विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 263, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] दशमोऽध्यायः २४१
वज्रेणेवावरुग्णानां नगानां नगशालिनाम् ।
स्रोतोभिः परिकृत्तानि पतन्ति शिखराण्युधः ॥ १९ ॥
वृक्षोंसे सुशोभित होनेवाले पर्वतोंके शिखर जलके स्रोतोंसे कटकर नीचे गिर रहे थे; ऐसा जान पड़ता था, मानो वे पर्वत वज्रके प्रहारसे विदीर्ण हो गये हों ॥ १९ ॥
पतता मेघवर्षेण यथा निम्नानुसारिणा ।
पल्वलोत्कीर्णमुक्तेन पूर्यन्ते वनराजयः ॥ २० ॥
मेघोंकी वर्षाका जल नीचे गिरकर नीची भूमिका अनुसरण करता हुआ गड्ढेमें जाता था । उसके भर जानेपर उससे निकलकर बाहर फैलता था और सारी वन-श्रेणियोंको आप्लावित कर देता था ॥ २० ॥
हस्तोच्छ्रितमुखा वन्या मेघनादानुसारिणः ।
भ्रान्तातिवृष्ट्या मातङ्गा गां गता इव तोयदाः ॥ २१ ॥
अत्यन्त वर्षासे भ्रान्त हुए जंगली हाथी सूँड और मुँहको ऊपर उठाये मेघकी गर्जनाका अनुकरण करते (गर्जते ) थे । उस समय वे पृथ्वीपर उतरे हुए मूर्तिमान् मेघके समान जान पड़ते थे ॥ २१ ॥
प्रावृट्प्रवृत्तिं संदृश्य दृष्ट्वा चाम्बुधरान् घनान् ।
रौहिणेयो मिथः काले कृष्णं वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥
वर्षा ऋतु आ गयी और आकाशमें बादल घिर आये; यह देखकर रोहिणीनन्दन बलरामजीने श्रीकृष्णसे यह सामयिक बात कही--॥ २२ ॥
पश्य कृष्ण घनान् कृष्णान् बकाकोज्ज्वलभूषणान् ।
गगने तव गात्रस्य वर्णचोरान् समुच्छ्रितान् ॥ २३ ॥
‘श्रीकृष्ण ! आकाशमें उन ऊँचे उठे हुए काले बादलों-को तो देखो, जो बकपङ्क्तिरूपी उज्ज्वल हारोंसे विभूषित हैं। वे तुम्हारी अङ्गकान्ति चुराये लेते हैं ॥ २३ ॥
तव निद्राकरः कालस्तव गात्रोपमं नभः ।
त्वमिवाज्ञातवसतिं चन्द्रो वसति वार्षिकीम् ॥ २४ ॥
‘यह तुम्हारे नींद लेनेका समय है*। काले मेघोंके कारण आकाश तुम्हारे अङ्गोंके समान श्यामवर्णका दिखायी देता है तथा वर्षा ऋतुमें चन्द्रमा भी तुम्हारी तरह अज्ञात-वास कर रहे हैं ॥ २४ ॥
एतन्नीलाम्बुदश्यामं नीलोत्पलदलप्रभम् ।
सम्प्राप्ते दुर्दिने काले दुर्दिनं भाति वै नभः ॥ २५ ॥
‘जो काले मेघोंके छा जानेसे श्याम दिखायी देता है तथा जिसकी आभा नील कमलदलके समान हो गयी है, वह आकाश दुर्दिन (वर्षाका समय ) आनेपर स्वयं भी दुर्दिन (मेघाच्छन्न दिवस ) सा प्रतीत होता है ॥ २५ ॥
पश्य कृष्ण जलोद्ग्रैः कृष्णैरुद्ग्रथितैर्घनैः ।
गोवर्धनो यथा रम्यो भाति गोवर्धनो गिरिः ॥ २६ ॥
‘श्रीकृष्ण ! देखो, जलसे भरकर परस्पर गुँथे हुए इन काले बादलोंसे गौओंकी वृद्धि करनेवाला गोवर्धन पर्वत कैसा रमणीय प्रतीत होता है ! ॥ २६ ॥
पतितेनाम्भसा ह्येते समन्तान्मददर्पिताः ।
भ्राजन्ते कृष्णसारङ्गाः काननेषु मुदान्विताः ॥ २७ ॥
‘ये कृष्णमृग चारों ओर जल गिरनेसे मदमत्त हो उठे हैं और आनन्दमग्न होकर काननोंमें विचरते हुए शोभा पा रहे हैं ॥ २७ ॥
एतान्यम्बुप्रहृष्टानि हरितानि मृदूनि च ।
तृणानि शतपत्राक्ष पत्रैर्गूहन्ति मेदिनीम् ॥ २८ ॥
‘कमलनयन ! जलसे अभिषिक्त होकर हर्षोल्लासमें भरे हुए ये कोमल हरित तृण अपने पत्तोंसे पृथ्वीको ढकते जा रहे हैं ॥ २८ ॥
क्षरज्जलानां शैलानां वनानां जलदागमे ।
ससस्यानां च सीमानां न लक्ष्मीर्व्यतिरिच्यते ॥ २९॥
‘मेघोंके आनेपर जलके झरने बहानेवाले पर्वतोंकी, वनोंकी तथा सस्य (हरी-भरी खेती) से सम्पन्न खेतोंकी लक्ष्मी (शोभा) एक-सी हो रही है । कहीं न्यून या अधिक नहीं है (अथवा इन तीनोंकी शोभा इनसे पृथक् नहीं होती है) ॥ २९ ॥
शीघ्रवातसमुद्धूताः प्रोषितोत्सुक्यकारिणः ।
दामोदरोद्दामरवाः प्रागल्भ्यं यान्ति तोयदाः ॥ ३० ॥
‘दामोदर ! शीघ्रगामी वायुसे प्रेरित हो ऊपर उठे हुए तथा परदेशमें रहनेवाले पुरुषोंको घर आनेके लिये उत्सुक बनानेवाले ये बादल प्रचण्ड गर्जना करते हुए अपनी प्रगल्भताका परिचय देते हैं ॥ ३० ॥
हरे हर्यश्वचापेन त्रिवर्णेन त्रिविक्रम ।
विबाणज्येन रचितं तवेदं मध्यमं पदम् ॥ ३१ ॥
‘त्रिविक्रमरूप धारण करनेवाले हरे ! बाण और प्रत्यञ्चा-से रहित तिरंगे इन्द्रधनुषसे तुम्हारे मध्यम पद (अन्तरिक्ष) का शृङ्गार-सा किया गया है ॥ ३१ ॥
नभस्येष नभश्चक्षुर्न भात्येव चरन्नभः ।
मेघैः शीतातपकरो विरश्मिरिव रश्मिवान् ॥ ३२ ॥
‘श्रावण मासमें आकाशके नेत्रस्वरूप ये अंशुमाली सूर्य प्रभाहीन-से होकर आकाशमें विचरते हुए अधिक शोभा नहीं पा रहे हैं तथा बादलोंसे आच्छन्न होनेके कारण इनकी तापदायिनी किरणें शीतल हो गयी हैं ॥ ३२ ॥
* वर्षाके चार महीनोंमें भगवान् विष्णु शयन करते हैं—यह पुराणप्रसिद्ध बात है तथा इस हरिवंशमें भी इसकी चर्चा आ चुकी है ।