे अङ्कित दिखायी देते थे ॥ ३ ॥