विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 262, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें२४० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
बभूवादर्शनः सूर्यो भूमिश्चादर्शना तृणैः ।
पतता मेघवातेन नवतोयानुकर्षिणा ॥ ४ ॥
सम्प्रमार्जिततला भूमियोंवनस्थेव लक्ष्यते ॥ ५ ॥
(मेघोंकी आड़में छिपे हुए) सूर्यका दर्शन नहीं हो पाता था। घास इतनी बढ़ गयी कि धरती भी अदृश्य हो गयी। नूतन जलराशिको खींच लानेवाले मेघरूपी वायुने भूतलको झाड़-बुहार और धोकर साफ कर दिया। उस समय भूमि ऐसी दिखायी देती थी, मानो उसकी युवावस्था आ गयी हो ॥ ४-५ ॥
नववर्षावसिकानि शक्रगोपकुलानि च ।
नष्टदावाग्निधूमानि वनानि प्रचकाशिरे ॥ ६ ॥
इन्द्रगोप नामक कीट नूतन वर्षाके जलसे भींग रहे थे। वनप्रान्तके दावानल और धूम नष्ट हो गये थे, इससे उन वनोंकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ६ ॥
नृत्यव्यापारकालश्च मयूराणां कलापिनाम् ।
मदरक्ताः प्रवृत्ताश्च केकाः पटुरवास्तथा ॥ ७ ॥
बड़े-बड़े पंखों (कलापों) से विभूषित मयूरोंके नृत्य-व्यापारका समय आ पहुँचा था; अतः उनकी मदमत्त दशाकी मधुर वाणी बड़ी पटुताके साथ श्रवणगोचर होती थी ॥ ७ ॥
नवप्रावृषि कान्तानां षट्पदाहारदायिनाम् ।
यौवनस्थकदम्बानां नवाभ्रैर्भ्राजते वपुः ॥ ८ ॥
नूतन वर्षा में जिनकी कमनीयता बढ़ गयी है, जो भ्रमरोंको आहार प्रदान करते तथा युवावस्थामें आ पहुँचे हैं, उन कदम्ब-वृक्षोंका आकार नये बादलोंके आनेसे अधिक शोभा पाने लगा ॥ ८ ॥
हासितं कुटजैर्वृक्षैः कदम्बैर्वासितं वनम् ।
नाशितं जलदैरुष्णं तोषिता वसुधा जलैः ॥ ९ ॥
कुटजके वृक्षोंने अपने फूलोंसे वहाँ सब ओर हास्यकी छटा छिटका दी। कदम्बोंने उस वनमें सुगन्ध भर दी। बादलोंने गर्मी मिटा दी और जलकी धाराओंने वसुधाको पूर्णतः तृप्त कर दिया ॥ ९ ॥
संतप्ता भास्करकरैरभितप्ता दवाग्निभिः ।
जलैर्वलाहकोत्सृष्टैरुच्छ्वसन्तीव पर्वताः ॥ १० ॥
जो सूर्यकी किरणोंसे संतप्त तथा दावानलसे दग्ध हो गये थे, वे पर्वत मेघोंके बरसाये हुए जलसे अभिषिक्त हो पुनः साँस-सी लेने लगे ॥ १० ॥
महावातसमुद्धूतं महामेघगणार्पितम् ।
महीमहाराजपुरैस्तुल्यमापद्यते नभः ॥ ११ ॥
उठी हुई प्रचण्ड वायु पताकाके समान फहरा रही थी। बड़े-बड़े मेघोंके समुदाय प्रासादों (महलों) के समान प्रतीत होते थे। इस प्रकार आकाश भूतलके महाराजोंके नगरके समान स्वरूप धारण किये था ॥ ११ ॥
क्वचित् कदम्बहासाढ्यं शिलीन्ध्राभरणं क्वचित् ।
सम्पदीप्तमिवाभाति फुल्लनीपद्रुमं वनम् ॥ १२ ॥
कहीं कदम्बका विकास हासकी-सी छटा बिखेर रहा था। कहीं भुँइफोड़ या गोबर-छत्ता आभूषणके समान शोभा देता था। जगह-जगह नीपके वृक्ष खिले हुए थे। इन सबके कारण वृन्दावन अत्यन्त दीप्तिमान्-सा प्रतीत होता था ॥ १२ ॥
ऐन्द्रेण पयसा सिक्तं मारुतेन च विस्तृतम् ।
पार्थिवं गन्धमाघ्राय लोकः क्षुभितमानसः ॥ १३ ॥
इन्द्रदेवके बरसाये हुए जलसे अभिषिक्त तथा वायुसे विस्तारको प्राप्त हुई पृथ्वीकी सोंधी सुगन्ध सूँघकर लोगोंका मन क्षुब्ध (कामविकारसे युक्त) हो उठता था ॥ १३ ॥
दृप्तसारङ्गनादेन दर्दुरव्याहृतेन च ।
नैवैश्च शिखिविक्षुब्धैरवकीर्णा वसुन्धरा ॥ १४ ॥
मत्तवाले भ्रमरोंके गुंजारव, मेढकोंकी ध्वनि तथा मोरोंकी नूतन केकावाणीसे वहाँकी भूमि गूँज रही थी ॥ १४ ॥
भ्रमतूर्णमहावर्ता वर्षप्राप्तमहारयाः ।
हरन्त्यस्तीरजान् वृक्षान् विस्तारं यान्ति निम्नगाः ॥ १५ ॥
नदियोंमें तीव्र गतिसे बड़ी-बड़ी भँवरें उठ रही थीं। वर्षाके कारण उनका वेग महान् हो गया था। वे तटवर्ती वृक्षोंको बहा ले जाती थीं और क्रमशः विस्तारको प्राप्त हो रही थीं ॥ १५ ॥
संततासारनिर्यत्नाः क्लिन्नयलोत्तरच्छदाः ।
न त्यजन्ति नगाग्राणि श्रान्ता इव पतत्रिणः ॥ १६ ॥
निरन्तर जलकी धारा बरसनेके कारण जो उड़नेके प्रयत्नमें असफल हो गये थे, जिनके ऊपरी पंख शिथिल-प्रयास होकर काम नहीं दे पाते थे, वे पक्षी थके-माँदेके समान वृक्षोंकी शाखाओंको छोड़ नहीं रहे थे ॥ १६ ॥
तोयगम्भीरलम्बेषु स्रवत्सु च नदत्सु च ।
उदरेषु नवाभ्राणां मज्जतीव दिवाकरः ॥ १७ ॥
सूर्यदेव नूतन जलधारोंके उदरोंमें, जो जलके कारण सघन और फैले हुए थे तथा वर्षाके साथ गर्जना भी करते थे, डूबते-से जा रहे थे ॥ १७ ॥
महीरुहैरूत्पतितैः सलिलोत्पीडसंकुला ।
अन्विष्यमार्गा वसुधा भाति शाद्वलमालिनी ॥ १८ ॥
भूमि एक तो घाससे ढकी हुई थी, दूसरे जलके प्रवाहमें डूब गयी थी, रास्तोंका पता चलना कठिन हो गया था, मगोंके किनारे उगे हुए वृक्षोंसे ही उन मार्गोंको ढूँढ़ा या पाया जा सकता था ॥ १८ ॥